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Black Tomato Farming: बैतूल के किसान का अनोखा प्रयोग, खेत में उगा डाला काला टमाटर, कीमत सुनकर उड़ जाएंगे होश

Black Tomato Farming: परंपरागत खेती से हटकर बैतूल के किसान ने उगाया काला टमाटर, सुपरफूड की श्रेणी में शामिल, 1000 रुपये किलो तक दाम

Black Tomato Farming: बैतूल के किसान का अनोखा प्रयोग, खेत में उगा डाला काला टमाटर, कीमत सुनकर उड़ जाएंगे होश
Black Tomato Farming: बैतूल के किसान का अनोखा प्रयोग, खेत में उगा डाला काला टमाटर, कीमत सुनकर उड़ जाएंगे होश

Black Tomato Farming: खेती में बदलाव की बात तो बहुत होती है, लेकिन जब कोई किसान जोखिम उठाकर कुछ नया करता है और उसके नतीजे सामने आते हैं, तब वही उदाहरण दूसरों के लिए रास्ता बनते हैं। मध्य प्रदेश के बैतूल जिले में एक ऐसे ही किसान ने पारंपरिक लाल टमाटर से हटकर काले टमाटर की खेती शुरू की है। रंग में अलग, पोषण में खास और कीमत में कई गुना महंगा यह टमाटर अब चर्चा का विषय बन गया है।

खेतों में दिखा अनोखा नजारा

अब तक बैतूल सहित पूरे जिले में किसानों के खेतों में लाल टमाटर ही आम तौर पर नजर आते थे। लेकिन हाल ही में प्रगतिशील किसान अनिल वर्मा के खेत में कुछ अलग ही दिखाई दिया। यहां टमाटर का रंग गहरा बैंगनी से लेकर लगभग काला (Black Tomato Farming) था। पहली नजर में देखने वाला भी ठिठक जाए, ऐसा नजारा है। यही वजह है कि आसपास के किसान और कृषि से जुड़े लोग इस खेती को देखने पहुंच रहे हैं।

काले टमाटर की यह खास पहचान

अनिल वर्मा बताते हैं कि यह टमाटर पूरी तरह पका होने पर गहरे बैंगनी या काले रंग का दिखाई देता है। सामान्य टमाटर से इसका स्वाद और बनावट थोड़ी अलग होती है। पोषण और औषधीय गुणों के कारण इसे सुपरफूड की श्रेणी में रखा जा रहा है। यही कारण है कि देश-विदेश में इसकी मांग तेजी से बढ़ रही है।

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किसान अनिल वर्मा

कई बीमारियों से करता है बचाव

किसान अनिल वर्मा के अनुसार, रिसर्च में यह बात सामने आई है कि काले टमाटर में ऐसे तत्व पाए जाते हैं जो शरीर के लिए काफी फायदेमंद होते हैं। यह वैस्कुलर डिजीज, मोटापा और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों से बचाव में मदद कर सकता है। इसके साथ ही इसे फर्टिलिटी बढ़ाने में भी सहायक माना जा रहा है। स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोगों के बीच इसकी लोकप्रियता इसी वजह से बढ़ रही है।

पारंपरिक खेती से अलग सोच

अनिल वर्मा केवल किसान ही नहीं, बल्कि पढ़े-लिखे और शोध से जुड़े व्यक्ति भी हैं। उन्होंने एमएससी बॉटनी की है और जड़ी-बूटियों पर लंबे समय तक रिसर्च किया है। वे मैपकास्ट के प्रोजेक्ट पर भी काम कर चुके हैं। खेती के साथ-साथ मछली बीज की हैचरी का संचालन करते हैं और सब्जी उत्पादन में भी सक्रिय हैं।

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लागत बढ़ने से आया बदलाव का विचार

अनिल वर्मा बताते हैं कि वे कई वर्षों से पारंपरिक खेती करते आ रहे हैं। लाल टमाटर, सब्जियां और अन्य फसलें ही उनकी आजीविका का आधार रही हैं। लेकिन बीते कुछ सालों में खेती की लागत लगातार बढ़ी है। खाद, बीज, कीटनाशक, मजदूरी और सिंचाई पर खर्च बढ़ता जा रहा है, जबकि बाजार में फसलों के दाम कई बार लागत से भी कम मिलते हैं। उनका मानना है कि आज के समय में केवल पारंपरिक फसलों पर निर्भर रहकर मुनाफा कमाना मुश्किल होता जा रहा है। इसी सोच ने उन्हें नई और अधिक मूल्य वाली फसल की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित किया।

ऐसे मिली काले टमाटर की जानकारी

अनिल वर्मा ने करीब दस साल तक आदिवासी क्षेत्रों में उपयोग होने वाली जड़ी-बूटियों पर अध्ययन किया है। इसी दौरान उन्होंने Black Tomato Farming के बारे में जानकारी जुटाई। उनके अनुसार, वर्ष 2015 के आसपास इस किस्म का इन्वेंशन हुआ था। उन्होंने बहरीन के एक रिसर्च पेपर में काले टमाटर के गुणों के बारे में पढ़ा। उस शोध में बताया गया था कि इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण सामान्य टमाटर की तुलना में कहीं अधिक होते हैं।

