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Tribal Diwali Traditions: खेतों में दीप जलाकर फसल को मानते हैं माता लक्ष्मी का स्वरूप, वनांचल में अनूठे तरीके से मनाया जाता है दीपोत्सव

Tribal Diwali Traditions: In forest regions, the festival of lights is celebrated in a unique way—lamps are lit in the fields, where the crops are revered as a manifestation of Goddess Lakshmi.

Tribal Diwali Traditions: खेतों में दीप जलाकर फसल को मानते हैं माता लक्ष्मी का स्वरूप, वनांचल में अनूठे तरीके से मनाया जाता है दीपोत्सव
Tribal Diwali Traditions: खेतों में दीप जलाकर फसल को मानते हैं माता लक्ष्मी का स्वरूप, वनांचल में अनूठे तरीके से मनाया जाता है दीपोत्सव

Tribal Diwali Traditions: देशभर में रोशनी के पर्व के रूप में मनाई जाने वाली दीपावली का आदिवासी इलाकों में एक बिल्कुल अलग और बेहद मनमोहक स्वरूप देखने को मिलता है। इन ग्रामीण क्षेत्रों में यह पावन त्योहार केवल घरों को सजाने या केवल धन की पूजा करने तक सीमित नहीं रहता है, बल्कि यह हमारे जंगल, उपजाऊ जमीन, जल स्रोतों, लहलहाती फसलों और पर्यावरण के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करने का एक खास जरिया माना जाता है। आदिवासी समाज की पुरानी परंपराएं प्रकृति के साथ उनके अटूट बंधन को बयां करती हैं। इस पांच दिवसीय दीपोत्सव के दौरान ग्रामीण वनदेवी, ठाकुर बाबा और बघासुर के पवित्र स्थानों पर दीपदान करते हैं, जबकि खेतों में दीये जलाकर अपनी फसल को माता लक्ष्मी का साक्षात रूप मानकर उसकी पूजा करते हैं।

दीवाली जगाने की अनूठी परंपरा और लोकनृत्य

त्योहार की रात वनांचल के गांवों में जश्न का माहौल रहता है, जिसे स्थानीय लोग ‘दिवाली जगाने’ की परंपरा कहते हैं। सभी लोग एक जगह इकट्ठा होकर ढोल और मांदर की थाप पर पारंपरिक लोकनृत्य करते हैं। यह आनंद केवल एक रात तक सीमित नहीं रहता, बल्कि नृत्य और उल्लास का यह दौर एकादशी तिथि तक चलता है। गांव के लोगों की टोलियां हर घर जाकर अपनी लोक कला प्रस्तुत करती हैं। इससे घरों में खुशियां तो आती ही हैं, साथ ही आपसी भाईचारा और सामाजिक एकता का संदेश भी समाज के हर वर्ग तक पहुंचता है।

नई पीढ़ी को मिल रहा जड़ों से जुड़ने का संदेश

आदिवासी समाज की यह दीपावली हमें यह सिखाती है कि पर्वों का असली सुख सिर्फ दिखावे में नहीं, बल्कि प्रकृति और जीवन के आधार के प्रति सम्मान में है। जहां घर के दीये उजाला करते हैं, वहीं खेत के दीये अन्न के मूल्य को बताते हैं। वनदेवी और बघासुर के यहां दीपदान से जंगल और वन्यजीवों से प्रेम झलकता है। एकादशी तक चलने वाले यह अनुष्ठान नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति से जोड़ते हैं और प्रकृति की रक्षा तथा श्रम का आदर करना सिखाते हैं।

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उत्तम मालवीय

मैं इस न्यूज वेबसाइट का ऑनर और एडिटर हूं। वर्ष 2001 से पत्रकारिता में सक्रिय हूं। सागर यूनिवर्सिटी से एमजेसी (मास्टर ऑफ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री प्राप्त की है। नवभारत भोपाल से अपने करियर की शुरुआत करने के बाद दैनिक जागरण भोपाल, राज एक्सप्रेस भोपाल, नईदुनिया और जागरण समूह के समाचार पत्र 'नवदुनिया' भोपाल में वर्षों तक सेवाएं दी। अब इस न्यूज वेबसाइट "Betul Update" का संचालन कर रहा हूं। मुझे उत्कृष्ट पत्रकारिता के लिए प्रतिष्ठित सरोजिनी नायडू पुरस्कार प्राप्त करने का सौभाग्य भी नवदुनिया समाचार पत्र में कार्यरत रहते हुए प्राप्त हो चुका है।

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