High Court: मकान मालिक के लिए हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, बेटे की पढ़ाई के लिए दूसरे शहर में रहना माना जायज
High Court: Major ruling for landlords; living in another city for a son's education deemed a valid reason.

High Court: मकान मालिक यदि यह साबित कर देता है कि उसे अपने बेटे की पढ़ाई या परिवार के किसी सदस्य के बेहतर इलाज के लिए दूसरे शहर में रहना जरूरी है, तो उसे यह भी साबित करने की जरूरत नहीं है कि उसने उसी शहर को क्यों चुना। परिवार की जरूरत के हिसाब से कौन-सी जगह सबसे उपयुक्त है, इसका निर्णय मकान मालिक और उसके परिवार से बेहतर कोई दूसरा नहीं कर सकता। इंदौर के खजराना क्षेत्र की खिजराबाद कॉलोनी स्थित एक मकान से जुड़े विवाद में हाईकोर्ट ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए किराएदार की सेकंड अपील खारिज कर दी।
बेटे की पढ़ाई के लिए इंदौर में रहना जरूरी माना
जस्टिस पवन कुमार द्विवेदी की कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और प्रथम अपीलीय कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। कोर्ट ने माना कि मकान मालिक ने दस्तावेजों के माध्यम से यह साबित कर दिया है कि उसका बेटा कंपनी सेक्रेटरी का कोर्स कर रहा है। ऐसे में यदि पिता और बेटा यह मानते हैं कि कोर्स के दौरान इंदौर में रहना उनके लिए अधिक सुविधाजनक है, तो यह उनका व्यक्तिगत निर्णय है।
कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति की वास्तविक जरूरत के लिए कौन-सी जगह बेहतर है, इसका सबसे सही आकलन वही व्यक्ति और उसका परिवार कर सकता है। निचली अदालतों ने बेटे की वास्तविक जरूरत को स्वीकार किया था और हाईकोर्ट ने इस निष्कर्ष को सही माना।
23 साल से किराए पर था मकान
यह विवाद इंदौर के खजराना क्षेत्र की खिजराबाद कॉलोनी में स्थित प्लॉट नंबर 36-बी के मकान से संबंधित है। मकान मालिक के मुताबिक, 18 जनवरी 2003 को यह मकान 1100 रुपए प्रतिमाह के किराए पर दिया गया था। उसी दिन किराए का एग्रीमेंट भी तैयार किया गया था।
मकान मालिक ने आरोप लगाया कि किराएदार नियमित रूप से किराया नहीं चुका रहा था। इसके अलावा मकान में बिजली के अवैध इस्तेमाल को लेकर बिजली चोरी का मामला भी दर्ज हुआ था। बिजली कनेक्शन मकान मालिक के नाम पर होने के कारण इस मामले में उसे भी परेशानी उठानी पड़ी।
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परिवार की जरूरत बताते हुए मांगा मकान का कब्जा
बेदखली के लिए दायर मुकदमे में मकान मालिक ने परिवार की परिस्थितियों का भी उल्लेख किया था। बताया गया कि उसके पति हाइपरटेंशन से पीड़ित हैं और जल्द ही सेवानिवृत्त होने वाले हैं। बड़ा बेटा कंपनी सेक्रेटरी का कोर्स कर रहा है और अपनी आगे की पढ़ाई के लिए इंदौर में रहना चाहता है। वहीं छोटा बेटा 12वीं कक्षा पूरी करने के बाद इंदौर में बीई में प्रवेश लेना चाहता है। इन परिस्थितियों के आधार पर मकान मालिक ने अदालत के सामने मकान की वास्तविक और जरूरी आवश्यकता होने की बात रखी थी।
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ट्रायल कोर्ट ने खाली करने का दिया था आदेश
ट्रायल कोर्ट ने मकान मालिक की जरूरत को वास्तविक मानते हुए 10 अगस्त 2024 को मकान खाली करने का आदेश दिया था। अदालत ने किराएदार को दो महीने के भीतर मकान का कब्जा सौंपने के निर्देश दिए थे। इसके साथ ही 1.04 लाख रुपए का बकाया किराया भी चुकाने को कहा गया था।
इसके बाद किराएदार ने निचली अदालत के फैसले के खिलाफ अपील की, लेकिन प्रथम अपीलीय कोर्ट ने भी ट्रायल कोर्ट के निर्णय को उचित माना। मामला आगे हाईकोर्ट पहुंचा, जहां जस्टिस पवन कुमार द्विवेदी की कोर्ट ने भी निचली अदालतों के फैसले में हस्तक्षेप करने का आधार नहीं पाया और किराएदार की सेकंड अपील खारिज कर दी।
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