Scared to death : बैतूल के इस गांव में नहीं तोड़ी जाती जेरी, कहते हैं मौत की जेरी, यह है इसकी वजह

बैतूल जिले में चैत्र माह में मेघनाद मेलों की धूम रहती है। ग्रामीण इलाकों में चैत्र पूर्णिमा तक मेले लगते हैं। जिन्हें मेघनाथ मेला, चैत्र मेला या फागुन मेला भी कहते हैं। इन मेलों में आदिवासी समाज की अहम भूमिका रहती है। यहां मेघनाद पूजा के उपरांत ही मेलों का आयोजन होता है। इसी कड़ी में जिला मुख्यालय के समीप स्थित ग्राम खेड़ी सांवलीगढ़ का गंगाकुण्ड मेला भी शुक्रवार 1 अप्रैल को आयोजित होगा। मेले की सारी सुविधाओं की जिम्मेदारी ग्राम पंचायत की होती है।
इस गंगाकुंड मेले की विशेषता यह है कि यहां जेरी नहीं तोड़ी जाती है। इसके पीछे वजह यह बताई जाती है कि यहां जेरी तोड़ने वालों की एक तो मौत हो जाती है या वे बीमार पड़ जाते हैं। बताया जाता है कि आज से 5 साल पहले जेरी तोड़ने जेरी पर चढ़े एक युवक की गिरने के बाद मौत हो गई थी। इसके पूर्व भी जेरी तोड़ने वाले बीमार पड़ने लगे थे। यह देखते हुए क्षेत्रवासी इसे मौत की जेरी कहने लगे। लोगों में जेरी को लेकर बड़ा खौफ है।
खेड़ी का गंगाकुंड मेला सबसे प्राचीन मेला है। जहां मेला स्थल पर गंगाकुंड का निर्माण मध्यप्रदेश के पूर्व राज्यपाल डॉक्टर पट्टाभि सीतारमैया ने करवाया था। यहां गंगाकुंड के साथ तरणताल का भी निर्माण किया गया है। वहीं इसके किनारे पर एक विशाल शिवमंदिर का निर्माण किया गया है।
शिव मंदिर में स्थापित शिवलिंग की भी एक विशेषता है। इसे डमरू शिवलिंग कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस शिवलिंग की केवल बैठ कर ही पूजा की जाती है। मंदिर में ज्यादा समय भी व्यतीत नहीं कर सकते। इस वर्ष मेला लगाने ग्राम पंचायत द्वारा दो दिन पूर्व से ही जमीन के समतलीकरण का कार्य कराया जा रहा है।



