ओंकारेश्वर : यहां स्वयं प्रकट हुए थे भोलेनाथ, आज भी यहीं आते हैं शयन करने, शिव-पार्वती जी खेलते हैं चौसर

• लोकेश वर्मा, मलकापुर (बैतूल)
सावन के महीने में भगवान शिव की आराधना का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम कावड़ यात्रा माना जाता है। कावड़ यात्रा की शुरुआत पवित्र नदियों और तीर्थ स्थलों से होती है। जबकि इसका समापन शिव मंदिरों में भगवान शिव के जलाभिषेक के साथ होता है। इन दिनों मध्यप्रदेश में ओंकारेश्वर और महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग पर जल अर्पण करने के लिए हजारों भक्त कावड़ यात्रा के माध्यम से शिव आराधना कर रहे हैं।
मध्य प्रदेश में 2 ज्योतिर्लिंग स्थित हैं। यहां पर ओंकारेश्वर और महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के बीच भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु कावड़ यात्रा के माध्यम से शिव आराधना करते हैं। ओंकारेश्वर में भगवान ओमकार का नर्मदा के जल से अभिषेक कर श्रद्धालु ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर के दर्शन के लिए कावड़ यात्रा के साथ निकलते हैं।
इसी प्रकार उज्जैन में क्षिप्रा मैया का जल लेकर शिवभक्त ओंकारेश्वर तक की यात्रा भी पूर्ण करते हैं। ओंमकारेश्वर नर्मदा नदी के मध्य द्वीप पर स्थित है। दक्षिणी तट पर ममलेश्वर (प्राचीन नाम अमरेश्वर) मंदिर स्थित है। ओंकारेश्वर में ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के साथ ही ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग भी है। इन दोनों शिवलिंगों को एक ही ज्योतिर्लिंग माना जाता है। यह हिंदुओं का एक पवित्र स्थान है।

भगवान शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंग में चौथा ओम्कारेश्वर है
ओमकार का उच्चारण सर्वप्रथम सृष्टिकर्ता ब्रह्मा के मुख से हुआ था। वेद पाठ का प्रारंभ भी ॐ के बिना नहीं होता है। उसी का ओमकार स्वरुप ज्योतिर्लिंग श्री ओम्कारेश्वर है। अर्थात यहाँ भगवान शिव ओम्कार स्वरुप में प्रकट हुए हैं। ज्योतिर्लिंग वे स्थान कहलाते हैं जहाँ पर भगवान शिव स्वयं प्रकट हुए थे एवं ज्योति रूप में स्थापित हैं। प्रणव ओम्कारेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन से समस्त पाप भस्म हो जाते हैं।
पुराणों में स्कन्द पुराण, शिवपुराण व वायुपुराण में ओम्कारेश्वर क्षेत्र की महिमा का उल्लेख है। ओम्कारेश्वर में कुल 68 तीर्थ है। यहाँ 33 कोटि देवता विराजमान हैं। दिव्य रूप में यहाँ पर 108 प्रभावशाली शिवलिंग है।
84 योजन का विस्तार करने वाली माँ नर्मदा का विराट स्वरुप है एवं यह ऐसा एकमात्र ज्योतिर्लिंग है जो नर्मदा के उत्तर तट पर स्थित है। भगवान शिव प्रतिदिन तीनों लोकों में भ्रमण के पश्चात यहाँ आकर विश्राम करते हैं। इसलिए यहाँ प्रतिदिन भगवान शिव की विशेष शयन व्यवस्था एवं आरती की जाती है तथा शयन दर्शन होते हैं।

