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हरसिद्धि मंदिर उज्जैन : यहां गिरी थी माता सती की दाहिनी कोहनी

हरसिद्धि मंदिर उज्जैन : पवित्र शिप्रा नदी के तट पर बसा प्राचीन शहर उज्जैन, आध्यात्मिक ऊर्जा से भरपूर कई मंदिरों का घर है। इन पूजनीय मंदिरों में से, हरसिद्धि माता मंदिर भक्तों के हृदय में एक विशेष स्थान रखता है। हम आपको उज्जैन में हरसिद्धि मंदिर की भव्यता और महत्व से परिचित करवाने के लिए एक आध्यात्मिक यात्रा पर ले चलते हैं, जो एक दिव्य आश्रय है और भक्ति, विश्वास और दिव्य आशीर्वाद को समेटे हुए है।

हरसिद्धि मंदिर उज्जैन : यहां गिरी थी माता सती की दाहिनी कोहनी
उज्जैन की रक्षा के लिए आस-पास देवियों का पहरा, उनमें से एक है हरसिद्धि माता

⇓ लोकेश वर्मा, मलकापुर (बैतूल)

हरसिद्धि मंदिर उज्जैन : पवित्र शिप्रा नदी के तट पर बसा प्राचीन शहर उज्जैन, आध्यात्मिक ऊर्जा से भरपूर कई मंदिरों का घर है। इन पूजनीय मंदिरों में से, हरसिद्धि माता मंदिर भक्तों के हृदय में एक विशेष स्थान रखता है। हम आपको उज्जैन में हरसिद्धि मंदिर की भव्यता और महत्व से परिचित करवाने के लिए एक आध्यात्मिक यात्रा पर ले चलते हैं, जो एक दिव्य आश्रय है और भक्ति, विश्वास और दिव्य आशीर्वाद को समेटे हुए है।

हरसिद्धि माता मंदिर भारत के मध्य प्रदेश राज्य के बाबा महाकाल की नगरी उज्जैन में स्थित एक पूजनीय हिंदू मंदिर है। हिंदू धर्म में दिव्य स्त्री शक्ति के अवतार देवी हरसिद्धि को समर्पित यह मंदिर भक्तों के लिए महत्वपूर्ण धार्मिक महत्व रखता है।

माना जाता है कि यह मंदिर प्राचीन है, जिसके ऐतिहासिक अभिलेख कई शताब्दियों पुराने हैं। यह प्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर के निकट स्थित है, जो उज्जैन में एक और महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है। हरसिद्धि माता मंदिर की वास्तुकला पारंपरिक हिंदू मंदिर डिजाइन को दर्शाती है, जिसमें जटिल नक्काशी, रंगीन सजावट और इसकी दीवारों और स्तंभों को सजाने वाले पवित्र रूपांकनों का उपयोग किया गया है।

वीडियो में देखें मां हरसिद्धि मंदिर की भव्यता…

देवी दुर्गा के नौ रूपों की पूजा

पूरे साल भर मंदिर में भक्तों का तांता लगा रहता है, खास तौर पर नवरात्रि जैसे त्यौहारों के दौरान, जिसमें देवी दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है। इन त्यौहारों के दौरान माहौल जीवंत और आध्यात्मिक रूप से भरा होता है, जहाँ प्रार्थनाएँ, अनुष्ठान और भक्ति गीत हवा में गूंजते रहते हैं।

हरसिद्धि माता मंदिर में जाकर देवी का आशीर्वाद लेने से व्यक्ति की इच्छाएं पूरी होती हैं और उसे समृद्धि, सफलता और बुरी शक्तियों से सुरक्षा मिलती है। हरसिद्धि माता मंदिर आस्था, भक्ति और आध्यात्मिकता का प्रतीक है, जो दूर-दूर से भक्तों को अपनी ओर आकर्षित करता है, जो अपने जीवन में शांति, आशीर्वाद और दैवीय हस्तक्षेप की तलाश करते हैं।

दक्ष प्रजापति के यज्ञ में किया था अग्रिदाह

हरसिद्धि मंदिर, देश के 52 शक्तिपीठों में से एक है। पौराणिक कथा के अनुसार, जब माता सती ने दक्ष प्रजापति के यज्ञ में अग्निदाह किया था, तब शिव जी उनके शव को लेकर चले। जहां-जहां माता सती के अंग गिरे, वहां शक्तिपीठों की स्थापना हुई।

