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International Forest Day : प्रकृति की गोद में बसा है पेंच टाइगर रिजर्व, निहारे जा सकते हैं टाइगर समेत अन्य खूबसूरत वन्य जीव

  • लोकेश वर्मा, मलकापुर
    प्रकृति की गोद में नैसर्गिक खूबसूरत वन क्षेत्र में मौजूद है पेंच टाइगर रिजर्व (Pench Tiger Reserve)। सिवनी जिले में मौजूद अभ्यारण में मध्य प्रदेश की शान बाघ के साथ ही तेंदुआ, भालू, सांभर, हिरण, चीतल, नीलगाय, सोन कुत्ता, भेड़िया, लंगूर, मोर आदि वन्य जीव मौजूद है जो कि पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। एक लाख 17 हजार हेक्टेयर में फैले इस नेशनल पार्क में करमाझीरी कोर, जमतरा कोर, टिकाडी कुभपानी बफर के साथ तुरिया बफर, रूफड बफर, ऊरी बफर का इलाका पर्यटकों को लुभाता है।

    कोरोना काल में गत वर्ष लगभग 1 लाख पर्यटकों ने यहां पहुंचकर प्रकृति की सुंदरता और वन्य प्राणियों का दीदार किया था। जिससे 3.50 करोड़ की आय टाइगर रिजर्व को हुई थी। वन्य जीवों की सुरक्षा के लिए यहां एक हजार से अधिक गार्ड और पर्यटकों के लिए डेढ़ सौ से अधिक पंजीकृत टूरिस्ट गाइड की तैनाती के साथ ही जंगल सफारी के लिए पंजीकृत वाहनों के प्रवेश की संख्या सुबह और शाम में कर्माझीरी गेट से 16, टुरिया गेट से 74 एवं जमतरा गेट से 9 इस प्रकार कुल 99 जिप्सियां हैं। जिसमें एक जिप्सी में 6 लोग जंगल सफारी का आनंद ले सकते हैं। प्रवेश की अग्रिम बुकिंग कर्माझीरी तथा टूरिया गेट के लिए एमपी ऑनलाइन पर उपलब्ध है।

    पेंच टाइगर रिजर्व का इतिहास

    वन्य जीवन से समृद्ध नेशनल पार्क सतपुड़ा की पहाड़ियों के निचले दक्षिणी भाग में स्थित भारत का एक प्रमुख राष्ट्रीय उद्यान है। इसे पेंच टाइगर रिजर्व या मोगली लैंड भी कहते हैं। यहां का इतिहास गौरवशाली है। मध्य प्रदेश सरकार द्वारा इसे 1983 में नेशनल पार्क घोषित किया गया और बाघों की एक बड़ी मात्रा के कारण 1992 में इसे आधिकारिक रूप से भारत का 19 वां टाइगर रिजर्व घोषित किया गया। पेंच नेशनल पार्क कई तरह की वनस्पतियों और जीवों का घर है या वन्य जीवन की एक महान विविधता का खजाना है। यह सौभाग्य है कि हमारे यहां मध्य प्रदेश में स्थित है। इसका छोटा सा भाग महाराष्ट्र में भी आता है।

    पेंच नेशनल पार्क का नाम पेंच नदी के नाम पर रखा गया है। यह नदी उत्तर से दक्षिण की ओर बढ़ते हुए दो हिस्सों में विभाजित होती है। यह नदी नेशनल पार्क की जीवन रेखा है। टाइगर प्रोजेक्ट में शामिल इस अभ्यारण का मुख्य उद्देश्य बाघों का संरक्षण करना है। पेंच नेशनल पार्क का सिवनी तथा छिंदवाड़ा जिले में कुल क्षेत्रफल 1179.89 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में है। जिसमें 411.30 वर्ग किमी कोर एरिया एवं 768.30 वर्ग किमी बफर एरिया है। पेंच नेशनल पार्क वनस्पतियों और जीवों का खजाना है। यहां की प्राकृतिक सुंदरता और समृद्धि का वर्णन कई प्रसिद्ध किताबों में भी किया गया है। इस जगह का उल्लेख महान रूडयार्ड किपलिंग द्वारा क्लासिक ‘द जंगल बुक’ में भी किया गया है। इसके आसपास लगभग 10 गांव हैं। जिसमे मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र से प्रवेश किया जा सकता है। जिसमें सिवनी का टुरिया गेट प्रमुख है।

    पेंच नेशनल पार्क में जानवर

    पेंच नेशनल पार्क में कई शाकाहारी एवं मांसाहारी जानवर पाए जाते हैं। यहां पाए जाने वाले कुछ प्रमुख जानवर बंगाल टाइगर, लेपर्ड, बाघ, तेंदुआ, जंगली बिल्ली, जंगली कुत्ता, लकड़बग्घा, सियार, लोमड़ी, भेड़िया, नेवला, गौर, नीलगाय, सांभर, चीतल, चौसिंगा, हिरण, चिंकारा, भालू, जंगली सूअर, मट जैक आदि है। पेंच टाइगर रिजर्व में बाघों का दिखना आम बात है जो कि पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं।

