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Betul District History: मध्यप्रदेश का गौरव बैतूल: जहां से निकलती हैं 5 नदियां और बसता है अनोखा इतिहास

Betul District History: Betul, the pride of Madhya Pradesh: where 5 rivers originate and a unique history resides.

Betul District History: मध्यप्रदेश का गौरव बैतूल: जहां से निकलती हैं 5 नदियां और बसता है अनोखा इतिहास
Betul District History: मध्यप्रदेश का गौरव बैतूल: जहां से निकलती हैं 5 नदियां और बसता है अनोखा इतिहास

रामकिशोर पवार, बैतूल (Betul District History)। मध्यप्रदेश का आदिवासी बहुल जिला बैतूल आज अपनी 204वीं वर्षगांठ मना रहा है। 15 मई 1822 को अंग्रेजी शासन के दौरान जिले का गठन किया गया था। खास बात यह है कि देश में बेतूल ऐसा जिला माना जाता है जिसकी भौगोलिक सीमाओं में आज तक कोई बदलाव नहीं हुआ। प्राकृतिक संपदा, ऐतिहासिक धरोहर, नदियों के उद्गम, कोयला उत्पादन, सागौन के जंगल और सांस्कृतिक विविधता के कारण बेतूल की पहचान पूरे देश में अलग मानी जाती है।

मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र की सीमा पर स्थित बैतूल जिला आज अपने गठन के 204 वर्ष पूरे कर चुका है। यह मध्यप्रदेश का 49वां आदिवासी बहुल जिला है। अंग्रेजी शासनकाल में 15 मई 1822 को बैतूल जिले का गठन किया गया था। बाद में स्वतंत्र भारत में राज्य पुनर्गठन के दौरान 1 नवंबर 1956 को इसे मध्यप्रदेश में शामिल किया गया। पहले यह क्षेत्र सीपी एंड बरार का हिस्सा था।

बैतूल को अखंड भारत का केंद्र बिंदु भी कहा जाता है। जिले का क्षेत्रफल 10 हजार 43 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। यहां 1344 गांव, 558 ग्राम पंचायतें और 10 जनपद पंचायतें हैं। जिले में चार पहाड़ी किले और एक मैदान किला भी मौजूद है, जो इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को दर्शाते हैं।

ताप्ती नदी से जुड़ी है जिले की पहचान

बैतूल जिले की सबसे बड़ी पहचान सूर्यपुत्री ताप्ती नदी से मानी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ताप्ती नदी भगवान सूर्य नारायण और उनकी पत्नी छाया की पुत्री है। ताप्ती का उद्गम बेतूल जिले के मुलताई क्षेत्र से होता है। यह नदी पश्चिम दिशा की ओर बहते हुए अरब सागर में मिलती है।

जिले की झापल पहाड़ी भी विशेष महत्व रखती है। यहां स्थित एक कुंड से पांच नदियों का उद्गम माना जाता है। इनमें मोरंड, गंजाल, भाजी, काजी और खंडू नदी शामिल हैं। इनमें से दो नदियां ताप्ती में और तीन नर्मदा नदी में जाकर मिलती हैं। इसी कारण बेतूल को नदियों की धरती भी कहा जाता है।

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कुकरू की पहाड़ी और कॉफी बागान

बैतूल जिले का कुकरू क्षेत्र समुद्र तल से लगभग 1137 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह इलाका प्राकृतिक सुंदरता और ठंडे मौसम के लिए जाना जाता है। वर्ष 1906 में यहां कॉफी की खोज की गई थी। बाद में वर्ष 1944 में ब्रिटिश महिला मिस फ्लोरेंस हेंडक्सि ने यहां कॉफी बागान की स्थापना की।

करीब 44 हेक्टेयर में फैले इस कॉफी बागान की कॉफी अंग्रेज अधिकारियों की पहली पसंद मानी जाती थी। इंग्लैंड और पोलैंड से आने वाले अंग्रेज यहां की कॉफी का स्वाद लेने पहुंचते थे। यह क्षेत्र आज भी अपनी ऐतिहासिक पहचान के लिए जाना जाता है।

