Promotion Reservation Case MP: जबलपुर हाई कोर्ट में प्रमोशन में आरक्षण पर अहम सुनवाई, सरकार और याचिकाकर्ताओं ने रखे अपने-अपने तर्क
Promotion Reservation Case MP: मध्य प्रदेश में शासकीय सेवाओं में पदोन्नति के दौरान आरक्षण से जुड़े नियमों को लेकर जबलपुर हाई कोर्ट में एक बार फिर अहम सुनवाई हुई। यह सुनवाई मुख्य न्यायाधीश संजीव सचदेवा और न्यायमूर्ति विनय सराफ की युगलपीठ के समक्ष हुई। अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें सुनी गईं और विस्तृत चर्चा के बाद मामले की अगली सुनवाई की तारीख तय की गई।
कार्यवाही की शुरुआत याचिकाकर्ताओं की ओर से हुई। उनके वकीलों ने विभिन्न सरकारी विभागों में पदों की संख्या और आरक्षण से संबंधित आंकड़े अदालत के सामने रखे। इन आंकड़ों के जरिए यह बताने का प्रयास किया गया कि अलग-अलग वर्गों के कर्मचारियों को प्रमोशन में किस तरह का लाभ मिला है। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि प्रस्तुत डाटा से साफ होता है कि आरक्षित वर्ग के कर्मचारियों को अपेक्षाकृत अधिक और तेजी से पदोन्नति दी गई है।
लंबे समय से प्रमोशन का कर रहे इंतजार
याचिकाकर्ताओं का यह भी तर्क रहा कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग के कर्मचारी बड़ी संख्या में उच्च पदों पर पहुंच चुके हैं, जबकि अनारक्षित वर्ग के कई कर्मचारी लंबे समय से प्रमोशन का इंतजार कर रहे हैं। उनके अनुसार, इसी वजह से अनारक्षित वर्ग के कर्मचारियों के नाम ग्रेडेशन सूची में नीचे चले गए हैं।
सरकार की ओर से रखी गई यह दलीलें
याचिकाकर्ताओं की बातों के बाद राज्य शासन की ओर से पक्ष रखा गया। वरिष्ठ अधिवक्ता सीएस वैद्यनाथन ने अदालत को बताया कि पदोन्नति नियम बनाते समय सुप्रीम कोर्ट द्वारा समय-समय पर दिए गए दिशा-निर्देशों का पूरी तरह पालन किया गया है। उन्होंने कहा कि नियम तैयार करने से पहले जरूरी प्रक्रियाएं अपनाई गईं और केवल औपचारिकता नहीं निभाई गई।
राज्य सरकार के अनुसार, प्रमोशन में आरक्षण से जुड़े फैसलों के लिए क्वांटिफायबल डाटा का गहन अध्ययन किया गया। इसके साथ ही कर्मचारियों की प्रशासनिक दक्षता और कार्यक्षमता का भी आकलन किया गया। वरिष्ठ अधिवक्ता ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप एक समिति बनाई गई थी, जिसने कैडर के अनुसार डाटा की जांच की। इसी जांच के आधार पर यह तय किया गया कि किन पदों पर और किस सीमा तक आरक्षण लागू किया जाए।
हाई कोर्ट ने पूछे यह सवाल और जवाब
राज्य शासन की इन दलीलों के बाद हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं द्वारा लगाए गए आरोपों को ध्यान में रखते हुए कुछ सवाल उठाए। अदालत जानना चाहती थी कि जिन बिंदुओं पर आपत्तियां की जा रही हैं, उन पर सरकार ने किस तरह विचार किया। इन सवालों के जवाब में वरिष्ठ अधिवक्ता वैद्यनाथन ने एक-एक पहलू पर स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की।
सुनवाई के दौरान राज्य शासन की ओर से महाधिवक्ता प्रशांत सिंह, अतिरिक्त महाधिवक्ता हरप्रीत सिंह रूपराह, नीलेश यादव, जान्हवी पंडित, धीरेंद्र सिंह परमार और मृणाल एल्कर मजूमदार भी अदालत में उपस्थित रहे और उन्होंने सरकार का पक्ष मजबूती से रखा।
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क्या है यह पूरा मामला, कैसे पहुंचा कोर्ट
यह पूरा विवाद मध्य प्रदेश लोक सेवा पदोन्नति नियम-2025 को लेकर है। भोपाल निवासी डॉ. स्वाति तिवारी सहित अन्य याचिकाकर्ताओं ने इन नियमों को हाई कोर्ट में चुनौती दी है। याचिकाओं में कहा गया है कि वर्ष 2002 में बनाए गए पदोन्नति नियमों को हाई कोर्ट पहले ही आरबी राय मामले में निरस्त कर चुका है।
याचिकाकर्ताओं ने यह भी बताया कि इन पुराने नियमों के खिलाफ राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दाखिल की थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया है और मामला वहां अभी विचाराधीन है।
याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि सुप्रीम कोर्ट में मामला लंबित होने के बावजूद राज्य सरकार ने पुराने नियमों में केवल शब्दों का मामूली बदलाव कर नए नाम से नियम लागू कर दिए। उनके अनुसार, मूल भावना और ढांचा पहले जैसा ही रखा गया है, जो न्यायालय के आदेशों की अवहेलना है।
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मामले की कब होगी अगली सुनवाई
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और उपलब्ध तथ्यों पर विचार करने के बाद हाई कोर्ट ने इस मामले में अगली सुनवाई के लिए छह जनवरी की तारीख तय कर दी है। अब सभी की नजरें आने वाली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर आगे की कानूनी दिशा तय होने की उम्मीद है।
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