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Anokhi diwali: यहां पांच दिन नहीं बल्कि पूरे महीने भर चलती है दीपावली, बुलाए जाते हैं मेहमान, पूरा गांव मिलकर मनाता है जश्‍न

adivasiyo ki diwali

aadivasiyon ki diwali: दीपावली का पर्व महापर्व होता है। वैसे तो इसका सबसे मुख्य त्योहार लक्ष्मी पूजन के दिन ही होता है, लेकिन इसे पंच पर्वों का महापर्व कहते हैं। इसमें पांच दिनों तक अलग-अलग पर्व मनाए जाते हैं। देश भर में दीपावली की धूम इन पांच दिनों में समाप्त हो जाती है, लेकिन मध्यप्रदेश में एक जिला ऐसा भी है जहां दीपावली (Dipawali) का त्योहार पांच दिन नहीं बल्कि पूरे एक महीने तक मनाया जाता है। यह अनूठा जिला है बैतूल जिला (Betul District)।

जी हां, बैतूल जिले में दीपावली की धूम पूरे महीने भर तक रहती है। यहां ठेठ ग्रामीण अंचल में यह पर्व इतने अनूठे अंदाज में और आत्मीयता के साथ मनाया जाता है जो कि शहरी क्षेत्रों में कहीं शायद ही नजर आए। महीने भर तक दीपावली का पर्व मनाने की यह पंरपरा आज-कल की नहीं है बल्कि बीते कई सालों से यह जारी है।

दरअसल, बैतूल जिला आदिवासी बहुल जिला (Tribal-dominated district) है। वहीं यह परंपरा भी आदिवासी वर्ग की ही है। इसलिए यहां पर दीपावली का त्योहार पूरे एक महीने तक चलता है। सामान्य परिवारों द्वारा यह पर्व व्यक्तिगत रूप से मनाया जाता है, लेकिन आदिवासी वर्ग (tribal class) में पूरा समाज मिलकर सामूहिक रूप से यह त्योहार मनाता है। यही कारण है कि यह त्योहार एक महीने तक चलता है।

जिले के आदिवासी ग्रामों में किस दिन यह त्योहार कहां मनाया जाएगा, यह बाकायदा पहले यह तय किया जाता है। इसके अनुसार ही फिर त्योहार मनाने का सिलसिला शुरू होता है। इसके बाद जिस दिन जिस ग्राम में दीपावली मनाना होता है, उस दिन के लिए उस गांव के लोग अपने रिश्तेदारों को आमंत्रित करते हैं। इस आमंत्रण पर उस गांव के लोगों के सभी नाते-रिश्तेदार उस गांव में एकत्रित होते हैं।

दीपावली वाले दिन हर घर में परिवारों की सामर्थ्य के अनुसार पकवान आदि बनाए जाते हैं और सभी मिलकर दीपावली का त्योहार मनाते हैं। इस दिन सामूहिक रूप से आदिवासी नृत्य आदि भी किया जाता है। अधिकतर गांवों में दीपावली का दिन ऐसा तय किया जाता है कि उस दिन साप्ताहिक बाजार भी लगता हो। ऐसे में इस दिन खूब खरीददारी भी लोग करते हैं।

बाजारों में नजर आती है लोक कला

महीने भर तक चलने वाली इस दीपावली के अलावा दीपावली पर्व के बाद जिले के विभिन्न स्थानों पर लगने वाले साप्ताहिक बाजारों में भी आदिवासी नृत्य कला नजर आती है। दरअसल, इन साप्ताहिक बाजारों में आदिवासी वर्ग के लोग सामूहिक रूप से पारंपरिक वेश भूषा में सज-धज कर पारंपरिक लोक नृत्य करते हैं। इसके बदले में लोग उन्हें पुरस्कार भी प्रदान करते हैं। बच्चों के लिए उनका यह लोक नृत्य (Folk dance) खासा आकर्षण का केंद्र होता है।

उत्तम मालवीय

मैं इस न्यूज वेबसाइट का ऑनर और एडिटर हूं। वर्ष 2001 से पत्रकारिता में सक्रिय हूं। सागर यूनिवर्सिटी से एमजेसी (मास्टर ऑफ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री प्राप्त की है। नवभारत भोपाल से अपने करियर की शुरुआत करने के बाद दैनिक जागरण भोपाल, राज एक्सप्रेस भोपाल, नईदुनिया और जागरण समूह के समाचार पत्र 'नवदुनिया' भोपाल में वर्षों तक सेवाएं दी। अब इस न्यूज वेबसाइट "Betul Update" का संचालन कर रहा हूं। मुझे उत्कृष्ट पत्रकारिता के लिए प्रतिष्ठित सरोजिनी नायडू पुरस्कार प्राप्त करने का सौभाग्य भी नवदुनिया समाचार पत्र में कार्यरत रहते हुए प्राप्त हो चुका है।

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