MP Electricity Tariff Hike: मध्यप्रदेश में बिजली कंपनियों को ₹34,561 करोड़ का घाटा, 1 अप्रैल के बाद महंगी हो सकती है बिजली
MP Electricity Tariff Hike: 9 साल में भारी नुकसान के बाद बिजली कंपनियों ने दर बढ़ाने की सिफारिश की, प्रदेश के लगभग 1.75 करोड़ उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है असर

MP Electricity Tariff Hike: मध्यप्रदेश की बिजली वितरण कंपनियों की आर्थिक स्थिति को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। बिजली चोरी, लाइन लॉस और बकाया वसूली में कमजोरी के कारण कंपनियों को लगातार नुकसान उठाना पड़ रहा है। विधानसभा में पेश किए गए आंकड़ों से पता चला है कि पिछले नौ वर्षों में प्रदेश की तीनों बिजली वितरण कंपनियों को कुल 34 हजार 561 करोड़ रुपये का घाटा हुआ है। ऐसे में आशंका जताई जा रही है कि इस घाटे की भरपाई के लिए एक बार फिर बिजली दरों में बढ़ोतरी की जा सकती है, जिसका असर करोड़ों उपभोक्ताओं पर पड़ेगा।
34 हजार करोड़ से अधिक का घाटा
मध्यप्रदेश की मध्य, पूर्व और पश्चिम क्षेत्र की बिजली वितरण कंपनियों ने विधानसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में पिछले नौ वर्षों के आय-व्यय का विवरण प्रस्तुत किया है। इस जानकारी के अनुसार पूर्व क्षेत्र बिजली वितरण कंपनी को 16 हजार 188.48 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। वहीं पश्चिम क्षेत्र बिजली वितरण कंपनी को 3 हजार 767 करोड़ रुपये का घाटा दर्ज किया गया है।
इसी तरह मध्य क्षेत्र बिजली वितरण कंपनी को 14 हजार 605.88 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। इन तीनों कंपनियों के घाटे को मिलाकर देखा जाए तो पिछले नौ वर्षों में कुल 34 हजार 561 करोड़ रुपये का नुकसान सामने आया है। यह आंकड़ा बिजली वितरण व्यवस्था की चुनौतियों को स्पष्ट रूप से दर्शाता है।
पूर्व और मध्य क्षेत्र कंपनियां लगातार घाटे में
आंकड़ों के अनुसार पूर्व और मध्य क्षेत्र की बिजली वितरण कंपनियां पिछले नौ वर्षों से लगातार घाटे में चल रही हैं। घाटे को कम करने के लिए चार हजार करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए जाने के बावजूद इन कंपनियों की आर्थिक स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हो सका है। पूर्व क्षेत्र बिजली वितरण कंपनी को वर्ष 2018-19 में सबसे अधिक 2896 करोड़ रुपये का घाटा हुआ था। इसके बाद वर्ष 2022-23 में यह घाटा 2451 करोड़ रुपये दर्ज किया गया। वहीं वर्ष 2024-25 के लिए कंपनी ने 1047 करोड़ रुपये का घाटा दिखाया है।
मध्य क्षेत्र बिजली वितरण कंपनी की स्थिति भी कुछ ऐसी ही रही है। वर्ष 2018-19 में इस कंपनी को 3837 करोड़ रुपये का सबसे अधिक नुकसान हुआ था। इसके बाद वर्ष 2024-25 में कंपनी ने 1570 करोड़ रुपये के घाटे का आंकड़ा प्रस्तुत किया है। इससे साफ है कि लगातार प्रयासों के बावजूद दोनों कंपनियां नुकसान से उबर नहीं पाई हैं।
बिजली दर बढ़ाने की सिफारिश
प्रदेश की तीनों बिजली वितरण कंपनियों में से केवल पश्चिम क्षेत्र बिजली वितरण कंपनी ने कुछ वर्षों में लाभ दर्ज किया है। बीच के वर्षों में इस कंपनी ने लगभग 2440 करोड़ रुपये का मुनाफा दिखाया था। इन कंपनियों ने मध्यप्रदेश विद्युत नियामक आयोग के सामने भी इसी तरह के घाटे के आंकड़े पेश करते हुए बिजली दरों में बढ़ोतरी की सिफारिश की है। बताया जा रहा है कि आयोग ने कंपनियों के प्रस्तावों की जांच लगभग पूरी कर ली है। यदि आयोग इन सिफारिशों को मंजूरी देता है तो 1 अप्रैल के बाद कभी भी बिजली की दरों में बढ़ोतरी की घोषणा की जा सकती है। इसका असर प्रदेश के लगभग पौने दो करोड़ बिजली उपभोक्ताओं पर पड़ेगा।
सरकार से मिली बड़ी आर्थिक सहायता
बिजली वितरण कंपनियों के घाटे को कम करने के लिए केंद्र और राज्य सरकार की ओर से विभिन्न योजनाओं के तहत बड़ी आर्थिक सहायता भी दी गई है। बीते वर्षों में इन कंपनियों को हजारों करोड़ रुपये की मदद प्रदान की गई। हाल के समय में ही तीनों बिजली कंपनियों को चार हजार करोड़ रुपये से अधिक की अतिरिक्त राशि भी दी गई थी, ताकि वे अपने वित्तीय घाटे को कम कर सकें। इसके बावजूद कंपनियों की आर्थिक स्थिति में स्थायी सुधार नहीं हो सका है।
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पश्चिम क्षेत्र कंपनी बनी उदाहरण
प्रदेश की तीनों कंपनियों में पश्चिम क्षेत्र बिजली वितरण कंपनी ने हाल के वर्षों में बेहतर प्रदर्शन का उदाहरण पेश किया है। पिछले चार वित्तीय वर्षों में वर्ष 2021 से 2024 के बीच यह कंपनी भी क्रमशः 1790 करोड़, 1130 करोड़ और 125 करोड़ रुपये के घाटे में रही थी। हालांकि वर्ष 2024-25 में कंपनी ने 730 करोड़ रुपये का लाभ दर्ज किया है। विभाग का कहना है कि इस सुधार के पीछे बिजली चोरी पर नियंत्रण, स्मार्ट मीटर का उपयोग और नई तकनीक का प्रयोग प्रमुख कारण रहे हैं।
इसके अलावा बिल वसूली की प्रक्रिया को मजबूत किया गया और फीडर सेपरेशन, डिजिटल मॉनिटरिंग तथा डेटा एनालिटिक्स का उपयोग कर नुकसान कम करने की कोशिश की गई। अब सवाल यह उठ रहा है कि जब पश्चिम क्षेत्र कंपनी अपने प्रबंधन और तकनीकी उपायों से घाटे को कम कर सकती है, तो मध्य और पूर्व क्षेत्र की कंपनियां भी इसी तरह के मॉडल को अपनाकर अपनी स्थिति क्यों नहीं सुधार पा रही हैं।
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