जनसंख्या और साक्षरता के आंकड़े

जनगणना संचालन निदेशालय द्वारा जारी वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार बैतूल जिले की कुल आबादी 15 लाख 75 हजार 362 थी। इसमें 7 लाख 99 हजार 236 पुरुष और 7 लाख 76 हजार 126 महिलाएं शामिल थीं। वर्ष 2001 में जिले की आबादी 13 लाख 95 हजार 175 थी। इस तरह 10 वर्षों में जनसंख्या में 12.92 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।

जिले की औसत साक्षरता दर 68.90 प्रतिशत दर्ज की गई। पुरुष साक्षरता दर 76.65 प्रतिशत और महिला साक्षरता दर 60.94 प्रतिशत रही। जिले में कुल 9 लाख 39 हजार 769 लोग साक्षर पाए गए, जिनमें 5 लाख 29 हजार 783 पुरुष और 4 लाख 9 हजार 986 महिलाएं शामिल थीं।

लिंग अनुपात के मामले में भी बैतूल की स्थिति राष्ट्रीय औसत से बेहतर रही। जिले में प्रति 1000 पुरुषों पर 971 महिलाएं दर्ज की गईं, जबकि राष्ट्रीय औसत 940 था। बाल लिंग अनुपात 957 लड़कियां प्रति 1000 लड़कों का दर्ज किया गया।

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धार्मिक विविधता भी है खास

वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार जिले में हिंदू समुदाय की आबादी सबसे अधिक रही। कुल जनसंख्या में हिंदुओं की हिस्सेदारी 95.58 प्रतिशत रही। इसके अलावा मुस्लिम समुदाय 2.39 प्रतिशत, ईसाई 0.21 प्रतिशत, सिख 0.07 प्रतिशत, बौद्ध 0.61 प्रतिशत, जैन 0.24 प्रतिशत और अन्य समुदाय 0.83 प्रतिशत दर्ज किए गए। जनगणना में आदिवासी समुदाय को हिंदू वर्ग में शामिल किया गया था।

एक ऐसा स्थान जहां पानी दो समुद्रों तक पहुंचता है

बैतूल जिले की मुलताई वन परिक्षेत्र स्थित वन विश्राम गृह परिसर में एक अनोखा प्राकृतिक स्थल मौजूद है। यहां एक बरगद के पेड़ की डालियों से गिरने वाला बारिश का पानी दो अलग दिशाओं में बहता है। एक दिशा का पानी ताप्ती नदी में पहुंचकर अरब सागर तक जाता है, जबकि दूसरी दिशा का पानी वर्धा नदी में बहकर बंगाल की खाड़ी तक पहुंचता है।

वर्धा नदी का उद्गम जिले के खैरवानी गांव के पास माना जाता है। इस नदी के किनारे सेवाग्राम वर्धा स्थित है। वहीं ताप्ती नदी के किनारे जलगांव, भुसावल और सूरत जैसे बड़े शहर बसे हुए हैं।

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कोयला उत्पादन में भी महत्वपूर्ण स्थान

बैतूल जिला खनिज संपदा के लिए भी जाना जाता है। यहां बड़ी मात्रा में कोयले का उत्पादन होता है। बताया जाता है कि 18वीं शताब्दी में अंग्रेजों ने समुद्री जहाजों के भाप इंजन के लिए यहां कोयले की खोज की थी। सलैया क्षेत्र से रेलमार्ग के जरिए कोयला इटारसी होते हुए मुंबई तक पहुंचाया जाता था।

जिले के पाथरखेड़ा क्षेत्र में वेस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड की भूमिगत कोयला खदानें मौजूद हैं। इसके पास ही सतपुड़ा ताप विद्युत गृह स्थित है, जहां कोयले से बिजली उत्पादन किया जाता है।

शिकार और सागौन के जंगलों के लिए भी प्रसिद्ध रहा जिला

ब्रिटिश शासनकाल से लेकर स्वतंत्र भारत के शुरुआती दशकों तक बैतूल जिले के जंगल शिकार के लिए प्रसिद्ध रहे। देश और विदेश की कई प्रसिद्ध हस्तियां यहां शिकार के लिए पहुंचती थीं। नागपुर के नरेंद्र कुमार सालवे की कंपनी इन लोगों को शिकार परमिट जारी करती थी।

