wheat price : मंडी में गेहूं की हो रही इतनी आवक कि गैप देकर करना पड़ रहा खरीदी, सरकारी केंद्रों पर सन्नाटा

बाजार और मंडी में चल रहे गेहूं के ऊंचे भाव ने अब हाल यह कर दिया है कि मंडी में बंपर आवक होने लगी है। आलम यह है कि एक दिन में आने वाले पूरे गेहूं की उसी दिन खरीदी और तौलाई तक नहीं हो पा रही है। इसी के चलते अब बैतूल मंडी में मक्का की तरह एक दिन का गैप देना पड़ा। यही कारण है कि आज मंडी में गेहूं की खरीदी नहीं की गई। वहीं दूसरी ओर समर्थन मूल्य पर गेहूं खरीदी के लिए बनाए गए केंद्रों पर सन्नाटा पसरा हुआ है।
इन दिनों मंडी में गेहूं के भाव काफी अच्छे मिल रहे हैं। समर्थन मूल्य से अधिक दाम मिलने से किसान भी अपनी उपज लेकर मंडी ही पहुंच रहे हैं। इससे मंडी में रोजाना काफी अधिक मात्रा में गेहूं की आवक हो रही है। सोमवार को यहां बैतूल मंडी में 21653 बोरे गेहूं की आवक हो गई जो कि इन दिनों की सामान्य आवक से लगभग दोगुनी थी। यही कारण है कि व्यापारी पूरी मात्रा की खरीदी, तौलाई और पेकिंग आदि नहीं कर सके।
यदि मंगलवार को भी गेहूं की आवक हो जाती तो मंडी में भारी अव्यवस्था की स्थिति बनना तय था। यही कारण है कि व्यापारियों को मंगलवार को गेहूं खरीदी करने से हाथ खड़े करना पड़ा। मंडी सचिव सुनील भालेकर ने बताया कि ‘ सोमवार को गेहूं की भारी आवक हो गई थी। जिसके चलते व्यापारियों के द्वारा आज गेहूं की खरीदी करने में असमर्थता जताई गई थी। इसलिए किसानों को आज गेहूं लेकर नहीं आने की सूचना दे दी गई थी। बुधवार को गेहूं की खरीदी पूर्ववत की जाएगी।’
सोमवार को बंपर आवक के बावजूद भाव में खास कमी नहीं आई थी। सोमवार को गेहूं के प्रचलित भाव 2035 रुपए और उच्चतम भाव 2090 रुपए रहे थे। जबकि शासन ने सरकारी खरीदी के लिए 2015 रुपए समर्थन मूल्य घोषित किया है। इसके विपरित मंडी में बेहद कम मात्रा में न्यूनतम मूल्य पर जो गेहूं खरीदा गया उसके भी 1910 रुपए के भाव किसानों को मिले।
मंडी में हो रही गेहूं की बंपर आवक ने मक्का सीजन की तरह स्थिति निर्मित कर दी है। मक्का के समय भी इतनी अधिक आवक हो रही थी कि एक दिन में आने वाली आवक की उसी दिन खरीदी नहीं हो पा रही थी। इसके चलते पहले कुछ दिन गैप दिए गए और फिर दिन ही फिक्स कर दिए गए थे कि केवल निर्धारित तीन दिन ही किसान मक्का लेकर आएंगे।
संभव है कि गेहूं के लिए भी जल्द ही इसी तरह की व्यवस्था बनाना पड़े। दूसरी ओर खरीदी केंद्रों पर सन्नाटा छाए रहने से उन समितियों और समूहों की चिंता बढ़ गई है जो कि खरीदी का कार्य कर रहे हैं। उनकी सोच थी कि अच्छी खरीदी करके ठीक ठाक आमदनी हासिल हो जाएगी, लेकिन अब उन्हें यह चिंता सता रही है कि व्यवस्थाओं में जितना खर्च किया है, पता नहीं वह भी निकल पाता है या नहीं।




