देश/विदेश

No Work No Pay: नहीं लागू होगा नो वर्क नो पे: हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, कर्मचारियों को एरियर्स सहित मिलेगा बकाया वेतन

No Work No Pay: 2008 से प्रतिगामी वरिष्ठता मान्य, विभागीय गलती से रोके गए कर्मचारियों को बकाया वेतन देने के आदेश

No Work No Pay: नहीं लागू होगा नो वर्क नो पे: हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, कर्मचारियों को एरियर्स सहित मिलेगा बकाया वेतन
No Work No Pay: नहीं लागू होगा नो वर्क नो पे: हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, कर्मचारियों को एरियर्स सहित मिलेगा बकाया वेतन

No Work No Pay: मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ कर दिया है कि यदि कोई कर्मचारी काम करने के लिए तैयार और इच्छुक है, लेकिन विभाग की गलती से उसे कार्य करने से रोका गया, तो उस पर नो वर्क नो पे का सिद्धांत लागू नहीं किया जा सकता। अदालत ने रीवा वन विभाग से जुड़े फॉरेस्ट गार्डों के मामले में यह महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए उन्हें बकाया वेतन, एरियर्स और अन्य सेवा लाभ देने के निर्देश दिए हैं।

दैवेभो से फॉरेस्ट गार्ड बनने की प्रक्रिया

रीवा निवासी राजेश कुमार पांडे और अन्य कर्मचारियों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर बताया था कि उनकी नियुक्ति वर्ष 1980 में वन विभाग में दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी के रूप में हुई थी। उन्होंने 20 वर्ष से अधिक समय तक सेवा दी। बाद में सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के बाद राज्य सरकार ने योग्य दैनिक वेतनभोगियों को नियमित रूप से फॉरेस्ट गार्ड के पद पर नियुक्त करने का निर्णय लिया।

इसी क्रम में सितंबर 2008 में चीफ कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट द्वारा 1500 रिक्त पदों की अधिसूचना जारी की गई, जिनमें से 1006 पद पात्र उम्मीदवारों से भरे जाने थे। रीवा सर्कल में 3 नवंबर 2008 को जारी सूची में 262 अभ्यर्थियों में से 217 को सफल घोषित किया गया। इनमें से 89 को नियुक्ति दे दी गई, जबकि 92 पद खाली रहे।

चयन के बाद भी नियुक्ति नहीं

याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उन्होंने लिखित परीक्षा, साक्षात्कार और शारीरिक परीक्षा सहित सभी चरण सफलतापूर्वक पार किए थे। दस्तावेज सत्यापन के लिए बुलाए जाने के बावजूद उन्हें नियुक्ति पत्र जारी नहीं किया गया। चयन सूची की वैधता 28 मई 2010 के आदेश से बढ़ा दी गई थी।

अगस्त 2010 में उन्हें नियुक्ति पत्र जारी हुए। शारीरिक और चिकित्सकीय परीक्षण में फिट पाए जाने के बाद उन्होंने कार्यभार ग्रहण भी कर लिया। लेकिन मात्र एक माह बाद सितंबर 2010 में उनकी नियुक्ति निरस्त कर दी गई। इसके बाद उन्होंने न्यायालय की शरण ली।

स्टेट वाइज मेरिट लिस्ट का आदेश

जुलाई 2011 में हाईकोर्ट ने माना कि जिला स्तर पर मेरिट सूची बनाना उचित नहीं था। अदालत ने राज्य स्तर पर मेरिट सूची तैयार कर उसी आधार पर नियुक्ति देने का निर्देश दिया। यह आदेश बाद में युगलपीठ ने भी बरकरार रखा। राज्य सरकार द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका को अगस्त 2015 में सर्वोच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया।

इसके बाद राज्य सरकार ने स्टेट वाइज मेरिट लिस्ट तैयार की और जनवरी 2017 में याचिकाकर्ताओं को प्रोबेशन पर फॉरेस्ट गार्ड के रूप में नियुक्ति दी। हालांकि उनसे कम मेरिट वाले उम्मीदवारों को 2008 में ही नियुक्ति मिल चुकी थी।