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छोटे प्रयोग से मिली बड़ी उम्मीद

काले टमाटर की खेती फिलहाल अनिल वर्मा ने प्रयोग के तौर पर छोटे स्तर पर शुरू की है। उन्होंने कुछ ही कतारों में इसके पौधे लगाए, ताकि मिट्टी, मौसम और उत्पादन को समझा जा सके। अब तक के नतीजे उनकी उम्मीद से बेहतर रहे हैं। कुछ पौधों में 350 से 400 ग्राम तक वजन वाले टमाटर लगे हैं, जो सामान्य लाल टमाटर से काफी बड़े हैं। किसान का कहना है कि अगर इसी तरह उत्पादन रहा, तो अगले सीजन में वे दो एकड़ तक काले टमाटर की खेती करने की योजना बना रहे हैं।

खेती की तकनीक में क्या है खास

काले टमाटर की खेती की प्रक्रिया सामान्य टमाटर जैसी ही होती है, लेकिन कुछ बातों पर विशेष ध्यान देना जरूरी होता है। अनिल वर्मा ने बताया कि उन्होंने काले टमाटर की दो किस्में लगाई हैं। एक चेरी टाइप और दूसरी बड़े आकार वाली। चेरी टाइप काले टमाटर आकार में छोटे होते हैं और सलाद व गार्निश में ज्यादा इस्तेमाल किए जाते हैं। बड़े आकार वाले टमाटर का रंग गहरा काला-बैंगनी होता है, जिसे किसान मड़ी रंग भी कहते हैं। इन पौधों को भरपूर धूप और अनुकूल तापमान की जरूरत होती है। कम रोशनी मिलने पर रंग पूरी तरह विकसित नहीं हो पाता। जल निकासी वाली मिट्टी और संतुलित पोषण भी जरूरी है।

विटामिन ए और सी की मात्रा अधिक

विशेषज्ञों के अनुसार, काले टमाटर में विटामिन ए और विटामिन सी की मात्रा अधिक होती है। इसमें एंथोसायनिन नामक तत्व पाया जाता है, जो इसे गहरा रंग देता है। यही तत्व ब्लूबेरी, ब्लैकबेरी और जामुन जैसे फलों में भी पाया जाता है। यह तत्व शरीर में फ्री रेडिकल्स को कम करने में मदद करता है और रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाता है। इसी वजह से काले टमाटर को सेहत के लिए लाभकारी माना जाता है।

एक हजार रुपये किलो तक है कीमत

अनिल वर्मा बताते हैं कि काले टमाटर की कीमत सामान्य लाल टमाटर की तुलना में कई गुना ज्यादा मिल सकती है। जहां लाल टमाटर कई बार 10 से 20 रुपए किलो तक बिकता है, वहीं काला टमाटर बड़े शहरों में 1000 रुपए किलो तक बिक सकता है। हालांकि, स्थानीय मंडियों में इसकी बिक्री फिलहाल चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि ग्रामीण इलाकों में लोग इसके बारे में कम जानते हैं। इसी वजह से वे अपनी फसल भोपाल, इंदौर, दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में भेजने की योजना बना रहे हैं, जहां हेल्दी और ऑर्गेनिक फूड की मांग अधिक है।

विदेश से मंगाने पड़े यह बीज

काले टमाटर की खेती में सबसे बड़ी चुनौती इसके बीज हैं। अनिल वर्मा के अनुसार, भारत में फिलहाल इसके बीज आसानी से उपलब्ध नहीं हैं। उन्हें बीज विदेश से मंगवाने पड़े। उन्होंने बताया कि 100 मिलीग्राम बीज के लिए करीब 3 हजार रुपए खर्च हुए, जिसमें 60 से 70 बीज मिले। बीज जरूर महंगे हैं, लेकिन अगर खेती सफल रहती है तो लागत निकलने के साथ अच्छा मुनाफा होने की उम्मीद भी है।

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उत्तम मालवीय

मैं इस न्यूज वेबसाइट का ऑनर और एडिटर हूं। वर्ष 2001 से पत्रकारिता में सक्रिय हूं। सागर यूनिवर्सिटी से एमजेसी (मास्टर ऑफ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री प्राप्त की है। नवभारत भोपाल से अपने करियर की शुरुआत करने के बाद दैनिक जागरण भोपाल, राज एक्सप्रेस भोपाल, नईदुनिया और जागरण समूह के समाचार पत्र 'नवदुनिया' भोपाल में वर्षों तक सेवाएं दी। अब इस न्यूज वेबसाइट "Betul Update" का संचालन कर रहा हूं। मुझे उत्कृष्ट पत्रकारिता के लिए प्रतिष्ठित सरोजिनी नायडू पुरस्कार प्राप्त करने का सौभाग्य भी नवदुनिया समाचार पत्र में कार्यरत रहते हुए प्राप्त हो चुका है।

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