kishore kumar birth anniversary 2022 : किशोर दा के जन्मदिन पर उनकी समाधि पर लगाया जाता है दूध और जलेबी का भोग, यह है इसकी वजह
▪️ लोकेश वर्मा, मलकापुर (बैतूल)
kishore kumar birth anniversary 2022 : मशहूर पार्श्वगायक किशोर कुमार (Famous playback singer Kishore Kumar) का जन्म 4 अगस्त 1929 को मध्यप्रदेश के खण्डवा में जाने माने वकील कुंजीलाल गांगुली के घर हुआ। वे भारतीय सिनेमा के मशहूर पार्श्वगायक में से एक रहे हैं। वे एक अच्छे गीतकार के साथ-साथ मस्त मौला, जिंदादिल, अभिनेता, निर्माता, निर्देशक भी थे। हिन्दी फिल्म उद्योग में उन्होंने बंगाली, हिन्दी, मराठी, असमी, गुजराती, कन्नड़, भोजपुरी, मलयालम, उड़िया और उर्दू सहित कई भारतीय भाषाओं में गाया था। उन्होंने सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायक के लिए 8 फिल्मफेयर पुरस्कार (Filmfare Awards) जीते। साथ ही उस श्रेणी में सबसे ज्यादा फिल्मफेयर पुरस्कार जीतने का रिकॉर्ड बनाया है। उसी साल उन्हें मध्यप्रदेश सरकार द्वारा लता मंगेशकर पुरस्कार (Lata Mangeshkar Award) से भी सम्मानित किया गया था।
किशोर कुमार का मूल नाम आभास कुमार गांगुली था। उन्होंने अपने जीवन के हर क्षण में खण्डवा को याद किया। वे जब भी किसी सार्वजनिक मंच पर या किसी समारोह में अपना कर्यक्रम प्रस्तुत करते थे तो गर्व से कहते थे किशोर कुमार खण्डवा वाले का नमस्कार। अपनी जन्म भूमि और मातृभूमि के प्रति ऐसी श्रद्धा बहुत कम लोगों में दिखाई देती है। आभास कुमार गांगुली ने सिनेमाई दुनिया से जुड़ने के साथ ही अपना नाम किशोर कुमार रख लिया था।
किशोर दा की पर्सनल लाइफ
धूनीवाले दादा जी के आशीर्वाद से खंडवा का नाम पूरे विश्व में रोशन करने वाले किशोर दा चार भाई बहनों (अशोक, सती देवी, अनूप कुमार और किशोर कुमार) में सबसे छोटे थे। उनके पिता कुंजीलाल गांगुली एक वकील थे और मां गौरी देवी गृहणी थीं। किशोर ने चार बार शादी की थी। उनकी पहली पत्नी रुमा गुहा ठाकुरता उर्फ रूमा घोष (1951-1958), दूसरी पत्नी एक्ट्रेस मधुबाला (1960-1969), तीसरी पत्नी एक्ट्रेस योगिता बाली (1976-1978) और चौथी और आखिरी पत्नी का नाम एक्ट्रेस लीना चंद्रावरकर (1980-1987 किशोर के निधन तक) था। उनके दो बेटे सिंगर अमित कुमार (पहली पत्नी रूमा गुहा से) और सुमित कुमार (अंतिम पत्नी लीना चंद्रावरकर से) हैं।

बॉम्बे टॉकीज से कॅरियर की शुरूआत
किशोर दा ने अपने करियर की शुरुआत स्टूडियो बॉम्बे टॉकीज से बतौर कोरस सिंगर की थी। 1946 में उन्होंने बतौर अभिनेता फिल्म ‘शिकारी’ से बड़े परदे पर एंट्री ली। इस फिल्म में उनके बड़े भाई किशोर कुमार लीड किरदार में थे। 1948 में फिल्म जिद्दी के लिए उन्होंने मरने की दुआएं क्यों मांगूं… गाना गाकर प्लेबैक सिंगिंग करियर शुरू किया था। ‘बाप रे बाप’, ‘चलती का नाम गाड़ी’, ‘नॉटी ब्वॉय’ और ‘पड़ोसन’ जैसी कई फिल्मों में उनकी अदाकारी ने सिनेप्रेमियों का खूब मनोरंजन किया। जहां तक सिंगिंग टैलेंट की बात है तो किशोर दा हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके 15 सौ से भी ज्यादा गाए गीत ‘रूप तेरा मस्ताना’, ‘खइके पान बनारस वाला’, ‘पग घुंघरू बांध’, ‘दे दे प्यार दे’ जैसे कई गाने आज भी झूमने पर मजबूर कर देते हैं।
जीवन के हर रंग का फलसफा
कभी हम उनके गाए हुए गीत ‘जिंदगी के सफर में गुजर जाते हैं, जो मकाम वो फिर नहीं आते’ सुनकर फूट-फूट कर रो देते है तो कभी ‘दे दे प्यार दे’ पर झूमकर नाच भी लेते हैं… ‘ये जीवन है, इस जीवन का यही है, यही है, यही है रंग रूप’ सुनते ही खामोशी से जीवन को समझते भी हैं। यहां सिर्फ लिरिक्स ही महत्वपूर्ण नहीं होती बल्कि संगीत के साथ सबसे ज्यादा प्रभाव आवाज का होता है।
गाने के भाव तभी असर करते हैं, जब हर शब्द में आवाज वही फील पैदा करे जैसे किशोर दा की गीत ओ साथी रे तेरे बिना भी क्या जीना…. फूलों के रंग से दिल की कलम से…. छूकर मेरे मन को किया तूने क्या इशारा… भोले ओ भोले, मेरे यार को मना ले, वो प्यार फिर जगा दे… जैसे सदाबहार गानों के फैंस आज के युवा भी है। किशोर जी बॉलीवुड जगत के सबसे बड़े कलाकार हैं।
उनके गाने देश और दुनिया में आज भी गूंजते है। पूरे दिन की थकान से परेशान जब आप अपने दफ्तर से घर तक के सफर को सुहाना बनाना चाहते है। तो किशोर कुमार की आवाज और गानों से सारे दिन के थकान को धुएं की तरह गायब कर सकते हैं।
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किशोर दा और आपातकाल….