वरिष्ठता मिली, लेकिन वेतन रोका गया

अक्टूबर 2017 में हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि याचिकाकर्ताओं को 2008 से वरिष्ठता दी जाए। वन विभाग ने वरिष्ठता तो मान ली, लेकिन उस अवधि का वेतन और एरियर्स देने से इनकार कर दिया। इसके खिलाफ दोबारा याचिका दायर की गई, जिसे नवंबर 2023 में एकलपीठ ने खारिज कर दिया। एकलपीठ ने कहा था कि चूंकि नियुक्ति 2008 में प्रभावी नहीं हुई थी, इसलिए उस अवधि का वेतन देय नहीं है।

इस आदेश के खिलाफ पुनः अपील की गई। याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि उनका चयन 16 सितंबर 2008 की अधिसूचना के तहत विधिवत हुआ था। नियुक्ति केवल जिला स्तरीय मेरिट सूची की त्रुटि के कारण नहीं हो सकी थी, जिसे बाद में अदालत ने गलत ठहराया था।

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट का स्पष्ट रुख

जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की युगलपीठ ने मामले की सुनवाई के बाद एकलपीठ का आदेश निरस्त कर दिया। अदालत ने कहा कि अपीलकर्ता 2008 की भर्ती प्रक्रिया में विधिवत चयनित हुए थे। उनकी नियुक्ति अयोग्यता के कारण नहीं रोकी गई थी, बल्कि प्रशासनिक त्रुटि के कारण ऐसा हुआ।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जब कर्मचारियों को 2008 से प्रतिगामी वरिष्ठता दी गई है, तो उस अवधि के वेतन से वंचित रखना आदेश का अधूरा पालन माना जाएगा। न्यायालय ने कहा कि नो वर्क नो पे का सिद्धांत यांत्रिक तरीके से लागू नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब कर्मचारी स्वयं काम करने को तैयार था और उसे विभागीय गलती के कारण रोका गया।

एरियर्स और अन्य लाभ देने के निर्देश

युगलपीठ ने आदेश दिया कि याचिकाकर्ताओं को प्रारंभिक नियुक्ति की तिथि से वरिष्ठता और वेतन के अंतर का लाभ दिया जाए। साथ ही बकाया वेतन और अन्य सेवा संबंधी लाभ भी प्रदान किए जाएं।

इस फैसले को कर्मचारियों के अधिकारों की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि किसी कर्मचारी को गलत प्रशासनिक निर्णय के कारण काम से वंचित किया जाता है, तो उसका आर्थिक नुकसान नहीं होना चाहिए। यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों के लिए मार्गदर्शक सिद्ध हो सकता है।

सोशल मीडिया पर बैतूल अपडेट की खबरें पाने के लिए फॉलो करें-

देश-दुनिया की ताजा खबरें (Hindi News Madhyapradesh) अब हिंदी में पढ़ें| Trending खबरों के लिए जुड़े रहे betulupdate.com से| आज की ताजा खबरों (Latest Hindi News) के लिए सर्च करें betulupdate.com

उत्तम मालवीय

मैं इस न्यूज वेबसाइट का ऑनर और एडिटर हूं। वर्ष 2001 से पत्रकारिता में सक्रिय हूं। सागर यूनिवर्सिटी से एमजेसी (मास्टर ऑफ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री प्राप्त की है। नवभारत भोपाल से अपने करियर की शुरुआत करने के बाद दैनिक जागरण भोपाल, राज एक्सप्रेस भोपाल, नईदुनिया और जागरण समूह के समाचार पत्र 'नवदुनिया' भोपाल में वर्षों तक सेवाएं दी। अब इस न्यूज वेबसाइट "Betul Update" का संचालन कर रहा हूं। मुझे उत्कृष्ट पत्रकारिता के लिए प्रतिष्ठित सरोजिनी नायडू पुरस्कार प्राप्त करने का सौभाग्य भी नवदुनिया समाचार पत्र में कार्यरत रहते हुए प्राप्त हो चुका है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button