MP Police Promotion: प्रमोशन को लेकर सरकारी सुस्ती पर सख्त हुआ कैट, कैडर रिव्यू के लिए 120 दिन का अल्टीमेटम
MP Police Promotion: सरकारी सेवाओं में पदोन्नति और कैडर प्रबंधन को लेकर वर्षों से चली आ रही सुस्ती पर केन्द्रीय प्रशासनिक अधिकरण ने कड़ा रुख अपनाया है। जबलपुर में दिए गए एक अहम आदेश में ट्रिब्यूनल ने साफ कहा है कि कैडर रिव्यू कोई औपचारिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि केंद्र और राज्य सरकारों की अनिवार्य जिम्मेदारी है। इस प्रक्रिया में की जा रही लगातार देरी को प्रशासनिक लापरवाही मानते हुए कैट ने समयबद्ध कार्रवाई के निर्देश दिए हैं।
कैडर रिव्यू को लेकर स्पष्ट निर्देश
केन्द्रीय प्रशासनिक अधिकरण ने अपने आदेश में कहा है कि केंद्र और राज्य सरकारों को हर पांच साल में कैडर रिव्यू करना ही होगा। इसे टालने के लिए प्रशासनिक सुस्ती, व्यस्तता या अन्य कारणों का हवाला नहीं दिया जा सकता। ट्रिब्यूनल ने कहा कि कैडर रिव्यू सरकारों की मर्जी पर निर्भर नहीं है, बल्कि यह नियमों के तहत तय जिम्मेदारी है। इस मामले में अतिरिक्त कैडर रिव्यू की प्रक्रिया को 120 दिनों के भीतर पूरा करने का आदेश दिया गया है।
पुलिस एसोसिएशन ने उठाया था मुद्दा
यह मामला मध्य प्रदेश पुलिस एसोसिएशन द्वारा उठाया गया था। एसोसिएशन ने ट्रिब्यूनल के सामने कहा कि भारतीय पुलिस सेवा कैडर नियम 1954 के अनुसार हर पांच वर्ष में कैडर रिव्यू किया जाना जरूरी है। इसके बावजूद मध्य प्रदेश में पिछले करीब बीस वर्षों से यह प्रक्रिया समय पर नहीं की गई। इसका सीधा असर राज्य पुलिस सेवा के अधिकारियों पर पड़ा है।
अन्य राज्यों से पिछड़ गया मध्य प्रदेश
एसोसिएशन ने दलील दी कि कैडर रिव्यू में देरी के कारण मध्य प्रदेश के अधिकारी अन्य राज्यों के मुकाबले पीछे रह गए हैं। इससे न सिर्फ पदोन्नति में असमानता पैदा हुई है, बल्कि कई योग्य अधिकारी आईपीएस कैडर में शामिल होने के अवसर से भी वंचित हो रहे हैं। यह स्थिति लंबे समय से बनी रहने के कारण अधिकारियों में असंतोष बढ़ता जा रहा है।
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प्रमोशन के अधिकार पर असर
याचिका में यह भी कहा गया कि यदि कैडर रिव्यू में देरी जारी रही तो कई अधिकारी 56 वर्ष की आयु पार कर जाएंगे। इसके बाद उनके लिए आईपीएस में इंडक्शन का रास्ता हमेशा के लिए बंद हो जाएगा। इससे अधिकारियों के संवैधानिक अधिकारों पर सीधा असर पड़ रहा है और उनका भविष्य प्रभावित हो रहा है।
ट्रिब्यूनल की सख्त टिप्पणी
ट्रिब्यूनल की सदस्य मालनी अय्यर और सदस्य अखिल कुमार श्रीवास्तव की पीठ ने कहा कि इस तरह की देरी से अधिकारियों के समानता और पदोन्नति से जुड़े मौलिक अधिकार प्रभावित होते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि पांच साल में कैडर रिव्यू करना कोई विकल्प नहीं, बल्कि सरकारों की बाध्यता है। इस लापरवाही को अधिकारियों के भविष्य से जुड़ा गंभीर मामला बताते हुए ट्रिब्यूनल ने राज्य पुलिस सेवा के अधिकारियों को बड़ी राहत दी है।
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लंबे समय से अटके मुद्दों के सुलझने की बढ़ी उम्मीद
इस मामले में याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता पंकज दुबे और आदित्य खंडेलवाल ने पक्ष रखा। ट्रिब्यूनल के इस आदेश को राज्य पुलिस सेवा के अधिकारियों के लिए अहम माना जा रहा है, जिससे उनके प्रमोशन और करियर से जुड़े लंबे समय से अटके मुद्दों के सुलझने की उम्मीद बढ़ी है।
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