जिस गाने को किशोर कुमार ने गाया है और अन्य गायक कलाकारों ने भी गाया है तो तुलना करके देखिए आपको समझ जाएंगे कि किशोर कुमार होने का मतलब क्या है। जब देश में आपातकाल लागू कर दिया गया, सारे संवैधानिक अधिकारों को रौंद दिया गया तब तत्कालीन सूचना प्रसारण मंत्री विद्याचरण शुक्ल ने सरकार के प्रति लोगों के आक्रोश को कम करने हेतु किशोर कुमार जी से प्रार्थना की कि वो सरकार की प्रशंसा में गीत गाए। लेकिन, स्वाभिमानी किशोर दा ने स्पष्ट मना कर दिया। यह बात तात्कालिक सरकार को नागवार गुजरी और आपातकाल में किशोर कुमार के गानों का ऑल इंडिया रेडियो पर प्रसारण प्रतिबंधित कर दिया गया।
चाहने वाले फैंस के लिए बना स्मारक
13 अक्टूबर 1987 को किशोर दा के निधन के बाद खंडवा के मुक्तिधाम में अंतिम संस्कार के बाद वहीं पर उनके चाहने वालों ने समाधि स्थल बनाया। बाद में मुक्तिधाम के बाजू में जहां किशोर कुमार साइकिल से घूमने जाया करते थे, खंडवा-इंदौर रोड पर मध्यप्रदेश सरकार ने उनके चाहने वाले फैंस के लिए 2008 में ढाई करोड़ की लागत से किशोर कुमार स्मारक का निर्माण किया। वहां किशोर दा की जीवन यात्रा चित्रों के माध्यम से प्रदर्शित की गई है।
स्मारक में तीन पंखुडियों के बीच किशोर कुमार की लाल पत्थर से बनी प्रतिमा है। हरे-भरे चंपा आदि के वृक्षों के बीच बनी मूर्ति के साथ ही म्यूजिकल फव्वारे लगे हैं और स्मारक के नीचे 150 सीटों वाले थिएटर का निर्माण कराया गया है। स्मारक में तीन चैनल डांसिंग फ्लोर हैं। जिसमें धुएं का आभास कराने वाले फौग सिस्टम से फब्बारों को आकर्षक प्रकाश व्यवस्था के साथ स्थापित किया गया है। यह देश के एक मात्र कलाकार की स्मृति में बना का पहला स्मारक है, जो किशोर दा की यादों को जीवंत बनाता है।

दूध और जलेबी के थे किशोर दा शौकीन
अपनी जादुई आवाज और अदाकारी से देश और दुनिया में खंडवा शहर का नाम रोशन करने वाले हरफनमौला किशोर कुमार के जन्मदिन 4 अगस्त को देश-विदेश के संगीत प्रेमी खण्डवा आकर मत्था टेकते हैं। हर साल उनकी समाधि को फूलों से सजाया जाता है और दूध और जलेबी का भोग लगाया जाता है। उन्हें दूध और जलेबी खाना बहुत पसंद था एवं उनकी याद में सुरों की महफिल स्मारक पर सजाई जाती है। साथ ही इस दिन यहां थिएटर में किशोर दा की फिल्म भी चलती है।
किशोर दा का गांगुली निवास बना खंडहर
खंडवा के बॉम्बे बाजार में रेलवे स्टेशन के सामने व्यावसायिक क्षेत्र में किशोर दा का गांगुली निवास नामक मकान है। 4 अगस्त को किशोर दा की जयंती पर खंडवा में गौरव दिवस मनाया जायेगा। किशोर दा की जहां यादें सहेजने थी, आज वह घर खंडहर में बदल चुका है। उनका घर जर्जर हालत में है। किशोर दा के निधन के बाद प्रशंसकों की मांग है कि घर को संग्रहालय बनाया जाए। मगर उनके चाहने वालों की यह मांग अभी तक पूरी नहीं हुई है।
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