हस्त नक्षत्र की यह बारिश देगी बंपर पैदावार : कब करें किस फसल की बुआई, किस तरह की मिट्टी में कौनसी फसल बोना उचित

मानसून की सरकारी तौर पर भले ही बिदाई हो चुकी है, लेकिन प्रदेश और देश के कई हिस्सों में अभी भी झमाझम बारिश हो रही है। इस बारिश की फिलहाल न जरूरत है और ना ही किसान उम्मीद कर रहे थे। इसकी वजह यह है कि किसानों द्वारा महीनों तक की गई कड़ी मेहनत से तैयार फसल को यह बारिश बरबाद कर रही है। इन्हीं कारणों से इन दिनों ग्रामीण इलाकों में मायूसी पसरी है। किसान उत्साह से फसलों की कटाई करने के बजाय सर्वे और मुआवजा की मांग करते हुए आवेदन और ज्ञापन सौंपने मजबूर हैं।
हालांकि इस बारिश का एक दूसरा पहलू भी है। पर्यावरणविद, नक्षत्रों के जानकार और पुराने अनुभवों के भंडार के धनी मोहन नागर इस बारिश को भविष्य के लिए बेहद अच्छे संकेत भी मानते हैं। अपने अनुभव और अध्ययन के आधार पर उन्होंने इस बारे में विस्तृत व्याख्या की है। उन्होंने बताया कि वर्तमान हालातों से कैसे निपटें और भविष्य में अभी हो रही इस बारिश का कैसे लाभ उठाएं।

श्री नागर कहते हैं कि अपना देश गाँवों में बसा है। फसल की अच्छी पैदावार किसानों का सौभाग्य है और फसल खराब होना दुर्दिन के समान है। इस बारे में पुराना ज्ञान व लोक अनुभव हमारी सम्पदा है। हाल ही में जारी वर्षा से अनेक किसानों के चेहरे मुरझाये हैं, क्योंकि खेत में सोयाबीन की फसल पककर तैयार है।
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इस समय जो बारिश हो रही है वह असमय वर्षा नहीं अपितु वर्षा का ही हस्त नक्षत्र है। हस्त नक्षत्र की बारिश (rain of Hasta Nakshatra) कुछ समय के लिए तेज होती है, मानो हाथी ने सूंड से पानी की तेज बौछार की हो। इस कारण हस्त नक्षत्र को जनभाषा में हथिया भी कहते हैं। हथिया पूँछ डुलावे, घर बैठे गेहूँ आवै। (घाघ)… महाकवि घाघ की कहावत है कि हस्त नक्षत्र अपने अन्तिम समय में बरस जाये तो गेहूँ की कम मेहनत में खूब पैदावार होगी। यह वर्षा कहीं-कहीं होती है तथा भाग्यशाली लोगों के खेत में ही पानी गिरता है। कहावत भी है- “क्वाँर पानी-भागवानी।”
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रबी के लिए किसान क्या करें
श्री नागर आगे कहते हैं कि इसके बाद ठीक से बतर आने पर सरसों, राई, अलसी, चना, जौ, मटर, आलू आदि फसलों की बुआई लाभकारी होती है। खेत जोतने के बाद यदि ढेलेदार खेत हो तो चना बोना चाहिए या खेत की मिट्टी नरम, बारीक हो तो गेहूँ बोना चाहिए। कहावत भी है- “मैदे गेहूं, ढेले चना।”

रबी की बोवनी का बुजुर्ग दूसरा सूत्र बताते हैं कि जब मकड़ी घास पर जाला बुनने लगे तब समझना चाहिए कि खेत में बोनी का समय आ गया है। बर्रे जब अपने छत्ते से उड़कर घर में आने लगे तब गेहूँ बोने का उचित समय मानना चाहिए। हस्त के बाद आने वाले चित्रा नक्षत्र में (10 से 23 अक्टूबर) चने बोने से कीट प्रकोप कम होता है व स्वाति नक्षत्र (24 अक्टूबर से 9 नवम्बर) में गेहूँ बोने से बाली पकते समय गरम हवाओं का असर नहीं होता व पैदावार अच्छी होती है।
जो किसान आलू की खेती करते हैं, उनके लिए भी बुजुर्गों का मार्गदर्शन है- आलू बोबै अंधेरे पाख, खेत में डारे कूरा राख। समय समय पै करे सिंचाई, तब आलू उपजे मन भाई॥ अर्थात, आलू कृष्ण पक्ष में (शरद पूर्णिमा व दीपावली के मध्य) बोना चाहिये। खेत में कूड़ा, राख की खाद डालकर सिंचाई करनी चाहिये तब आलू भारी मात्रा में पैदा होता है।
किसानों के लिए यह समय बहुत महत्वपूर्ण होता है, इस पर भी एक कहावत है “टांग पसारें, घर मत सूतौ, कातिक मास,रात हल जोतौ।” अर्थात, कार्तिक के मास में खेत तैयार करने के लिये रात्रि में भी हल जोतना चाहिये। घर में टांग पसारकर नहीं सोना चाहिये। इस बार नवरात्रि में मातारानी के यहाँ लगाया जुवारा भी अच्छा उगा है। अतः गेहूँ व अन्य रबी की फसलें अच्छी होगी। कुल मिलाकर पुराना ज्ञान और आधुनिक विज्ञान मिलाकर खेती की जाये तो वह लाभकारी होगी।



