MP Promotion Rules 2025: मध्यप्रदेश शासन के नए पदोन्नति नियमों को लेकर विवाद गहराता नजर आ रहा है। इन नियमों को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के खिलाफ बताते हुए हाई कोर्ट में चुनौती दी गई है। अब इस मामले में न्यायिक जांच की दिशा तय होने जा रही है, जिस पर हजारों कर्मचारियों की पदोन्नति प्रक्रिया निर्भर मानी जा रही है।
हाई कोर्ट में कब होगी सुनवाई
जबलपुर हाई कोर्ट में एक याचिका के माध्यम से मध्यप्रदेश शासन के पदोन्नति नियम 2025 के दो प्रावधानों को असंवैधानिक बताया गया है। हाई कोर्ट ने इस याचिका को पहले से लंबित समान मामलों के साथ जोड़ते हुए 13 जनवरी को सुनवाई की तारीख तय की है। याचिका सिवनी निवासी ज्वाइंट डायरेक्टर सुरेश कुमरे की ओर से दायर की गई है, जिनकी तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर न्यायालय में पक्ष रखेंगे।
पदोन्नति नियम 11 पर आपत्ति
याचिका में राज्य शासन के पदोन्नति नियम 2025 के रूल 11 को चुनौती दी गई है। इस नियम के अनुसार पदोन्नति के लिए पहले आरक्षित वर्ग के कर्मचारियों की सूची तैयार की जाती है और इसके बाद अनारक्षित वर्ग की सूची बनाई जाती है। याचिकाकर्ता का कहना है कि इस व्यवस्था के कारण अनारक्षित वर्ग में मेरिट के आधार पर योग्य आरक्षित वर्ग के कर्मचारी पदोन्नति से वंचित हो जाते हैं, जो संविधान और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के विपरीत है।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का हवाला
याचिका में सुप्रीम कोर्ट के उस निर्देश का उल्लेख किया गया है, जिसमें कहा गया है कि पदोन्नति के लिए पहले अनारक्षित वर्ग की डीपीसी होनी चाहिए। इस प्रक्रिया में सभी वर्गों के योग्य और मेरिटोरियस कर्मचारियों को अनुभव और योग्यता के आधार पर शामिल किया जाना चाहिए। आरोप है कि मध्यप्रदेश शासन इस व्यवस्था का पालन नहीं कर रहा है।
डीपीसी में अभ्यर्थियों की संख्या का मुद्दा
याचिकाकर्ता ने यह भी बताया कि सुप्रीम कोर्ट के 2018 के निर्देशों के बाद केंद्र सरकार और कुछ अन्य राज्यों में एक पद के लिए पांच गुना अभ्यर्थियों को डीपीसी में शामिल किया जाता है। जबकि मध्यप्रदेश के नियमों में यह संख्या केवल तीन गुना तय की गई है।
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सुप्रीम कोर्ट में भी की थी याचिका दायर
सुरेश कुमरे ने इससे पहले सुप्रीम कोर्ट में भी याचिका दायर की थी, जहां से उन्हें हाई कोर्ट जाने की सलाह दी गई थी। इसके बाद उन्होंने 27 नवंबर 2025 को राज्य सरकार को अभ्यावेदन देकर नियमों में संशोधन की मांग की, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं होने पर हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया।
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