Betul ka danda dance : यहां ग्वाल समाज करता है सावन के गीतों पर डंडा डांस, आज भी निभाई जा रही महाभारत कालीन परंपराएं
• उत्तम मालवीय, बैतूल
आपने लट्ठमार होली के बारे में तो सुना होगा, लेकिन डंडा डांस के बारे में शायद ही सुना होगा।इसमें सावन के गीतों के साथ डंडे लेकर नाचते हैं। सावन के महीने में इस डांस का बड़े उत्साह के साथ आयोजन किया जाता है। ग्वाल समाज द्वारा यह आयोजन किया जाता है। महाभारत कालीन डंडा डांस की इस परंपरा का आज भी मध्यप्रदेश के बैतूल में निर्वहन होता है।
आदिवासी अंचल कहे जाने वाले बैतूल में यूं तो कई तरह की परंपराएं हैं। जिनमें नृत्य और गाने गाये जाते हैं। लेकिन, ग्वाल समाज में एक ऐसी परंपरा है जिसे समाज महाभारत काल से निभाई जा रही है। इस परंपरा की झलक हाल ही में जिला मुख्यालय के अंतर्गत कृष्णपुरा वार्ड टिकारी में देखने को मिली।
गुरुवार रात्रि में यादव समाज द्वारा सामाजिक परंपराओं का निर्वहन करते हुए रात्रि 8 से 12 बजे तक सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इसमें समाज द्वारा सावन के गीतों के साथ डंडे लेकर नाचने की परंपरा निभाई गई। देखें वीडियो…
कार्यक्रम में रायभान यादव, गोरेलाल यादव, चोखेलाल यादव, सूरज प्रसाद, शारदा यादव, मोहन यादव, मिश्रीलाल यादव, रामचरित यादव, धर्मेंद्र यादव, ओमप्रकाश, सुंदरलाल ढोलक मास्टर, दयाराम यादव, साहेबलाल यादव, राजू यादव, हेमंत यादव, मनोज रसिया, चंपा पहलवान, कैलाश यादव, मोनू यादव, बिट्टू ठाकुर, संतोष यादव, काशीराम यादव, छोटेलाल यादव, भैय्यालाल यादव, रामनारायण यादव, ललित यादव, गोरेलाल यादव, हरिराम भगत, खूबचंद यादव सहित समाज के अन्य लोग शामिल हुए।
कृष्णपुरा वार्ड टिकारी बैतूल में सामाजिक परम्पराओं के अनुसार सावन मास में ग्वाल टोली के लोग एकत्रित होकर सावन के गीतों के साथ हाथों में डंडे लेकर नाच गाने का आनंद लेते दिखाए देते हैं। समाज की सभी महिला, पुरूष, बच्चे एकत्रित होकर डंडे, ढोलक, मंजीरों के साथ आल्हा, कृष्ण, राम के वीर रस के गीतों को गाते नजर आते हैं। यह ग्वाल समाज में अपना एक अनूठा गायन है। यह समाज में एकता भाईचारे का त्यौहार है। सावन के महीने में पानी की रिमझिम फुहार में आल्हा खण्ड गायन का विशेष महत्व है।

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ढोलक मंजीरा बजाकर करते हैं इतिहास का वर्णन
इस त्यौहार में ग्वाल समाज की महिलाएं झूला डालकर और पुरुष ढोलक मंजीरे की थाप पर डंडे लेकर गीतों के माध्यम से इतिहास का वर्णन करते हैं। पूर्णिमा के दूसरे दिन भुजलिया का बड़ा पर्व मनाते हैं। जिसमें समूचा समाज एकत्रित होकर टिकारी अखाड़ा मंदिर होते हुए भुजलिया घाट पर भुजलिया विसर्जन करते हैं। एक दूसरे को भुजलिया देते हैं।
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