Tulsi Vivah 2024 : क्यों कराते हैं तुलसी विवाह, कौन थे शालिग्राम, क्या है देवउठनी एकादशी का महत्व
Tulsi Vivah 2024 : देवउठनी एकादशी का त्योहार पूरे देश में बड़ी श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। इस दिन से शुभ कार्यों की शुरुआत हो जाती है, जैसे शादी-विवाह और अन्य मांगलिक कार्य। देवउठनी एकादशी का खास महत्व इसलिए है क्योंकि इस दिन भगवान विष्णु चार माह के विश्राम के बाद जागते हैं और तुलसी विवाह संपन्न होता है।
⊗ लोकेश वर्मा, मलकापुर (बैतूल)
Tulsi Vivah 2024 : देवउठनी एकादशी का त्योहार पूरे देश में बड़ी श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। इस दिन से शुभ कार्यों की शुरुआत हो जाती है, जैसे शादी-विवाह और अन्य मांगलिक कार्य। देवउठनी एकादशी का खास महत्व इसलिए है क्योंकि इस दिन भगवान विष्णु चार माह के विश्राम के बाद जागते हैं और तुलसी विवाह संपन्न होता है।
देवउठनी एकादशी के दिन गन्ने का विशेष महत्व होता है। इस दिन तुलसी घर के ऊपर गन्ने का मंडप बनाया जाता है, जो एक प्रतीकात्मक मंडप होता है। गन्ने के मंडप के नीचे भगवान सालिग्राम (भगवान विष्णु का प्रतीक) और तुलसी माता का विवाह विधि विधान से संपन्न कराया जाता है। इस विवाह को देवताओं के आशीर्वाद का प्रतीक माना जाता है। पूजा के बाद तुलसी माता को चुनरी ओढ़ाई जाती है और चूड़ियां चढ़ाई जाती है।
भगवान विष्णु जी के निद्रा से उठने का पर्व
हिंदू पंचांग के अनुसार हर वर्ष कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी, जिसे देवउठनी, देवोत्थान और देवप्रबोधिनी के नाम से जाना जाता है, पर तुलसी विवाह का आयोजन किया जाता है। हिंदू धर्म के अनुसार सृष्टि के पालनहार श्रीहरि भगवान विष्णु देवउठनी एकादशी पर चार महीने की अपनी योगनिद्रा से जागते हैं।
तुलसी विवाह करना शुभ और मंगलकारी
भगवान विष्णु के जागने पर इस दिन तुलसी विवाह किया जाता है। भगवान विष्णु के शालिग्राम स्वरूप संग तुलसी विवाह विधि-विधान के साथ किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार देवउठनी एकादशी पर तुलसी विवाह करना बहुत ही शुभ और मंगलकारी माना जाता है।
देवउठनी एकादशी पर सृष्टि के पालनहार भगवान विष्णु के शालिग्राम स्वरूप के साथ तुलसी जी का विवाह कराने पर सभी तरह के कष्टों से मुक्ति मिलती और भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
तुलसी शालिग्राम विवाह व्रत कथा
भगवान विष्णु के स्वरुप शालिग्राम और माता तुलसी के मिलन का पर्व तुलसी विवाह हिन्दू पंचांग के अनुसार कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाता है। पद्म पुराण की कथानुसार राजा जालंधर की पत्नी वृंदा के श्राप से भगवान विष्णु पत्थर बन गए, जिस कारणवश प्रभु को शालिग्राम भी कहा जाता है और भक्तगण इस रूप में भी उनकी पूजा करते हैं।
श्राप से मुक्ति पाने शालिग्राम स्वरूप में विवाह
इसी श्राप से मुक्ति पाने के लिए भगवान विष्णु को अपने शालिग्राम स्वरुप में तुलसी से विवाह करना पड़ा था और उसी समय से कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की एकादशी को तुलसी विवाह का उत्सव मनाया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु की प्रतिमा बनाकर उनका विवाह तुलसी जी से किया जाता है।
