Ganesh Puja Tulsi Story: इन दिनों हर तरफ गणेश उत्सव की धूम है। गणेश उत्सव के दिनों में सुबह-शाम पूजा-पाठ का विशेष महत्व होता है। शास्त्रों के अनुसार भगवान गणेश को प्रसन्न करने के लिए उन्हें दूर्वा चढ़ाई जाती है। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और माना जाता है कि दूर्वा से गणपति जल्दी प्रसन्न होते हैं।
लेकिन, इसी पूजा में तुलसी का प्रयोग वर्जित है। जहां भगवान विष्णु की पूजा तुलसी के बिना अधूरी मानी जाती है, वहीं गणेश जी और शिव जी की उपासना में तुलसी का प्रयोग नहीं किया जाता। आखिर ऐसा क्यों है? इसका उत्तर हमें पौराणिक कथाओं में मिलता है।
तुलसी और गणेश जी की कथा (Ganesh Puja Tulsi Story)
पौराणिक मान्यता के अनुसार, तुलसी देवी ने एक समय गणेश जी से विवाह करने की इच्छा प्रकट की। तुलसी चाहती थीं कि गणपति उनके पति बनें, लेकिन गणेश जी ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। उनका तर्क था कि वे ब्रह्मचारी रहना चाहते हैं और विवाह नहीं करेंगे।
गणेश जी के इंकार से तुलसी अत्यंत क्रोधित हो गईं। क्रोधावेश में उन्होंने गणेश जी को शाप दे दिया कि उनका दो विवाह होगा। इस शाप से गणेश जी भी अप्रसन्न हुए और उन्होंने तुलसी को शाप दिया कि तुम्हारा विवाह एक असुर से होगा।
शाप का परिणाम और पश्चाताप (Ganesh Puja Tulsi Story)
गणेश जी के शाप से व्यथित होकर तुलसी ने उनसे क्षमा मांगी। गणेश जी ने शाप को तो वापस नहीं लिया, लेकिन यह आशीर्वाद दिया कि यद्यपि तुम्हारा विवाह असुर से होगा, फिर भी तुम भगवान विष्णु को अति प्रिय रहोगी।
इसी कारण आज भी तुलसी भगवान विष्णु की प्रिय मानी जाती हैं और विष्णु पूजा के बिना तुलसी अधूरी मानी जाती है। वहीं, गणेश जी ने स्पष्ट कर दिया कि उनकी पूजा में तुलसी का प्रयोग वर्जित रहेगा।

शंखचूड़ और तुलसी की कथा (Ganesh Puja Tulsi Story)
पौराणिक कथाओं के अनुसार तुलसी का विवाह शंखचूड़ नामक असुर से हुआ था। शंखचूड़ को यह वरदान मिला था कि जब तक उसकी पत्नी तुलसी का पतिव्रता धर्म अटूट रहेगा, तब तक कोई भी उसे मार नहीं पाएगा।
इस वरदान के कारण शंखचूड़ अत्यंत शक्तिशाली बन गया और उसने देवताओं को परास्त कर स्वर्ग पर कब्जा कर लिया। परेशान देवता भगवान शिव के पास गए और मदद की प्रार्थना की।
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देवताओं की योजना और शंखचूड़ का वध (Ganesh Puja Tulsi Story)
भगवान शिव और विष्णु ने मिलकर एक योजना बनाई। योजना के तहत भगवान विष्णु ने तुलसी का पतिव्रता धर्म भंग कर दिया, जिससे शंखचूड़ का रक्षा कवच नष्ट हो गया। इसके बाद शिव जी ने शंखचूड़ का वध कर दिया।
जब तुलसी को यह पता चला कि उनका पतिव्रता धर्म भंग हो गया है, तो उन्होंने भगवान विष्णु को पत्थर बनने का शाप दिया। विष्णु जी ने यह शाप स्वीकार किया और शालिग्राम रूप में पत्थर के रूप में प्रतिष्ठित हुए।
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तुलसी का महत्व और सीमाएं (Ganesh Puja Tulsi Story)
शालिग्राम और तुलसी का पूजन आज भी एक साथ किया जाता है। यह परंपरा उसी घटना की स्मृति में है। इसके साथ ही, चूंकि तुलसी ने स्वयं को शिव पूजा के लिए वर्जित कर दिया था और गणेश जी को पहले ही शाप दे चुकी थीं, इसलिए गणेश और शिव की पूजा में तुलसी का प्रयोग वर्जित माना जाता है।
दूर्वा और तुलसी का भेद (Ganesh Puja Tulsi Story)
- गणेश जी- दूर्वा चढ़ाना शुभ माना जाता है।
- शिव जी- बेलपत्र अर्पित करना श्रेष्ठ है।
- विष्णु जी- तुलसी के बिना पूजा अधूरी है।
यानी हर देवता के साथ जुड़ी अलग-अलग परंपराएं और नियम हैं, जिन्हें शास्त्रों में विस्तार से बताया गया है।
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आस्था और श्रद्धा का भी बड़ा महत्व (Ganesh Puja Tulsi Story)
गणेश उत्सव के इस समय भक्तों को यह समझना जरूरी है कि पूजा केवल विधि-विधान का पालन भर नहीं है, बल्कि इसमें आस्था और श्रद्धा का भी बड़ा महत्व है। दूर्वा से गणेश जी प्रसन्न होते हैं, जबकि तुलसी का प्रयोग उनकी पूजा में वर्जित है।
कुल मिलाकर पौराणिक कथाओं से हमें यह संदेश मिलता है कि देवताओं से जुड़ी हर परंपरा का एक गहरा धार्मिक और सांस्कृतिक कारण होता है। भक्त यदि सच्चे मन से पूजा करें और इन नियमों का पालन करें तो उनकी भक्ति फलदायी होती है।
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