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सच कहे तो चटोरों का शहर है इंदौर

  • लोकेश वर्मा, बैतूल
    मध्यप्रदेश की वाणिज्यिक राजधानी के साथ-साथ देशभर में सफाई के मामले में लगातार “पांचवीं बार” मिसाल कायम करने वाला “इंदौर शहर” खाने के मामले में भी “नंबर वन” है। राजवाड़ा यहां की शान है तो रानी अहिल्याबाई होल्कर द्वारा बनाया गया खजराना गणेश मंदिर श्रद्धा और भक्ति का महत्वपूर्ण स्थान…। इंदौर को “फूड कैपिटल ऑफ इंडिया” यानी “भोजन बट्टो का स्वर्ग” और देसी भाषा में कहा जाए तो “चटोरो का शहर” कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।

    यहां का स्ट्रीट फूड पूरे भारत में काफी फेमस है। यहां के स्वाद का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां की नमकीन विदेशों में भी सप्लाई की जाती है। इंदौर के “पोहे” का रुतबा भी दुनियाभर में फैला हुआ है। पहली बार इंदौर आने वाला शायद ही कोई ऐसा शख्स होता है जो “इंदौरी पोहे” का स्वाद नहीं लेता हो। इसके अलावा स्ट्रीट फूड में कचौड़ी, दाल बाफला सहित ढेरों वैराइटीज यहां मिल जाएंगी। खाने के शौकीनों के लिए तो ये शहर किसी मांगी हुई मुराद के पूरे होने से कम नहीं है।

    इंदौर के “स्वादिष्ट ठिकानों” में जायकेदार स्वाद लेने के लिए “सराफा बाजार” दिन में जहां सोने की चमक से दमकता है, वहीं रात होते ही ये जगह खाने के ठियों से गुलजार हो जाती है। गर्म गुलाब जामुन हों या भुट्टा, रबड़ी, दहीबड़े से लेकर इडली-डोसा और चाट मुंह में पानी लाने वाले स्ट्रीट फूड की बड़ी रेंज आपको यहां मिल जाएगी। एक बार यहां का स्वाद लेने के बाद लंबे वक्त तक जायका जुबान पर रहता है और पान की दर्जनों वैरायटी “फायर पान” “स्वर्ण भस्म पान” का मजा भी यहां लिया जा सकता है।

    इसके अलावा यहां की “56 दुकान” भी खाने के मामले में बहुत फेमस है। 56 दुकान की खास बात यह भी है कि यहां के व्यंजन स्वादिष्ट होने के साथ-साथ “स्वच्छ और स्वस्थ” भी होते हैं। यहां काम करने वाले लोगों को स्वच्छता का सर्टिफिकेट भी दिया जाता है। इतना ही नहीं खाना बनाने वालों के नाखून कटे होने, बाल बंधे होने और कपड़े साफ होने जरूरी है। सुबह-सुबह इंदौर की किसी भी गली से निकलो, वहां पोहे के ठेले आसानी से देखे जा सकते हैं।

    वैसे तो शहर के हर हिस्से में शानदार स्वाद वाले पोहे मिल जाएंगे, लेकिन चाहे तो इसके लिए राजवाड़ा का रुख कर सकते हैं। यहां 3 दुकानें हैं जो हर वक्त खुली रहती हैं। इसके अलावा एमजी रोड पर लगने वाले ठेलों पर पोहे के साथ जलेबी का आनंद भी लिया जा सकता है।

    इसके अलावा रेलवे स्टेशन के पास लगने वाली शर्मा, जैन और चौरसिया की पोहे की दुकानें भी काफी प्रसिद्ध हैं। “मेघदूत चौपाटी” की शाम आधा सैकड़ा दुकानों के साथ गुलजार है। यहां के बिहारी व्यंजन “लिट्टी चोखा” की बात ही अलग है और यहां का अग्रवाल का “रबड़ी फालूदा” मुंह में मिठास घोल देता है। कचौड़ी खाने के शौकीन हो तो यहां कई वैराइटीज की कचौड़ी मिल जाएगी…. इसमें आलू, दाल, मटर की कचौड़ी भी शामिल है….।

    मेरा पसंदीदा ठिकाना “बुआ के घर के पास” परदेशीपुरा में सुभाष नगर चौराहे पर तृप्ति चाट वाले का “आलू बड़ा” और मिल क्षेत्र में कुलकर्णी मिल के पास “प्रेम मिष्ठान भंडार” की इमरती और जलेबी के स्वाद का क्या कहना….। नगर निगम के नजदीक रवि स्वल्पाहार लगभग 100 साल पुरानी दुकान है, इंजीनियरिंग कॉलेज एसजीएसआईटीएस के कोने में “इंजीनियरिंग कचौड़ी” का स्वाद मिलेगा।

    जेल रोड़ पर अनंतानंद, मल्हारगंज में बम की कचौड़ी झन्नाटेदार होती है। वहीं रामबाग पर लाल बाल्टी की आलू कचोरी और चटनी काफी प्रसिद्ध है। विजयनगर की “विजय सैंडविच” भी फेमस है। गुजरात की फेमस डिश कड़ी-फाफड़ा चिकमंगलूर चौराहे पर मिलेगी। इसके अलावा नॉवेल्टी मार्केट और एमआईजी चौराहे पर मंगौड़ी और मिर्च के पकौड़े फेमस हैं।

    यहां ठेलों पर मिलने वाली “साबूदाने की खिचड़ी” का भी अनोखा स्वाद है। हालांकि यह साबूदाना स्पेशल “इंदौरी खिचड़ी” बैतूल में भी अब “कारगिल चौक” पर मिलने लगी है। इंदौर में शिकंजी का मतलब अपनी नींबू वाली शिकंजी नहीं बल्कि दही रबड़ी की लस्सी होती है….। यहां खाने निकले तो पूरा महीना कम पड़ जाए पर इन सभी व्यंजनों में स्वाद की उत्पत्ति का कारण सिर्फ और सिर्फ “नर्मदा मैया” है जिस के पानी से ऐसा स्वाद आ पड़ता है….।

  • उत्तम मालवीय

    मैं इस न्यूज वेबसाइट का ऑनर और एडिटर हूं। वर्ष 2001 से पत्रकारिता में सक्रिय हूं। सागर यूनिवर्सिटी से एमजेसी (मास्टर ऑफ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री प्राप्त की है। नवभारत भोपाल से अपने करियर की शुरुआत करने के बाद दैनिक जागरण भोपाल, राज एक्सप्रेस भोपाल, नईदुनिया और जागरण समूह के समाचार पत्र 'नवदुनिया' भोपाल में वर्षों तक सेवाएं दी। अब इस न्यूज वेबसाइट "Betul Update" का संचालन कर रहा हूं। मुझे उत्कृष्ट पत्रकारिता के लिए प्रतिष्ठित सरोजिनी नायडू पुरस्कार प्राप्त करने का सौभाग्य भी नवदुनिया समाचार पत्र में कार्यरत रहते हुए प्राप्त हो चुका है।

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