Weak Monsoon: मॉनसून की बेरुखी के बाद अल नीनो का खतरा, रबी की फसलों पर पड़ सकता है बड़ा असर
Weak Monsoon: Following a lackluster monsoon, the threat of El Niño looms—potentially having a major impact on Rabi crops.

Weak Monsoon: भारत में वर्ष 2026 का मॉनसून सामान्य से काफी कम बारिश दर्ज कराकर विदा हो चुका है। जून से सितंबर के दौरान देश भर में औसत से लगभग 13% कम वर्षा दर्ज की गई है। क्लाइमेट ट्रेंड्स द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार यह पिछले दस वर्षों का सबसे कमजोर मॉनसून साबित हुआ है। प्रशांत महासागर में तेजी से आकार ले रहा अल नीनो आने वाली सर्दियों और रबी सीजन की फसलों के लिए नई मुश्किलें पैदा कर रहा है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि अक्टूबर से दिसंबर 2026 के बीच अल नीनो के वर्ष 1950 के बाद के सबसे शक्तिशाली स्वरूप में बदलने की 83% संभावना है, जिसका गंभीर प्रभाव फरवरी 2027 और उसके आगे भी देखने को मिल सकता है।
रिकॉर्डतोड़ गर्मी, असामान्य बारिश और पांच राज्यों में सूखा
बारिश की भारी कमी का सीधा प्रभाव तापमान पर पड़ा है, जिससे अगस्त 2026 वर्ष 1901 के बाद से देश का सबसे गर्म अगस्त दर्ज किया गया, जबकि सितंबर महीना भी इतिहास का पांचवां सबसे गर्म सितंबर रहा। तेलंगाना, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में आधिकारिक तौर पर सूखे की घोषणा हो चुकी है, जहां महाराष्ट्र का 75% भूभाग सूखे की चपेट में है। इसके अलावा स्काईमेट वेदर के उपाध्यक्ष महेश पलावत के अनुसार मॉनसून प्रणालियों के व्यवहार में बदलाव आया है, जिससे कम दबाव के क्षेत्र लंबे समय तक जमीन पर टिककर अत्यधिक बारिश और बादल फटने जैसी चरम घटनाओं को जन्म दे रहे हैं।
पूर्वी और दक्षिणी राज्यों में बारिश का बड़ा सूखा
देश के पूर्वी और पूर्वोत्तर राज्यों में बारिश में 25.6% की भारी कमी रही है, जहां सामान्य 1,367.3 मिमी के मुकाबले केवल 1,017.1 मिमी बारिश हुई, जो 1901 के बाद का सबसे निचला स्तर है। असम के 35 में से 22, अरुणाचल के 12, मेघालय के 10 और बिहार के 33 जिलों में बारिश सामान्य से काफी कम दर्ज की गई। इसी तरह दक्षिणी प्रायद्वीप में भी सामान्य 716 मिमी की तुलना में महज 542 मिमी बारिश हुई, जिसमें कर्नाटक में 30%, केरल में 28%, आंध्र प्रदेश में 25% और तमिलनाडु में 20% की गिरावट दर्ज की गई। दूसरी ओर मध्य और उत्तर-पश्चिम भारत में पश्चिमी प्रशांत महासागर से आई 14 कम दबाव प्रणालियों के कारण वर्षा की स्थिति लगभग सामान्य के आसपास बनी रही।
जलवायु वैज्ञानिकों की चेतावनी और कृषि उत्पादन पर असर
भारत मौसम विज्ञान विभाग के पूर्व महानिदेशक डॉ. के. जे. रमेश और भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान के जलवायु वैज्ञानिक डॉ. रॉक्सी मैथ्यू कोल का मानना है कि जलवायु परिवर्तन और वनों की कटाई अल नीनो के दुष्प्रभावों को और खतरनाक बना रही है। कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के आंकड़ों के मुताबिक 5 अक्टूबर 2026 तक धान की बुवाई का क्षेत्रफल 15.56 लाख हेक्टेयर घट गया है, साथ ही गन्ना और कपास का रकबा भी कम हुआ है। सेंटर फॉर सस्टेनेबल एग्रीकल्चर के कार्यकारी निदेशक डॉ. जी. वी. रामंजनेयुलु ने चेतावनी दी है कि बारिश का असमान वितरण और लंबा सूखा अंतराल मिट्टी की नमी खत्म कर रहा है, इसलिए किसानों को धान के बजाय कम पानी वाली दलहन, तिलहन और मोटे अनाज की खेती की ओर रुख करना चाहिए।
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जलाशयों में घटता पानी और आने वाले समय की चुनौतियां
केंद्रीय जल आयोग के अनुसार 8 अक्टूबर 2026 तक देश के 178 प्रमुख जलाशयों में कुल जल भंडारण पिछले साल का मात्र 78.71% और सामान्य का 87.08% ही बचा है, जिसमें दक्षिणी क्षेत्र के बांधों में जल स्तर सामान्य का केवल 47.22% ही रह गया है। मौसम विशेषज्ञों और आरती खोसला (निदेशक, क्लाइमेट ट्रेंड्स) के अनुसार आने वाले महीनों में तापमान के नए रिकॉर्ड बन सकते हैं और फरवरी से ही भीषण गर्मी शुरू होने की आशंका है। इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए केंद्र सरकार ने 2026-27 के लिए कुल खाद्यान्न उत्पादन का लक्ष्य घटाकर 37.393 करोड़ टन तय किया है, जो पिछले वर्ष से 26.3 लाख टन कम है। आईपीसीसी का आकलन भी बताता है कि अल नीनो और ग्लोबल वॉर्मिंग के संयुक्त प्रभाव से वर्ष 2050 तक वैश्विक फसल पैदावार में 10 से 25% की बड़ी गिरावट आ सकती है।
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