जिले में सबसे अधिक शेरों का शिकार करने का रिकॉर्ड जमशेद बट्ट के नाम दर्ज बताया जाता है। बैतूल के जंगलों में मिलने वाला सागौन लकड़ी भी दुनिया भर में प्रसिद्ध रही है। कहा जाता है कि यहां के सागौन का उपयोग ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया के बकिंघम पैलेस और भारत की संसद भवन में भी किया गया।

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तिखाड़ी तेल की अनोखी पहचान

बैतूल जिले की सीमा से लगे गांवों में तिखाड़ी घास से निकाला जाने वाला विशेष तेल तैयार किया जाता है। इसे बेतूल ऑयल के नाम से जाना जाता है। यह तेल अपनी खास खुशबू और उपयोगिता के कारण अलग पहचान रखता है।

बैतूल नाम का अर्थ भी खास

अंग्रेजी शासनकाल में बैतूल को लेकर एक विशेष व्याख्या भी प्रचलित रही। अंग्रेज अधिकारियों ने बेतूल शब्द के अक्षरों का अलग-अलग अर्थ बताया था।

  • बी का अर्थ खिलना बताया गया, जो जीवन की चमक और विकास को दर्शाता है।
  • ई का अर्थ सहज जीवन से जोड़ा गया।
  • टी का मतलब लगातार प्रयास करना बताया गया।
  • यू का अर्थ मजबूत और अटूट आत्मविश्वास माना गया।
  • एल को चमक और पहचान का प्रतीक बताया गया।
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गुप्तकालीन इतिहास के भी मिलते हैं प्रमाण

बैतूल जिले में प्राचीन इतिहास के कई प्रमाण भी मौजूद हैं। ग्राम पंचायत सावंगा से बारहलिंग पैदल मार्ग पर हाथीखुर नामक स्थान पर शंखलिपि पाई गई है। नाले के किनारे पत्थरों पर उकेरी गई इस शंखलिपि को गुप्तकालीन माना जाता है।

इसके अलावा जिले के तिवरखेड़ और नरखेड़ क्षेत्रों में गुप्तकाल से जुड़े ताम्रपत्र और सिक्के भी मिले हैं। इससे पता चलता है कि बेतूल का इतिहास केवल प्राकृतिक संपदा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र प्राचीन सभ्यता और संस्कृति का भी महत्वपूर्ण केंद्र रहा है।

आज भी कायम है बैतूल की अलग पहचान

प्राकृतिक संपदा, ऐतिहासिक विरासत, आदिवासी संस्कृति, नदियों के उद्गम, खनिज संपदा और वन संपदा के कारण बैतूल की पहचान देशभर में अलग मानी जाती है। यही वजह है कि जिले के बारे में अक्सर कहा जाता है कि दुनिया में बैतूल जैसा दूसरा कोई नहीं है। 204 साल पूरे होने पर जिले के लोग अपने इतिहास, संस्कृति और गौरवशाली पहचान पर गर्व महसूस कर रहे हैं।

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उत्तम मालवीय

मैं इस न्यूज वेबसाइट का ऑनर और एडिटर हूं। वर्ष 2001 से पत्रकारिता में सक्रिय हूं। सागर यूनिवर्सिटी से एमजेसी (मास्टर ऑफ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री प्राप्त की है। नवभारत भोपाल से अपने करियर की शुरुआत करने के बाद दैनिक जागरण भोपाल, राज एक्सप्रेस भोपाल, नईदुनिया और जागरण समूह के समाचार पत्र 'नवदुनिया' भोपाल में वर्षों तक सेवाएं दी। अब इस न्यूज वेबसाइट "Betul Update" का संचालन कर रहा हूं। मुझे उत्कृष्ट पत्रकारिता के लिए प्रतिष्ठित सरोजिनी नायडू पुरस्कार प्राप्त करने का सौभाग्य भी नवदुनिया समाचार पत्र में कार्यरत रहते हुए प्राप्त हो चुका है।

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