Ken-Betwa Link Project: एमपी में बनेगी 218 किलोमीटर लंबी नहर, दर्जनों गांवों में ली जाएगी जमीन, 44 हजार करोड़ होंगे खर्च
Ken-Betwa Link Project: सुरंग मॉडल फेल होने से दो साल की देरी, मार्च 2026 तक भू-अर्जन नहीं हुआ तो प्रक्रिया हो सकती है निरस्त
Ken-Betwa Link Project: मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड की प्यास बुझाने के बड़े सपने के साथ शुरू हुई देश की महत्वाकांक्षी केन-बेतवा लिंक परियोजना इन दिनों नई चुनौतियों से जूझ रही है। बांध निर्माण का काम जहां आगे बढ़ रहा है, वहीं दोनों नदियों को जोड़ने वाली मुख्य लिंक नहर तकनीकी बदलाव और प्रशासनिक ढिलाई के कारण अटक गई है। महंगे प्रयोग के असफल होने से अब विभाग को दोबारा पुराने मॉडल पर लौटना पड़ रहा है।
परियोजना की मौजूदा स्थिति
करीब 44 हजार 605 करोड़ रुपये की लागत से तैयार की जा रही केन-बेतवा लिंक परियोजना का उद्देश्य बुंदेलखंड क्षेत्र में सिंचाई और पेयजल की स्थायी व्यवस्था करना है। परियोजना के तहत बांध निर्माण का काम जारी है, लेकिन लिंक नहर का निर्माण अपेक्षित गति नहीं पकड़ सका है। शुरुआत में नहर के एक बड़े हिस्से को सुरंग के रूप में बनाने का निर्णय लिया गया था, जो अब रद्द कर दिया गया है।
सुरंग मॉडल क्यों हुआ विफल
परियोजना से जुड़े अधिकारियों ने 218 किलोमीटर लंबी लिंक नहर के लगभग 65 किलोमीटर हिस्से को भूमिगत सुरंग के रूप में विकसित करने की योजना बनाई थी। तर्क यह दिया गया था कि इससे भूमि अधिग्रहण कम होगा और पानी के वाष्पीकरण में कमी आएगी। लेकिन, तकनीकी आकलन और लागत के पुनर्मूल्यांकन के बाद यह मॉडल अत्यधिक खर्चीला और जोखिमपूर्ण पाया गया। लंबे विचार-विमर्श के बाद इसे व्यवहारिक नहीं माना गया और योजना को निरस्त कर दिया गया। इस निर्णय में हुई देरी के कारण लिंक नहर का कार्य लगभग दो साल पीछे चला गया।
प्रशासनिक सुस्ती भी बनी वजह
छतरपुर जिले से जुड़ी इस परियोजना का संचालन पन्ना स्थित अधिकारियों के पास है। स्थानीय स्तर पर यह सवाल उठ रहे हैं कि मुख्यालय पर अधिकारियों की नियमित उपस्थिति नहीं होने से फाइलों की प्रक्रिया धीमी पड़ी हुई है। छतरपुर में परियोजना की जिम्मेदारी पन्ना की ईई उमा गुप्ता के पास है। आरोप है कि उनके सीमित दौरे के कारण कई अहम निर्णय समय पर नहीं हो पा रहे हैं। इसका सीधा असर भूमि अधिग्रहण से जुड़ी धारा 19 की कार्रवाई पर पड़ा है।
उत्तर प्रदेश में समय सीमा में हो गया काम
परियोजना के अधिकारियों ने देरी के पीछे अन्य कार्यों का दबाव बताया है। उनका कहना है कि विभाग मार्च 2026 तक आवश्यक प्रक्रियाएं पूरी करने के लिए प्रयासरत है। हालांकि यह सवाल बना हुआ है कि जब उत्तर प्रदेश ने निर्धारित समयसीमा में अपनी तरफ का काम पूरा कर लिया, तो मध्य प्रदेश का हिस्सा अब तक पीछे क्यों है।
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भू-अर्जन की प्रक्रिया ही नहीं बढ़ी आगे
नहर निर्माण के लिए भूमि अधिग्रहण की कानूनी प्रक्रिया भी समयसीमा के दबाव में है। नियमों के अनुसार धारा 11 की प्रारंभिक अधिसूचना जारी होने के एक वर्ष के भीतर धारा 19 की अंतिम घोषणा करना जरूरी है। छतरपुर में धारा 11 जारी हुए करीब दो वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन तकनीकी बदलावों के कारण धारा 19 की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी।
सरकार ने एक वर्ष की अतिरिक्त समय-सीमा दी है, जिसकी अंतिम तिथि मार्च 2026 तय की गई है। यदि इस अवधि में ठोस कार्रवाई शुरू नहीं हुई तो पूरी प्रक्रिया स्वतः निरस्त हो सकती है। ऐसी स्थिति में परियोजना को दोबारा शुरुआती चरण से गुजरना पड़ेगा।
54 गांवों की जमीन पर टिकी उम्मीद
लिंक नहर छतरपुर जिले के 54 गांवों से होकर प्रस्तावित है। इनमें छतरपुर ब्लॉक के 17 गांव, राजनगर ब्लॉक के 11 गांव, महाराजपुर तहसील के 12 गांव, नौगांव ब्लॉक के 7 गांव और सटई तहसील के 5 गांव शामिल हैं। इस परियोजना के लिए कुल 1488.42 हेक्टेयर भूमि की आवश्यकता बताई गई है, जिसमें अधिकांश हिस्सा निजी जमीन का है। पिछले दो वर्षों से किसान अपने खेतों के भविष्य को लेकर असमंजस में हैं। मुआवजे और अधिग्रहण की स्थिति स्पष्ट न होने से ग्रामीणों में चिंता बनी हुई है।
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अब विभाग के सामने यह हैं चुनौतियां
केन-बेतवा लिंक परियोजना बुंदेलखंड के लिए जीवनरेखा मानी जा रही है, लेकिन तकनीकी निर्णयों में बदलाव और प्रशासनिक देरी ने इसकी रफ्तार को प्रभावित किया है। अब विभाग के सामने चुनौती यह है कि वह तय समयसीमा में भूमि अधिग्रहण और नहर निर्माण की प्रक्रिया को गति दे, ताकि परियोजना का मूल उद्देश्य पूरा हो सके। यदि आने वाले महीनों में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह महत्वाकांक्षी योजना और अधिक विलंब का शिकार हो सकती है।
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