    इन पक्षियों के भी होते दीदार

    पेंच नेशनल पार्क में स्थित तोतलाडू जलाशय के धूप वाले इलाकों में ठंड के मौसम में प्रवासी पक्षियों की भरमार देखने को मिलती है। इस टाइगर रिजर्व में साल के विभिन्न मौसमों में करीब 325 प्रजातियों के पक्षी देखे जा सकते हैं। जिनमें कौवा, तीतर, पिंटेल, लेसर, व्हीसलिंग टील, इंडियन रोलर, वेगटेल, मुनिया, वाटरफावल, ब्लू किंग फिशर, रेडवेंटेड, बुलबुल, जंगल फॉवर, बगुला, मैना, जलपक्षी आदि कई पक्षियों की प्रजाति पाई जाती है। जिनका कलरव पर्यटकों को उद्यान में अपनी ओर आकर्षित करता है।

    वनस्पतियों की दृष्टि से भी समृद्ध

    पेंच टाइगर रिजर्व के पूरे क्षेत्र हरे-भरे जंगलों से परिपूर्ण है। कई दुर्लभ और लुप्त हो चुके पौधों के साथ-साथ कई औषधीय महत्व के पौधों की 12 सौ से अधिक प्रजातियां यहां पाई जाती है। पेंच राष्ट्रीय उद्यान में महुआ, सफेद कुल्लू, सलाई, साजिया, साल,अमलतास, अचार, पलाश, घौरा, हल्दु जैसे कई अन्य पेड़ पौधे पाए जाते हैं। कहवा (अर्जुन), जामुन, गूलर, और साजा नदियों के किनारे हैं। चौड़ी पत्ती वाले सागौन के जंगल लगभग एक चौथाई क्षेत्र में है। सघन वन क्षेत्र में घास और बांस की लगभग 82 प्रकार की प्रजातियां और झाड़ियां बेलो, पेड़ पौधे, जड़ी बूटियों की अधिकता पाई जाती है। यह उद्यान मे पेड़ पौधों के अलावा घास के मैदानों की भी अधिकता है।

    द जंगल बुक का मोगली
    1990 मे कार्टून सीरियल ‘द जंगल बुक’ को दूरदर्शन पर प्रसारित किया गया। सीरियल का टाइटल सांग ‘जंगल-जंगल बात चली है, पता चला है…’ को लिखा था मशहूर गीतकार गुलज़ार ने और इसे संगीत दिया था विशाल भारद्वाज ने। सिवनी जिले के जंगलों में एक बालक जो जंगली भेड़ियों के बीच पला था, के अस्तित्व में होने की बात आज भी कही जाती है। कई लोग इसे मात्र एक किंवदंती मानते हैं, तो कई इसे सही घटना मानते हैं। माना जाता है कि एक बालक जो जंगलों की वादियों में पला-बढ़ा था, भेडियों की सोहबत में रहने के कारण उसकी आदतें भेडियों की तरह हो गई थी। यही क्षेत्र मोगली का घर था।

    इसके तथ्यात्मक प्रमाण के रूप में सर विलियम हेनरी स्लीमन के एन एकाउंट ऑफ वाल्वस नरचरिंग चिल्ड्रन इन देयर डेन्स शीर्षक के एक दस्तावेज का उल्लेख किया जाता है। सर विलियम हेनरी स्लीमन के इस दस्तावेज में लिखा था कि सिवनी के संतबावडी गांव में सन 1831 में एक बालक पकड़ा गया था जो इसी क्षेत्र के जंगली भेड़ियों के साथ गुफाओं में रहता था। इसके अलावा जंगल बुक के लेखक रुडयार्ड किपलिंग ने जिन भौगोलिक स्थितियों बैनगंगा नदी, उसके कछारों तथा पहाड़ियों की चर्चा की थी वे सभी वास्तव में इस क्षेत्र की भौगोलिक स्थितियों से पूरी तरह मेल खाती हैं।

    आखिर क्यों बना मध्य प्रदेश टाइगर स्टेट

    सितंबर 2005 में जन्मी ‘कॉलर वाली बाघिन’ के नाम से मशहूर बाघिन ने मध्य प्रदेश को टाइगर स्टेट का दर्जा दिलाने में अहम भूमिका निभाई। गले में रेडियो कॉलर लगा होने के कारण इसका नाम कॉलर वाली बाघिन पड़ा। एक साथ पांच शावकों को जन्म देने के साथ ही 29 शावकों को जन्म देने का रिकॉर्ड बनाने वाली पेंच की शान रही ‘सुपर मॉम टाईग्रेसÓ बाघिन 16 जनवरी को बिदा हो गई। सबसे ज्यादा शावकों को जन्म देने का रिकॉर्ड पहले रणथंभौर टाइगर रिजर्व में 29 शावकों को जन्म देने वाली ‘मछली बाघिन’ के नाम से था।