ओमकारेश्वर का यह है इतिहास
मध्ययुगीन काल में मंधाता ओंकारेश्वर पर धार के परमार, मालवा के सुल्तान, ग्वालियर के सिंधिया जैसे तत्कालीन शासकों का शासन रहा। फिर अंत में यह 1894 में अंग्रेजों के अधीन हो गया। आधिपत्य के तहत आदिवासी भील सरदार नथ्थू भील का तब शासन था और दरियाव गोसाई ने अपने आधिपत्य के लिए जयपुर के राजा का दरवाजा खटखटाया। राजा ने मालवा की सीमा पर अपने भरतसिंह चौहान, जो कि झालरापाटन के सूबेदार थे।
अंत में पूरे संघर्ष का अंत भरतसिंह चौहान की शादी नत्थू भील की ही बेटी के साथ होने पर हुआ। राजपूत सहयोगियों की भी अन्य भील लड़कियों से शादी हुई। 1165 ईस्वी उनके वंशजों को भिलाला कहा जाता था। वो सब मंधाता में बस गए। भरतसिंह चौहान के वंशजों का ओंकारेश्वर में राज रहा। ब्रिटिश शासन के दौरान इन सबको राव रूप में जाना जाता था। उनकी जागीर अधिकार के रूप में मंधाता ओंकारेश्वर था।
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ओमकारेश्वर ज्योतिर्लिंग पहुंचने के दो रास्ते
यहाँ नर्मदाजी के तट पक्का घाट है। वहां से नाव से नर्मदाजी को पार करके उस ओर मंदिर के घाट पर पहुंचते। यहीं नर्मदा नदी में स्नान करके सीढ़ियों से ऊपर चढ़कर ओंकारेश्वर के मन्दिर में दर्शन करने जाते हैं। दूसरा रास्ता पुल से होकर जाता है। पुल से माँ नर्मदा का अति सुन्दर दृश्य दिखाई देता है।
पांच मंजिला भवन में है ज्योतिर्लिंग परिसर
ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग का परिसर पांच मंजिला भवन के रूप में है। पहली मंजिल पर महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग स्थित है। भवन की तीसरी मंजिल पर सिद्धनाथ महादेव स्थापित है। चौथी मंजिल पर गुप्तेश्वर महादेव और पांचवी मंजिल पर राजेश्वर महादेव का मंदिर स्थित है।ओमकारेश्वर मंदिर में 15 फीट ऊँचे 60 बड़े बड़े स्तम्भ हैं।
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हरियाली की चादर ओढा ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग
यहाँ माँ नर्मदा ॐ के आकार में बहती है। इसलिए इसे ओंकारेश्वर नाम से जाना जाता है। यह भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगओं में से एक ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग है, जो चौथे स्थान पर है। यह ज्योतिर्लिंगों से इसलिए अलग है क्योंकि यहां भगवान शंकर दो रूप में विराजमान हैं। एक ओंकारेश्वर और दूसरे ममलेश्वर। दो ज्योतिर्लिंग के रूप में होने पर भी ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग को एक ही गिना जाता है।
ओमकारेश्वर की महिमा ऐसी है कि भगवान शिव और माता पार्वती प्रतिदिन तीनों लोकों में विचरण करते हैं और रात्रि में विश्राम करने ओम्कारेश्वर आते हैं। महादेव और माता पार्वती रोज रात को पांसे से चौसर खेलते हैं। रोज रात को शयन आरती के बाद ज्योतिर्लिंग के सामने चौसर और पांसे सीधे जमाये जाते हैं। रात में गर्भ गृह में कोई प्रवेश नहीं कर सकता। सुबह गर्भ गृह खुलता है तो पांसे उलटे पड़े मिलते हैं। यह अपने आप में एक आश्चर्यजनक सत्य है।
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ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा
महामुनि नारद विन्ध्य पर्वत से मिलने पहुंचे। तब विन्ध्य पर्वत बहुत अहंकारी हो चुका था। अपने अहंकार के मद में चूर होकर उसने नारदजी से कहा, मैं बहुत विशाल और सर्वगुण सम्पन्न हूं। मेरे जैसा कोई नहीं है। नारदजी को विन्ध्य पर्वत का घमंडी व्यवहार उचित नहीं लगा। तब नारदजी ने विन्ध्याचल पर्वत के घमंड को तोड़ने के लिए कहा कि भले ही तुम सर्वगुण संम्पन्न हो पर तुम मेरु पर्वत जितने ऊँचे नहीं हो। मेरु पर्वत की ऊंचाई तुमसे बहुत ज्यादा है।
नारदजी के कथन को सुनकर विन्ध्य पर्वत को बहुत दुख और पीड़ा हुई। उसे मेरु पर्वत की ऊँचाई से उसे ईर्षा होने लगी। तब विंध्याचल पर्वत ने भगवान महादेव की शरण में जाने का निश्चय किया। जहां कण कण में साक्षात ओंकार उपस्थित हैं। वहां उसने एक मिट्टी का शिवलिंग स्थापित किया और भगवान भोलेनाथ की कठिन तपस्या करने लगा। कई वर्षों की कठिन तपस्या से भगवान शिवजी अति प्रसन्न हुए। उन्होंने ने विन्ध्य पर्वत को अपने दिव्य स्वरूप के दुर्लभ दर्शन दिए। भगवान शिव ने विन्ध्य को जिस प्रकार का कार्य करना चाहे, वैसा कार्य करने का वर विन्ध्य को दिया। तब तक वहां कई देवतागण तथा ऋषि-मुनि भी उपस्थित हो गये।
उन्होंने भी महादेव की विधिवत पूजा अर्चना की और उनसे प्रार्थना की कि हे भोलेनाथ आप सदैव के लिए यहां स्थापित होकर निवास करें। भगवान अपने भक्तों पर प्रसन्न थे। उन्होंने प्रार्थना को स्वीकार कर लिया। वहाँ स्थित ज्योतिर्लिंग दो स्वरूपों में विभक्त हो गया। एक प्रणव के अन्तर्गत शिवलिंग ओंकारेश्वर और दूसरा पार्थिव लिंग ममलेश्वर एंव अमलेश्वर ज्योतिर्लिंग के नाम से विश्वविख्यात हुए।
कैसे पहुंचे ओंकारेश्वर
ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मध्यप्रदेश के खंडवा से 75 किमी इंदौर-खंडवा हाईवे पर एवं देश के प्रमुख शहर इंदौर से 90 किमी की दूरी पर है। यहां बस और ट्रेन दोनों के ही जरिए पहुंचा जा सकता है।
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