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Strait of Hormuz Oil Supply: होर्मुज़ के समुद्री रास्ते पर संकट की आशंका, यहां रुकावट हुई तो दुनिया भर में महंगे होंगे पेट्रोल-डीजल और गैस

Strait of Hormuz Oil Supply: सिर्फ दो मील चौड़ा यह समुद्री रास्ता संभालता है दुनिया की 20% ऊर्जा आपूर्ति, अवरोध हुआ तो एशिया की अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर

Strait of Hormuz Oil Supply: होर्मुज़ के समुद्री रास्ते पर संकट की आशंका, यहां रुकावट हुई तो दुनिया भर में महंगे होंगे पेट्रोल-डीजल और गैस
Strait of Hormuz Oil Supply: होर्मुज़ के समुद्री रास्ते पर संकट की आशंका, यहां रुकावट हुई तो दुनिया भर में महंगे होंगे पेट्रोल-डीजल और गैस

Strait of Hormuz Oil Supply: दुनिया की ऊर्जा व्यवस्था कई बार ऐसे भौगोलिक स्थानों पर निर्भर हो जाती है जो नक्शे में बहुत छोटे दिखाई देते हैं, लेकिन उनका महत्व बेहद बड़ा होता है। पश्चिम एशिया में स्थित स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ ऐसा ही एक समुद्री मार्ग है। यह संकरा जलडमरूमध्य वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति के लिए बेहद अहम माना जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यहां किसी कारण से आवाजाही बाधित होती है तो इसका असर सीधे एशिया की अर्थव्यवस्थाओं और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पर पड़ सकता है।

दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति का अहम रास्ता

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ लगभग दो मील चौड़ा समुद्री मार्ग है, लेकिन इसके जरिए वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है। अनुमान है कि दुनिया के करीब 20 प्रतिशत कच्चे तेल और तरलीकृत प्राकृतिक गैस का परिवहन इसी रास्ते से होता है। यही कारण है कि इस जलमार्ग को वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण चोकपॉइंट माना जाता है। यदि यहां किसी कारण से बाधा उत्पन्न होती है तो इसका प्रभाव केवल क्षेत्रीय नहीं बल्कि पूरी दुनिया के ऊर्जा बाजार पर पड़ सकता है।

एशिया पर पड़ सकता है सबसे ज्यादा असर

ज़ीरो कार्बन एनालिटिक्स की एक हालिया ब्रीफिंग में कहा गया है कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बढ़ता है और ईरान इस समुद्री मार्ग को अवरुद्ध कर देता है तो इसका सबसे बड़ा प्रभाव एशियाई देशों पर पड़ेगा। वर्ष 2024 में इस जलडमरूमध्य से गुजरने वाले लगभग 84 प्रतिशत तेल और 83 प्रतिशत एलएनजी की आपूर्ति एशियाई देशों तक पहुंची थी। इनमें चीन, भारत, जापान और दक्षिण कोरिया प्रमुख आयातक हैं। इन चार देशों ने कुल तेल प्रवाह का लगभग 75 प्रतिशत और एलएनजी आपूर्ति का करीब 59 प्रतिशत हिस्सा प्राप्त किया।

Strait of Hormuz Oil Supply: होर्मुज़ के समुद्री रास्ते पर संकट की आशंका, यहां रुकावट हुई तो दुनिया भर में महंगे होंगे पेट्रोल-डीजल और गैस
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कौन सा देश सबसे ज्यादा जोखिम में

विश्लेषण में यह भी बताया गया है कि इस स्थिति में जापान सबसे अधिक संवेदनशील देश माना जा रहा है। उसकी कुल ऊर्जा खपत का लगभग 87 प्रतिशत हिस्सा आयातित जीवाश्म ईंधनों पर आधारित है। दक्षिण कोरिया की स्थिति भी काफी हद तक ऐसी ही है, जहां लगभग 81 प्रतिशत ऊर्जा जरूरतें आयातित ईंधनों से पूरी होती हैं। दूसरी ओर चीन की आयातित जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता करीब 20 प्रतिशत और भारत की लगभग 35 प्रतिशत बताई गई है। इसी आधार पर तैयार जोखिम सूचकांक में जापान पहले स्थान पर, उसके बाद दक्षिण कोरिया, फिर भारत और चीन का स्थान बताया गया है।

तेल की कीमतों में तेज उछाल की आशंका

यदि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ में किसी तरह की बड़ी रुकावट आती है तो वैश्विक तेल बाजार में कीमतों में तेज उछाल देखने को मिल सकता है। विश्लेषकों के अनुसार ऐसी स्थिति में कच्चे तेल की कीमतें बढ़कर 130 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं, जो वर्ष 2007-08 के ऐतिहासिक स्तर के बराबर होगा। इराक के उप प्रधानमंत्री ने इससे भी ज्यादा चिंता जताते हुए कहा है कि यदि संकट गहराता है तो तेल की कीमतें 200 से 300 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकती हैं। 25 फरवरी 2026 तक ब्रेंट क्रूड की कीमत 71.40 डॉलर प्रति बैरल दर्ज की गई थी, जो 2025 के अंत की तुलना में करीब 19 प्रतिशत अधिक है।