    आकर्षण का केंद्र है पाटदेववाली बाघिन

    पाटदेव एरिया में यह बाघिन अक्सर पर्यटक को अपने 5 शावकों के साथ घूमती दिखाई देती है इसलिए इसका नाम पाटदेव वाली बाघिन पड़ा। अपनी मां कॉलर वाली बाघिन के नक्शे कदम पर पांच शावकों को जन्म देकर पेंच टाइगर रिजर्व में आए पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र में बनी हुई है। पेंच टाइगर रिजर्व रानी के शावको की दहाड़ से गुंजायमान रहता है।

    शानदार नजारे, हसीन वादियां और खूबसूरत हाईवे

    ऐसा कहा जाता है कि विकास की कीमत प्रकृति को चुकानी पड़ती है लेकिन यह बिना प्रकृति को नुकसान पहुंचाए कैसे किया जा सकता है इस हाईवे पर देखा जा सकता है। देश का पहला जंगल के बीच से गुजरता 29 किमी लंबा अंडरपास इको हाईवे। साउंड एवं लाइट प्रूफ फोरलेन हाईवे कश्मीर से कन्याकुमारी को जोड़ने वाला एनएच-44 मुख्य हाइवे है। सिवनी-नागपुर के बीच मोहगांव से खवासा के बीच जंगल के बीच बना यह 29 किलोमीटर का हाईवे 950 करोड़ की लागत से तैयार हो गया है। सड़क के दोनों किनारों पर साउंड बैरियर और हेड लाइट प्रोड्यूसर लगाकर सीमेंट के स्ट्रक्चर पर 4 मीटर ऊंची स्टील की दीवार खड़ी की गई है।

    इन नाइज बैरियर से भारी वाहनों की आवाज़ एवं तेज रोशनी जंगली जानवरों तक नहीं पहुंच पाती है। इसमें जानवरों के लिए 14 एनिमल अंडर पास बनाए गए हैं जिससे जानवर बिना किसी परेशानी के सड़क के नीचे से निकलते रहते हैं। घने जंगल और पेंच नेशनल पार्क के बफर एरिया से गुजरने वाले इस साउंड प्रूफ हाईवे में बिना प्रकृति से छेड़छाड़ के विकास किया है। प्रकृति की इस गलियों से गुजरता खूबसूरत वादियों के बीच सफर का मजा जहां इंसान को मंजिल में देता है। वहीं सुकून प्रकृति में विचरण करने वाले जीव जंतुओं का भी है। हरी दीवारों से परे एक दुनिया में जहां आधुनिकता का शोर नहीं पहुंचता और ना ही यहां से गुजरती मोटर गाड़ियों की आवाज, यह जंगल के बीच विकास की राह है।

    कैसे पहुंचे पेंच टाइगर रिजर्व

    हवाई मार्ग से नागपुर एयरपोर्ट पर उतर कर खवासा तक सड़क मार्ग की दूरी 120 किलोमीटर है जहां से पहुंचा जा सकता है एवं सड़क मार्ग से सिवनी पहुंचा जा सकता है। जिसके तुरिया गेट से प्रकृति की खूबसूरती के साथ वन्यजीवों के दीदार का लुफ्त उठा सकते हैं।

    पार्क के यह हैं नियम

    टुरिया गेट पर पार्क का इंटरप्रिटेशन सेंटर है जहां पार्क की सचित्र समस्त जानकारी एकत्रित की जा सकती है। यहां पर पॉलीथिन पूर्णत: प्रतिबंधित है। जंगल सफारी के लिए पंजीकृत जिप्सी के साथ प्रत्येक पर्यटक को अधिकृत पार्क गाइड लेना अनिवार्य है। जंगल में शोर करना, म्यूजिक बजाना, वाहन से नीचे उतरना और किसी भी वनोपज पौधे या पशु को हाथ लगाना प्रतिबंधित है। यहां कैमरा और मोबाइल से फोटोग्राफी की जा सकती है।

    (अंतरराष्ट्रीय वन दिवस पर पेंच टाइगर रिजर्व की सैर के तुरंत बाद लोकेश वर्मा द्वारा ‘बैतूल अपडेट’ के लिए यह आलेख लिखा गया है)

  • उत्तम मालवीय

    मैं इस न्यूज वेबसाइट का ऑनर और एडिटर हूं। वर्ष 2001 से पत्रकारिता में सक्रिय हूं। सागर यूनिवर्सिटी से एमजेसी (मास्टर ऑफ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री प्राप्त की है। नवभारत भोपाल से अपने करियर की शुरुआत करने के बाद दैनिक जागरण भोपाल, राज एक्सप्रेस भोपाल, नईदुनिया और जागरण समूह के समाचार पत्र 'नवदुनिया' भोपाल में वर्षों तक सेवाएं दी। अब इस न्यूज वेबसाइट "Betul Update" का संचालन कर रहा हूं। मुझे उत्कृष्ट पत्रकारिता के लिए प्रतिष्ठित सरोजिनी नायडू पुरस्कार प्राप्त करने का सौभाग्य भी नवदुनिया समाचार पत्र में कार्यरत रहते हुए प्राप्त हो चुका है।

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