Amrit Sarovar burst : आरईएस की कार्यशैली का एक और नमूना… चिचोली के बाद रंभा में 26 लाख की लागत से बना अमृत सरोवर भी फूटा
◼️ उत्तम मालवीय, बैतूल
Amrit Sarovar burst in Rambha : यूं तो जिले में आरईएस (RES) विभाग की कार्यशैली के समय-समय पर नमूने देखने को मिलते ही रहते हैं। लेकिन, बारिश शुरू होने के बाद विभाग की कथित उम्दा कार्यशैली के अनेक प्रमाण सामने आ चुके हैं। कहीं तालाब फूट रहे हैं तो कहीं चेक डैम पहली ही बारिश में बह रहे हैं। इन सबसे हटकर विभाग ने तो प्रधानमंत्री की सर्वोच्च प्राथमिकता वाली अमृत सरोवर योजना को भी पलीता लगाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है।
महत्वाकांक्षी अमृत सरोवर योजना (Amrit Sarovar Yojana) के तहत पहले चिचोली ब्लॉक में बनाया गया सरोवर फूट कर बहा था। उसके बाद अब भीमपुर ब्लॉक की ग्राम पंचायत रंभा में बनाया गया अमृत सरोवर भी फूट गया है। ग्रामीणों के मुताबिक 26 लाख रुपये की भारी-भरकम लागत से कुछ समय पहले ही इसका निर्माण कार्य पूरा किया गया था। बताते हैं कि अभी तो इस सरोवर के निर्माण में जुटे ठेकेदार, जेसीबी संचालक, ट्रैक्टर चालक, मटेरियल सप्लायर और मजदूरों को भुगतान भी नहीं हो पाया है। उसके पहले ही यह सरोवर फूट कर बह गया।

पहली बारिश में ही लाखों रुपये की लागत से बने सरोवर के फूट जाने पर अब ग्रामीण इसकी गुणवत्ता पर सवालिया निशान लगा रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि आजादी के अमृत महोत्सव (nectar festival of freedom) के तहत जल संरक्षण (water conservation) जैसे पुनीत उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए कराए जा रहे निर्माण कार्य में तक विभाग गुणवत्ता का जरा भी ध्यान नहीं रख पाया। ग्रामीणों ने इस कार्य की उच्च स्तरीय जांच कराने और दोषी अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई किए जाने की मांग की है। साथ ही सरोवर के निर्माण की पूरी राशि भी संबंधित अधिकारियों से वसूल करने की मांग की है।
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अब अफसर ले रहे बारिश की आड़
अमृत सरोवर फूटने पर अब विभागीय अधिकारी अधिक बारिश पर ठीकरा फोड़ते नजर आ रहे हैं। वहीं उनके इस तर्क पर जागरूक ग्रामीणों का कहना है कि किसी भी कार्य की संरचना इंजीनियरों से इसलिए करवाई जाती है कि वे हर पहलू को ध्यान में रखें। निर्माण के दौरान अधिकतम बारिश से लेकर संभावित जल संग्रहण तक को देखना होता है। यदि ऐसा नहीं होता तो कोई भी सामान्य व्यक्ति कोई भी निर्माण कार्य करवा लेता। यदि बारिश के कारण सरोवर या डैम फूट रहे हैं तो इसमें इंजीनियरों की कहीं न कहीं नाकामी है। इसलिए सारी जवाबदेही भी उन्हीं पर तय होनी चाहिए।