गैस बाजार भी हो सकता है प्रभावित

इस जलमार्ग में अवरोध का असर केवल तेल तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि वैश्विक गैस बाजार भी प्रभावित हो सकता है। ऑक्सफोर्ड इंस्टीट्यूट फॉर एनर्जी स्टडीज़ के मुताबिक यदि यह समुद्री मार्ग एक वर्ष तक बंद रहता है तो वैश्विक एलएनजी आपूर्ति में लगभग 15 प्रतिशत की कमी आ सकती है। जापान जैसे देशों में एलएनजी की कीमतों में 170 प्रतिशत तक बढ़ोतरी होने की संभावना जताई गई है। ऊर्जा संकट के दौरान इसका असर सीधे आम लोगों के बिजली बिलों पर भी पड़ सकता है। उदाहरण के तौर पर वर्ष 2022 के ऊर्जा संकट के दौरान जापान में घरेलू बिजली बिल औसतन 25.8 प्रतिशत तक बढ़ गए थे और सरकार को उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए बड़े आर्थिक पैकेज की घोषणा करनी पड़ी थी।

ऊर्जा सुरक्षा और जलवायु रणनीति का सवाल

विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति केवल ऊर्जा आपूर्ति की समस्या नहीं बल्कि आर्थिक और जलवायु रणनीति से भी जुड़ी हुई है। जब कोई देश अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयातित जीवाश्म ईंधनों पर निर्भर होता है तो वह भू-राजनीतिक घटनाओं से ज्यादा प्रभावित हो सकता है। इसलिए कई विशेषज्ञ नवीकरणीय ऊर्जा और ऊर्जा विद्युतीकरण को दीर्घकालिक समाधान के रूप में देखते हैं।

यूरोप ने दिखाई नई दिशा

रूस और यूक्रेन के बीच वर्ष 2022 में शुरू हुए युद्ध के बाद यूरोपीय देशों ने अपनी ऊर्जा नीति में बड़े बदलाव किए। वर्ष 2021 में जहां यूरोप का गैस आयात 361.5 बिलियन क्यूबिक मीटर था, वहीं 2025 तक यह घटकर 313.5 बिलियन क्यूबिक मीटर रह गया। फ्रांस और जर्मनी जैसे देशों ने ऊर्जा दक्षता बढ़ाने और नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार के जरिए गैस खपत में उल्लेखनीय कमी दर्ज की।

जापान के सामने ऊर्जा संतुलन की चुनौती

जापान की ऊर्जा नीति भी पिछले वर्षों में बड़े बदलावों से गुजरी है। वर्ष 2011 में फुकुशिमा परमाणु दुर्घटना के बाद जापान ने परमाणु ऊर्जा पर अपनी निर्भरता कम कर दी थी। इसके बाद बिजली उत्पादन में जीवाश्म ईंधनों की हिस्सेदारी बढ़ गई और वर्ष 2024 तक यह लगभग 68.8 प्रतिशत तक पहुंच गई। हालांकि जापान की 2025 में घोषित सातवीं सामरिक ऊर्जा योजना में वर्ष 2040 तक बिजली उत्पादन में नवीकरणीय ऊर्जा का हिस्सा 50 प्रतिशत तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है। इसके बावजूद अनुमान है कि आने वाले वर्षों में भी 30 से 40 प्रतिशत बिजली उत्पादन आयातित जीवाश्म ईंधनों पर आधारित रह सकता है।

सौर और पवन ऊर्जा से उम्मीद

जापान में नवीकरणीय ऊर्जा की लागत में भी उल्लेखनीय गिरावट देखी गई है। वर्ष 2014 से 2023 के बीच यूटिलिटी स्तर के सौर ऊर्जा उत्पादन की लागत 80 प्रतिशत से अधिक घटकर लगभग 9.9 येन प्रति किलोवाट घंटा रह गई है, जो एलएनजी आधारित बिजली उत्पादन से सस्ती मानी जा रही है। इसके अलावा यदि वर्ष 2050 तक देश में 140 गीगावॉट पवन ऊर्जा क्षमता स्थापित होती है तो इससे करीब 3 लाख 55 हजार नए रोजगार सृजित होने की संभावना भी जताई गई है।

संकीर्ण जलमार्ग से जुड़ी बड़ी सीख

विशेषज्ञों का कहना है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ की स्थिति दुनिया को यह याद दिलाती है कि वैश्विक ऊर्जा व्यवस्था कितनी नाजुक है। एक संकरे समुद्री मार्ग में उत्पन्न संकट पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है। इसलिए स्वच्छ ऊर्जा और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों में निवेश को केवल पर्यावरण संरक्षण का कदम नहीं बल्कि आर्थिक स्थिरता और राष्ट्रीय सुरक्षा की रणनीति के रूप में भी देखा जा रहा है।

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उत्तम मालवीय

मैं इस न्यूज वेबसाइट का ऑनर और एडिटर हूं। वर्ष 2001 से पत्रकारिता में सक्रिय हूं। सागर यूनिवर्सिटी से एमजेसी (मास्टर ऑफ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री प्राप्त की है। नवभारत भोपाल से अपने करियर की शुरुआत करने के बाद दैनिक जागरण भोपाल, राज एक्सप्रेस भोपाल, नईदुनिया और जागरण समूह के समाचार पत्र 'नवदुनिया' भोपाल में वर्षों तक सेवाएं दी। अब इस न्यूज वेबसाइट "Betul Update" का संचालन कर रहा हूं। मुझे उत्कृष्ट पत्रकारिता के लिए प्रतिष्ठित सरोजिनी नायडू पुरस्कार प्राप्त करने का सौभाग्य भी नवदुनिया समाचार पत्र में कार्यरत रहते हुए प्राप्त हो चुका है।

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