श्रीयंत्र पर विराजमान है यहां शक्तिपीठ

उज्जैन में माता सती की दाहिनी कोहनी गिरी थी, जिसके कारण यहां शक्तिपीठ की स्थापना हुई और इसे हरसिद्धि मंदिर के नाम से जाना जाता है। माता हरसिद्धि श्रीयंत्र पर विराजमान हैं और भक्तों को हर प्रकार की सिद्धि प्रदान करती हैं, इसलिए इन्हें ‘हरसिद्धि’ कहा जाता है।

यहाँ है दो हजार साल पुरानी दीपमालाएं

हरसिद्धि मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसकी 2 हजार साल पुरानी दीपमालाएं हैं, जिनकी ऊंचाई 51 फीट है और जिनमें कुल 1011 दीप संध्या आरती में प्रज्ज्वलित किए जाते हैं।

कई महीनों पहले से करवाते हैं बुकिंग

इन दीपमालाओं को प्रज्वलित करने के लिए श्रद्धालु कई महीने पहले से बुकिंग करवाते हैं। प्रत्येक दीपमाला को जलाने में 4 किलो रूई और 60 लीटर तेल का उपयोग होता है। ऐसा माना जाता है कि इन दीप स्तंभों की स्थापना राजा विक्रमादित्य ने कराई थी।

पांच मिनट में प्रज्ज्वलित होते 1011 दीप

5 मिनट में 1011 दीप प्रज्वलित होते है, हरसिद्धि मंदिर में शाम 7 बजे आरती होती है। आरती से पहले 6 लोग दीप स्तंभों की सफाई और उन्हें प्रज्वलित करने की तैयारी में जुट जाते हैं। 1011 दीपों को 5 मिनट में प्रज्वलित कर दिया जाता है, और यह अद्भुत दृश्य देखने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर में एकत्र होते हैं।

अब हर रोज प्रज्ज्वलित किए जाते हैं दीप

पहले नवरात्रि में तथा कुछ प्रमुख त्योहारों पर ही दीप स्तंभ जलाए जाते थे, लेकिन पिछले कुछ सालों से श्रृद्धालुओं के सहयोग से जोशी परिवार द्वारा हर रोज ये दीप स्तंभ जलाए जाते हैं।

राजा विक्रमादित्य से भी मंदिर का संबंध

हरसिद्धि मंदिर का संबंध राजा विक्रमादित्य से भी माना जाता है। जिस क्षेत्र में मंदिर स्थित है, उसे विक्रमादित्य की तपोभूमि माना जाता है। मंदिर के ठीक पीछे एक कोने में कुछ सिर रखे हैं जिन पर सिंदूर लगा हुआ है। कहा जाता है कि ये राजा विक्रमादित्य के सिर हैं।

हर 12 वें वर्ष दी थी अपने सिर की बलि

लोक कथाओं के मुताबिक विक्रमादित्य ने देवी को प्रसन्न करने के लिए हर 12वें वर्ष में अपने सिर की बलि दी थी। उन्होंने 11 बार ऐसा किया, लेकिन हर बार सिर वापस आ जाता था। जब 12वीं बार उन्होंने सिर की बलि दी तो यह वापस नहीं आया। इसे उनके शासन का अंत माना गया।

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उत्तम मालवीय

मैं इस न्यूज वेबसाइट का ऑनर और एडिटर हूं। वर्ष 2001 से पत्रकारिता में सक्रिय हूं। सागर यूनिवर्सिटी से एमजेसी (मास्टर ऑफ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री प्राप्त की है। नवभारत भोपाल से अपने करियर की शुरुआत करने के बाद दैनिक जागरण भोपाल, राज एक्सप्रेस भोपाल, नईदुनिया और जागरण समूह के समाचार पत्र 'नवदुनिया' भोपाल में वर्षों तक सेवाएं दी। अब इस न्यूज वेबसाइट "Betul Update" का संचालन कर रहा हूं। मुझे उत्कृष्ट पत्रकारिता के लिए प्रतिष्ठित सरोजिनी नायडू पुरस्कार प्राप्त करने का सौभाग्य भी नवदुनिया समाचार पत्र में कार्यरत रहते हुए प्राप्त हो चुका है।

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