Minimum Wages Order: हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद न्यूनतम वेतन नहीं, लाखों श्रमिकों को एरियर का इंतजार
Minimum Wages Order: अप्रैल 2024 से बढ़ी दरें, मार्च 2025 में कोर्ट का फैसला; फिर भी नहीं मिल रहा संशोधित न्यूनतम वेतन

Minimum Wages Order: मध्य प्रदेश में सरकारी और निजी क्षेत्र के लाखों श्रमिक कर्मचारी अब भी बढ़े हुए न्यूनतम वेतन और एरियर से वंचित हैं। हाईकोर्ट के स्पष्ट आदेश के बाद भी जमीनी स्तर पर अमल नहीं होने से श्रमिकों में नाराजगी बढ़ रही है। श्रम आयुक्त द्वारा बार-बार निर्देश जारी किए जाने के बावजूद स्थिति में सुधार नहीं दिख रहा।
हाईकोर्ट के आदेश पर भी अमल नहीं
मध्य प्रदेश में न्यूनतम वेतन को लेकर लंबे समय से विवाद चला आ रहा था। करीब दस साल बाद अप्रैल 2024 में न्यूनतम वेतन का पुनरीक्षण किया गया। इसके बाद मामला अदालत तक पहुंचा और करीब एक साल चली कानूनी प्रक्रिया के बाद मार्च 2025 में हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। अदालत ने स्पष्ट किया कि अप्रैल 2024 से पुनरीक्षित न्यूनतम वेतन लागू माना जाएगा और कर्मचारियों को उसी आधार पर एरियर का भुगतान किया जाए।
इसके बावजूद प्रदेश के कई जिलों में अब तक इस आदेश को पूरी तरह लागू नहीं किया गया है। बताया जा रहा है कि श्रम आयुक्त कार्यालय की ओर से बीते तीन वर्षों में दर्जन भर से अधिक बार निर्देश जारी किए जा चुके हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर असर सीमित ही रहा है।
श्रम आयुक्त ने फिर भेजा निर्देश
हाल ही में 18 फरवरी को श्रम आयुक्त इंदौर ने सभी जिलों के कलेक्टरों को पत्र लिखकर न्यूनतम वेतन और बकाया राशि का भुगतान सुनिश्चित करने को कहा है। कर्मचारी संगठनों का कहना है कि आदेश जारी होने के बाद भी अधिकांश जगहों पर बढ़ा हुआ वेतन नहीं दिया जा रहा।
क्या है पुराना और नया न्यूनतम वेतन
अप्रैल 2024 से पहले अकुशल श्रमिक को महंगाई भत्ते सहित 10,500 रुपये, अर्द्धकुशल को 11,382 रुपये, कुशल को 12,760 रुपये और उच्च कुशल श्रमिक को 14,060 रुपये मिलते थे। अदालत के आदेश के बाद यह राशि बढ़कर क्रमशः 12,150 रुपये, 13,146 रुपये, 14,869 रुपये और 16,494 रुपये हो गई है। यह बढ़ोतरी अप्रैल 2024 से लागू मानी गई है, इसलिए कर्मचारियों को उस अवधि का एरियर भी मिलना चाहिए।
लाखों रुपये का आर्थिक नुकसान
कर्मचारी नेताओं का कहना है कि पुनरीक्षित वेतन नहीं मिलने से औद्योगिक क्षेत्रों, कोयला खदानों, नगरीय निकायों और विभिन्न सरकारी विभागों में कार्यरत अस्थायी, आउटसोर्स, ठेका और दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों को बड़ा आर्थिक नुकसान हुआ है। यदि आदेश का पालन कर दिया जाए तो प्रत्येक श्रमिक को एक लाख रुपये से अधिक एरियर मिल सकता है। साथ ही मासिक वेतन में दो से चार हजार रुपये तक की बढ़ोतरी संभव है।
निजी और वन विभाग में हालात खराब
कई निजी कारखानों में ठेका श्रमिकों को आज भी केवल 7 से 8 हजार रुपये मासिक दिए जा रहे हैं। नगरीय निकायों में समय पर वेतन नहीं मिलने की शिकायतें आम हैं। वन विभाग में कुछ कर्मचारियों को 4 से 5 हजार रुपये प्रतिमाह पर काम कराया जा रहा है। कोयला उद्योग में भी समान स्थिति बताई जा रही है, जहां उच्च कुशल श्रमिकों को अकुशल श्रेणी के बराबर भुगतान किया जा रहा है।
शॉपिंग मॉल, शोरूम, ऑटोमोबाइल सेक्टर, निजी अस्पताल, स्कूल और पेट्रोल पंप जैसे कई क्षेत्रों में कार्यरत कर्मचारियों को तय न्यूनतम वेतन से कम भुगतान होने की बात सामने आई है। आरोप है कि श्रम विभाग के अधिकारी नियमित निरीक्षण नहीं कर रहे।
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सरकारी विभाग भी पीछे नहीं
स्थिति केवल निजी क्षेत्र तक सीमित नहीं है। सरकारी विभागों में कार्यरत चतुर्थ श्रेणी के अस्थायी और आउटसोर्स कर्मचारियों को भी तय न्यूनतम वेतन नहीं मिल रहा। ग्राम पंचायतों में नल जल चालक, चौकीदार और सफाईकर्मी को 3 से 4 हजार रुपये मासिक दिए जा रहे हैं। स्कूलों और छात्रावासों में अंशकालीन कर्मचारियों से 10 से 12 घंटे काम लेकर 4 से 5 हजार रुपये का भुगतान किया जा रहा है।
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संघर्ष जारी रखने की चेतावनी
कर्मचारी संगठनों का कहना है कि न्यूनतम वेतन पुनरीक्षण के लिए लंबा संघर्ष किया गया था, जिसके बाद अप्रैल 2024 से नई दरें लागू हुईं। वेतन बढ़ने से कर्मचारियों को राहत मिलने की उम्मीद जगी थी, लेकिन जमीनी अमल न होने से निराशा बढ़ी है। संगठन का आरोप है कि कुछ जगहों पर कंपनियों, ठेकेदारों और अधिकारियों की मिलीभगत के कारण लाभ श्रमिकों तक नहीं पहुंच पा रहा। उन्होंने स्पष्ट किया है कि यदि आदेश का पालन नहीं हुआ तो आंदोलन तेज किया जाएगा।
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