FPPAS electricity surcharge: एमपी में बिजली उपभोक्ताओं को झटका, जानिए अब हर महीने कितना ज्यादा देना होगा चार्ज
FPPAS electricity surcharge: A shock for electricity consumers in MP; find out how much extra you will have to pay each month.

FPPAS electricity surcharge: मध्य प्रदेश के बिजली उपभोक्ताओं को अब अपने हर महीने के बिजली बिल के लिए ज्यादा रकम चुकानी होगी क्योंकि ईंधन और बिजली खरीद समायोजन सरचार्ज यानी एफपीपीएएस की दरों में संशोधन कर दिया गया है। आने वाले महीनों यानी 24 सितंबर से 23 अक्टूबर के बीच जारी होने वाले सभी बिजली बिलों में यह सरचार्ज अब पांच दशमलव शून्य छह तीन फीसदी की दर से जोड़ा जाएगा। गौर करने वाली बात यह है कि इससे पहले यह दर चार दशमलव पांच नौ फीसदी थी जिसका सीधा मतलब है कि नई व्यवस्था के तहत इसमें शून्य दशमलव चार सात तीन फीसदी की बढ़ोतरी की गई है। हालांकि आम जनता को यह समझना होगा कि इस सरचार्ज का वास्तविक असर पूरी तरह से उनकी बिजली खपत और तयशुदा ऊर्जा शुल्क के अलग-अलग स्लैब पर ही निर्भर करेगा। उदाहरण के तौर पर सिर्फ भोपाल शहर के ही करीब दो लाख ऐसे उपभोक्ता जो हर महीने सौ यूनिट तक बिजली की खपत करते हैं, उन्हें कुल मिलाकर लगभग आठ लाख रुपये की अतिरिक्त राशि का भुगतान करना होगा।
ऊर्जा शुल्क पर कैसे तय होता है सरचार्ज
आम तौर पर कई लोगों को यह गलतफहमी हो जाती है कि यह सरचार्ज पूरे बिजली बिल पर वसूला जाता है लेकिन असलियत इससे अलग है। यह अतिरिक्त भार केवल विद्युत ऊर्जा शुल्क पर ही लगाया जाता है। इसे एक आसान उदाहरण से ऐसे समझा जा सकता है कि यदि किसी उपभोक्ता की तीन सौ यूनिट की मासिक खपत पर ऊर्जा शुल्क एक हजार पांच सौ छिहत्तर रुपये पचास पैसे बनता है, तो पांच दशमलव शून्य छह तीन फीसदी की दर से यह सरचार्ज करीब उन्यासी रुपये बयासी पैसे बैठेगा। इसी तरह यदि पांच सौ यूनिट की खपत पर ऊर्जा शुल्क तीन हजार चौबीस रुपये पचास पैसे है, तो यही सरचार्ज बढ़कर लगभग एक सौ तरेपन रुपये तेईस पैसे हो जाएगा। साफ है कि उपभोक्ता को अपने पूरे बिल की कुल राशि पर पांच दशमलव शून्य छह तीन फीसदी का भुगतान बिल्कुल नहीं करना होगा।
विशेषज्ञों की राय और गणना का गणित
बिजली मामलों के गहरे जानकार और सेवानिवृत्त एडिशनल चीफ इंजीनियर राजेंद्र अग्रवाल ने इस पूरे गणित को स्पष्ट करते हुए बताया है कि पुरानी चार दशमलव पांच नौ फीसदी की दर की तुलना में अब तीन सौ यूनिट की खपत पर उपभोक्ता को लगभग सात रुपये छियालीस पैसे और पांच सौ यूनिट पर लगभग चौदह रुपये इकतीस पैसे की अतिरिक्त राशि देनी होगी। इसी तरह सौ यूनिट की खपत पर यह बढ़ोतरी लगभग दो रुपये छियालीस पैसे और दो सौ यूनिट पर लगभग चार रुपये बारह पैसे ज्यादा होगी। जानकारों का मानना है कि बिल में आने वाले बड़े अंतर को सिर्फ इस सरचार्ज की बढ़ी हुई दर से जोड़कर देखना पूरी तरह से सही नहीं है। इसके पीछे वजह यह है कि किसी भी वास्तविक बिजली बिल में फिक्स्ड चार्ज, मीटर का शुल्क, बिजली शुल्क, सरकारी सब्सिडी और अन्य तरह के कई दूसरे शुल्क भी जुड़े होते हैं, जिसके कारण अंतिम भुगतान की जाने वाली कुल राशि अलग हो सकती है।
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सरचार्ज से जुड़ी अन्य जरूरी बातें
विशेषज्ञ राजेंद्र अग्रवाल के मुताबिक चूंकि यह सरचार्ज पूरे बिल पर न लगकर सिर्फ ऊर्जा शुल्क पर लगता है, इसलिए बिल में ऊर्जा शुल्क और इस सरचार्ज की रकम अलग-अलग स्पष्ट रूप से दिखाई देगी। इससे आम उपभोक्ता अपने ऊपर पड़ने वाले वास्तविक अतिरिक्त वित्तीय भार को बहुत आसानी से समझ सकेंगे। अधिकारियों का कहना है कि आने वाले समय में इस पूरी प्रक्रिया की वास्तविक लागत का ट्रू-अप भी किया जा सकता है। इसके साथ ही यह बात भी ध्यान रखने योग्य है कि यह सरचार्ज बिजली की मूल दरों में कोई स्थायी बढ़ोतरी नहीं है बल्कि यह केवल बाजार के हिसाब से होने वाला बदलाव है।
विभिन्न स्लैब और दरों का गणित
राज्य में बिजली उपभोक्ताओं के लिए ऊर्जा शुल्क अलग-अलग स्लैब के आधार पर पहले से ही तय किए गए हैं। मौजूदा नियमों के मुताबिक पहले पचास यूनिट तक चार रुपये इकहत्तर पैसे, इक्यावन से एक सौ पचास यूनिट तक पांच रुपये सड़सठ पैसे, एक सौ इक्यावन से तीन सौ यूनिट तक सात रुपये पांच पैसे और तीन सौ यूनिट से ऊपर की खपत पर सात रुपये चौबीस पैसे प्रति यूनिट का शुल्क लिया जाता है। यही कारण है कि एफपीपीएएस सरचार्ज का प्रभाव भी हर यूनिट पर एक जैसा नहीं पड़ेगा। जानकारों के अनुसार ऊर्जा शुल्क पर इसका कुल असर लगभग चौबीस से सैंतीस पैसे प्रति यूनिट के बीच ही पड़ेगा।
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मूल लागत में बदलाव के कारण होता है समायोजन
हकीकत यह है कि बिजली का उत्पादन करने और उसे बाजार से खरीदने की लागत हर महीने एक जैसी नहीं रहती है। कोयला, ईंधन और बिजली की खरीद से जुड़े दामों में जब भी फेरबदल होता है, तो उसकी भरपाई करने के लिए ही इस तरह का सरचार्ज लगाया जाता है। इसका सीधा मतलब यह है कि यह किसी भी तरह की स्थायी बढ़ोतरी नहीं है बल्कि यह बिजली खरीद की लागत का एक मासिक समायोजन मात्र है। इसका मतलब यह हुआ कि भविष्य में यदि बिजली बनाने की लागत बढ़ती है तो यह सरचार्ज भी बढ़ाया जा सकता है और यदि लागत में कमी आती है तो इसे कम भी किया जा सकता है।
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