Effect of Antibiotic: आप भी तो नहीं करते एंटीबायोटिक का अंधाधुंध इस्तेमाल, जान लें इससे कितना है नुकसान
अनिल बेदाग, मुंबई (Effect of Antibiotic)। क्लिनिकल इंफेक्शियस डिज़ीज़ सोसायटी (सीड्स) ने हाल ही में अपना पंद्रहवां वार्षिक सम्मेलन ‘सिड्सकॉन 2025’ आयोजित किया। इस आयोजन में देशभर से जुटे चिकित्सकों और विशेषज्ञों ने एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) को भारत के लिए उभरता हुआ बड़ा खतरा बताया। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस समस्या पर तुरंत ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले समय में संक्रमणों का इलाज करना बेहद कठिन हो जाएगा।
एएमआर क्यों है बड़ी चुनौती
सम्मेलन में विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि एएमआर की सबसे बड़ी वजह एंटीबायोटिक का जरूरत से ज्यादा और गलत इस्तेमाल है। भारत जैसे देशों में डॉक्टर अक्सर बिना जांच के ही मरीजों को एंटीबायोटिक दवाएं लिख देते हैं। कभी-कभी यह दवाएं लंबे समय तक चलती रहती हैं, जिससे उनका असर धीरे-धीरे कम होने लगता है। इस प्रवृत्ति से संक्रमणों का इलाज और अधिक कठिन होता जा रहा है।

चिकित्सा शिक्षा और जागरूकता पर जोर
मुख्य अतिथि और भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद की वैज्ञानिक डॉ. कामिनी वालिया ने अपने संबोधन में कहा कि कम कीमत और आसान उपलब्धता के कारण लोग और डॉक्टर एंटीबायोटिक का अत्यधिक प्रयोग कर रहे हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि मेडिकल शिक्षा में संक्रमण नियंत्रण और जागरूकता को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ी इस संकट से निपट सके।
समझदारी से दवा के उपयोग की अपील
सीएमसी वेल्लोर के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. जॉर्ज वर्गीज़ ने बताया कि जरूरत से ज्यादा एंटीबायोटिक लिखने से दवा का असर खत्म हो जाता है। उन्होंने कहा कि हर संक्रमण में दवा देना जरूरी नहीं होता, बल्कि सही समय और सही मात्रा में ही इसका इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

अस्पतालों की भूमिका और सावधानी
वैज्ञानिक अध्यक्ष डॉ. राजीव सोमन ने कहा कि अस्पतालों में एएमआर को लेकर जागरूकता बेहद जरूरी है। उन्होंने जोर देकर कहा कि हाथ धोने जैसी सामान्य आदतें भी संक्रमण रोकने में मदद करती हैं। आम जनता को भी यह समझना होगा कि वे डॉक्टरों पर एंटीबायोटिक लिखने का दबाव न डालें, वरना कई गंभीर बीमारियों का इलाज असंभव हो सकता है।
भारत में बढ़ती दिक्कतें
सीड्स के सचिव डॉ. वसंत नागवेकर ने बताया कि भारत में 60 से 70 प्रतिशत संक्रमण अब तीसरी पीढ़ी की एंटीबायोटिक दवाओं पर भी असर नहीं दिखा रहे। उन्होंने बताया कि टीबी, मलेरिया, डेंगू और लेप्टोस्पायरोसिस जैसे संक्रमणों का इलाज हर साल और अधिक मुश्किल होता जा रहा है। उनका कहना था कि दवाओं का इस्तेमाल केवल गाइडलाइन के अनुसार ही होना चाहिए।
केवल दवाओं से नहीं सुलझेगी समस्या
सीड्स के उपाध्यक्ष डॉ. सुब्रमणियन ने स्पष्ट कहा कि एएमआर की समस्या को केवल नई दवाओं या वैक्सीन से हल नहीं किया जा सकता। इसके लिए स्वच्छता की स्थिति को बेहतर बनाना और मेडिकल शिक्षा में सुधार करना बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि यदि स्वच्छ वातावरण और सही इलाज की व्यवस्था होगी, तभी संक्रमणों पर नियंत्रण पाया जा सकेगा।
अस्पताल में संक्रमण का खतरा
सीएमसी वेल्लोर के ही डॉ. वी. बालाजी ने चेतावनी दी कि अस्पतालों में भर्ती मरीजों को वहीं का संक्रमण लग जाना सबसे खतरनाक स्थिति है। यह न सिर्फ मरीज की जान के लिए बड़ा खतरा है, बल्कि इलाज को भी बेहद मुश्किल बना देता है।
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विशेषज्ञों ने दी यह बड़ी चेतावनी
सम्मेलन में मौजूद सभी विशेषज्ञों ने एक स्वर में कहा कि अगर एएमआर पर तुरंत काबू पाने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए तो स्थिति भयावह हो सकती है। उनका अनुमान है कि वर्ष 2050 तक दुनिया में हर साल लगभग एक करोड़ लोगों की मौत का कारण एएमआर बन सकता है।
केवल गाइडलाइन के अनुसार उपयोग
विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि एंटीबायोटिक का उपयोग केवल चिकित्सकीय गाइडलाइन के अनुसार किया जाए, अस्पतालों में संक्रमण नियंत्रण के नियमों का सख्ती से पालन हो और आम जनता को भी जागरूक किया जाए। यदि इन उपायों पर गंभीरता से अमल किया गया तो इस संकट से निपटा जा सकता है।
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