Land Mutation Rules: वसीयत से जुड़े जमीन विवादों पर हाई कोर्ट का फैसला: राजस्व अधिकारियों के आदेश निरस्त, जानें क्या हैं नए नियम
Land Mutation Rules: High Court ruling on land disputes involving wills—revenue officials' orders set aside; find out what the new rules are.

Land Mutation Rules: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की ग्वालियर पीठ ने वसीयत से जुड़े भूमि नामांतरण प्रकरणों पर एक अत्यंत अहम न्यायिक निर्णय सुनाया है। अदालत ने अपने फैसले में पूरी तरह साफ कर दिया है कि यदि एक ही अचल संपत्ति के लिए दो अलग-अलग वसीयतें प्रस्तुत कर दी जाती हैं, तो उनकी प्रामाणिकता अथवा सत्यता की जांच करने का कोई वैधानिक अधिकार तहसीलदार, एसडीएम या संभागीय आयुक्त को प्राप्त नहीं है। इस प्रकार की पेचीदा कानूनी अड़चनों का अंतिम समाधान ढूंढना केवल सक्षम दीवानी अदालत (सिविल कोर्ट) के ही अधिकार क्षेत्र में आता है।
अधिकारियों के पुराने आदेश रद्द
न्यायमूर्ति पवन कुमार द्विवेदी की एकल पीठ ने शिवपुरी जिले की नरवर तहसील अंतर्गत आने वाले ग्राम सिकंदर से संबंधित नामांतरण मामले की सुनवाई करते हुए बड़ा कदम उठाया है। न्यायालय ने मामले से जुड़े अपर आयुक्त ग्वालियर, उपविभागीय अधिकारी (एसडीएम) नरवर तथा संबंधित तहसीलदार द्वारा समय-समय पर जारी किए गए सभी आदेशों को पूरी तरह खारिज कर दिया। इसके अतिरिक्त, हाई कोर्ट ने राजस्व महकमे को स्पष्ट हिदायत दी है कि भूमि अभिलेखों में 11 फरवरी 2020 से पूर्व दर्ज मूल प्रविष्टियों को तत्काल प्रभाव से पुनर्मूल्यांकित कर यथावत लागू किया जाए।
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दो परस्पर विरोधी वसीयतों की वजह से बढ़ा विवाद
यह पूरा प्रकरण ग्राम सिकंदर स्थित विभिन्न खसरा नंबरों की कृषि योग्य भूमि से जुड़ा हुआ है, जिसके मूल स्वामी बाल किशन थे। उनके देहांत के पश्चात विनोद कुमार एवं उनके सहयोगियों ने वर्ष 2011 में निष्पादित एक गैर-पंजीकृत वसीयत के आधार पर अपना नाम दर्ज कराने हेतु अर्जी दाखिल की। दूसरी तरफ, जीतेश नामक व्यक्ति ने कड़ी आपत्ति जताते हुए वर्ष 2013 में बनी एक अन्य वसीयत का हवाला देकर जमीन पर अपना मालिकाना हक जताया। शुरुआत में तहसीलदार तथा एसडीएम ने 2011 की वसीयत को सही माना, परंतु बाद में एडिशनल कमिश्नर ने उन फैसलों को रद्द कर वर्ष 2013 की वसीयत को मान्यता प्रदान कर दी, जिसके विरुद्ध मामला उच्च न्यायालय पहुंचा।
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दीवानी न्यायालय ही करेगा कानूनी वैधता का निर्धारण
मामले की समीक्षा करते हुए हाई कोर्ट ने रेखांकित किया कि राजस्व अमले का कार्य केवल प्रशासनिक स्तर तक सीमित होता है, वे किसी वसीयत की वैधानिकता पर अदालत की तरह न्याय नहीं कर सकते। यदि दो पक्षों में अलग-अलग वसीयत को लेकर मतभेद उत्पन्न होता है, तो गवाहों और सबूतों के आधार पर सही वसीयत का चयन करना केवल सिविल जज के अधिकार में है। अदालत के अनुसार, विवाद उत्पन्न होते ही तहसीलदार को नामांतरण निरस्त कर दोनों पक्षों को अपनी वसीयत सिद्ध करने हेतु सिविल कोर्ट जाने की सलाह देनी चाहिए थी।
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