विवाह के बाद नवमी, दशमी तथा एकादशी को व्रत रखा जाता है और द्वादशी तिथि को भोजन करने के विषय में लिखा गया है। कई प्राचीन ग्रंथों के अनुसार शुक्ल पक्ष की नवमी को तुलसी की स्थापना की जाती है। कई श्रद्धालु कार्तिक माह की एकादशी को तुलसी विवाह करते हैं और द्वादशी को व्रत अनुष्ठान करते हैं।
तुलसी और शालिग्राम की विवाह कथा
प्राचीन काल में जलंधर नामक राक्षस ने चारों तरफ बड़ा उत्पात मचा रखा था। वह बड़ा वीर तथा पराक्रमी था। उसकी वीरता का रहस्य था, उसकी पत्नी वृंदा का पतिव्रता धर्म। उसी के प्रभाव से वह सर्वजयी बना हुआ था। जलंधर के उपद्रवों से परेशान देवगण भगवान विष्णु के पास गये तथा रक्षा की गुहार लगाई। उनकी प्रार्थना सुनकर भगवान विष्णु ने वृंदा का पतिव्रता धर्म भंग करने का निश्चय किया।
इस तरह किया वृंदा का सतीत्व नष्ट
भगवान ने जलंधर का ही रूप रखा और वृंदा के महल में पहुंच गये। जैसे ही वृंदा ने अपने पति को देखा, वे तुरंत पूजा मे से उठ गई और उनके चरणों को छू लिए। जैसे ही उनका संकल्प टूटा, युद्ध में देवताओं ने जलंधर को मार दिया और उसका सिर काटकर अलग कर दिया। उनका सिर वृंदा के महल में गिरा।
भगवान को दिया वृंदा ने यह श्राप
जब वृंदा ने देखा कि मेरे पति का सिर तो कटा पड़ा है तो फिर ये जो मेरे सामने खड़े है ये कौन है? उन्होंने पूछा कि आप कौन हो जिसका स्पर्श मैंने किया? तब भगवान अपने रूप में आ गये पर वे कुछ ना बोल सके। वृंदा सारी बात समझ गई। उन्होंने भगवान को श्राप दे दिया कि आप पत्थर के हो जाओ। भगवान तुंरत पत्थर के हो गये।
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सभी देवता करने लगे हाहाकार
यह देख सभी देवता हाहाकार करने लगे लक्ष्मी जी रोने लगी और प्रार्थना करने लगी। तब वृंदा जी ने भगवान को वापस वैसा ही कर दिया और अपने पति का सिर लेकर वे सती हो गई। उनकी राख से एक पौधा निकला तब भगवान विष्णु जी ने कहा आज से इनका नाम तुलसी है और मेरा एक रूप इस पत्थर के रूप में रहेगा, जिसे शालिग्राम के नाम से तुलसी जी के साथ ही पूजा जायेगा।
मैं बिना तुलसी जी के भोग स्वीकार नहीं करुगा। तब से तुलसी जी की पूजा सभी करने लगे और तुलसी जी का विवाह शालिग्राम जी के साथ कार्तिक मास में किया जाता है। देवउठनी एकादशी के दिन इसे तुलसी विवाह के रूप में मनाया जाता है।
तुलसी दल के शालिग्राम पूजन अधूरा
एक अन्य प्रसंग के अनुसार वृंदा ने विष्णु जी को यह शाप दिया था कि तुमने मेरा सतीत्व भंग किया है। अत: तुम पत्थर के बनोगे। विष्णु बोले, ‘हे वृंदा! यह तुम्हारे सतीत्व का ही फल है कि तुम तुलसी बनकर मेरे साथ ही रहोगी। जो मनुष्य तुम्हारे साथ मेरा विवाह करेगा, वह परम धाम को प्राप्त होगा।Ó बिना तुलसी दल के शालिग्राम या विष्णु जी की पूजा अधूरी मानी जाती है। शालिग्राम और तुलसी का विवाह भगवान विष्णु और महालक्ष्मी के विवाह का प्रतीकात्मक विवाह है।
तुलसी विवाह को लेकर खासा उत्साह
आज बाजारों में देवउठानी एकादशी के लिए आवश्यक पूजन सामग्री की दुकानों पर सुबह से ही रौनक है। गन्ने, बेर, भाजी, आंवला और तुलसी के पौधे की मांग में बढ़ोतरी हुई है। शहर के प्रमुख स्थलों पर दुकानें सजीं है, जहां लोग तुलसी विवाह के लिए आवश्यक सामान की खरीदारी करते नजर आ रहे है।
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