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Betul Paras Stone Raja Eel: क्या है बैतूल के ‘पारस पत्थर’ का रहस्य? जानिए राजा ईल और मां चण्डी दरबार की पूरी कहानी

Betul Paras Stone Raja Eel: मध्यप्रदेश के बैतूल जिले में आदिवासी समाज की आस्था और इतिहास के प्रतीक गोंडवाना साम्राज्य के राजा ईल की कुलदेवी मां चण्डी के प्राचीन दरबार एक बार फिर चर्चा में है। चर्चा की वजह यह है कि मां चण्डी दरबार का मामला अब राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग नई दिल्ली के पास पहुंच गया है।

आज हम इस आर्टिकल में जानेंगे कि मां चण्डी कौन थीं और यह मामला राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के पास क्यों पहुंचा है। इस बारे में आयोग को सौंपे गए ज्ञापन में ही विस्तृत जानकारी आदिवासी समाज की ओर से दी गई है।

आदिकाल से समाज की आस्था का केंद्र

सौंपे गए ज्ञापन में बताया गया है कि बैतूल जिले की चिचोली तहसील के ग्राम गोधना में स्थित यह पवित्र देवल स्थल आदिकाल से जनजातीय समाज की आस्था का केंद्र रहा है। जनजातीय परंपराओं के अनुसार राजा ईल द्वारा पूजा गई मां चण्डी दाई की स्वयंभू पिंडी आज भी उसी स्थान पर स्थापित है जहां से राजा ईल ने खेड़ला दुर्ग से शासन किया था।

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आशीर्वाद लेकर शुरू करते थे राज काज

आदिवासी समाज के अनुसार राजा ईल मां चण्डी दाई को कुलदेवी मानते थे और राज्य कार्य शुरू करने से पूर्व देवल स्थान पर रुककर पूजा पाठ करते थे। चण्डी दाई के आशीर्वाद से राजा ईल को पारस पत्थर की प्राप्ति हुई थी, जिससे उनका नाम आदिवासी इतिहास में अमर है।

त्रिशूल चढ़ाकर व्यक्त करते हैं अपनी श्रद्धा

आज भी गोंड, कोरकू, परधान, भील, भीलाला, कोल सहित अन्य जनजातियां इस दरबार में त्रिशूल, बलि और चढ़ावे के माध्यम से अपनी श्रद्धा व्यक्त करती हैं। यहां रविवार और बुधवार को विशेष पूजा-अर्चना की जाती है और जनजातीय रीति-रिवाजों के अनुसार पूजा का क्रम अनवरत चलता है।

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अब संकट में है मां चण्डी दरबार

मां चण्डी दरबार की देखरेख और पूजा जनजातीय समाज द्वारा ही की जाती रही है, लेकिन अब यह पवित्र स्थल संकट में है। सौंपे गए ज्ञापन में आरोप लगाया गया है कि राजस्व विभाग की त्रुटियों और शासकीय संरक्षण के अभाव में यह स्थान एक निजी व्यक्ति के अवैध नियंत्रण में आ गया है।

चढ़ावे की राशि का निजी हित में उपयोग

समाज का आरोप है कि वह शासन से सांठगांठ कर मंदिर का संचालन कर रहा है और चढ़ावे की पूरी राशि निजी हित में उपयोग कर रहा है। श्रद्धालुओं द्वारा यहां चढ़ावे की राशि के साथ ही सोने, चांदी के आभूषण भी चढ़ाए जाते हैं।

ऐतिहासिक देवल स्थल के संरक्षण की मांग

इस गंभीर स्थिति को देखते हुए जिला बैतूल के समस्त आदिवासी समाज के श्रद्धालुओं ने राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग, नई दिल्ली को एक ज्ञापन सौंपकर मां चण्डी दाई के दरबार, प्राचीन मंदिर और ऐतिहासिक देवल स्थल को संरक्षण देने की अपील की है। साथ ही आदिवासी सामाजिक और धार्मिक मूल्यों की रक्षा की भी मांग की गई है।

इन प्रतिनिधियों ने सौंपा आयोग को ज्ञापन

ज्ञापन देने वालों में अधिवक्ता जितेन्द्र सिंह इवने, अधिवक्ता महेश उइके, कपिल करोचे, संतोष टेकाम, सतीष इवने, फुलेसिंग कुमरे, चलक सिंह उइके, विनोद इवने, पंकज कवडे सहित आदिवासी समाज के प्रतिनिधि शामिल हैं। सभी ने मां चण्डी दाई दरबार की महिमा, परंपरा और ऐतिहासिकता को बचाने के लिए आयोग से शीघ्र हस्तक्षेप की मांग की है ताकि यह पवित्र स्थल भविष्य में सुरक्षित रह सके और जनजातीय समाज की आस्था अक्षुण्ण बनी रहे।

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उत्तम मालवीय

मैं इस न्यूज वेबसाइट का ऑनर और एडिटर हूं। वर्ष 2001 से पत्रकारिता में सक्रिय हूं। सागर यूनिवर्सिटी से एमजेसी (मास्टर ऑफ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री प्राप्त की है। नवभारत भोपाल से अपने करियर की शुरुआत करने के बाद दैनिक जागरण भोपाल, राज एक्सप्रेस भोपाल, नईदुनिया और जागरण समूह के समाचार पत्र 'नवदुनिया' भोपाल में वर्षों तक सेवाएं दी। अब इस न्यूज वेबसाइट "Betul Update" का संचालन कर रहा हूं। मुझे उत्कृष्ट पत्रकारिता के लिए प्रतिष्ठित सरोजिनी नायडू पुरस्कार प्राप्त करने का सौभाग्य भी नवदुनिया समाचार पत्र में कार्यरत रहते हुए प्राप्त हो चुका है।

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