Free Seed Kit for Farmers: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में एक ऐतिहासिक फैसले को मंजूरी दी गई है। सरकार ने देश में दालों के उत्पादन को बढ़ावा देने और आयात पर निर्भरता कम करने के लिए ‘दलहन आत्मनिर्भरता मिशन’ को स्वीकृति दी है। यह मिशन 2025-26 से 2030-31 तक लागू रहेगा और इसके लिए 11440 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे।
दालों का सबसे बड़ा उपभोक्ता
भारत विश्व का सबसे बड़ा दाल उत्पादक और उपभोक्ता है। दालें भारतीय खानपान का अहम हिस्सा हैं। देश की फसल प्रणाली में भी इनकी विशेष भूमिका है। जैसे-जैसे लोगों की आय और जीवन स्तर बढ़ा है, वैसे-वैसे दालों की खपत में भी तेजी आई है। लेकिन, घरेलू उत्पादन इस मांग के अनुरूप नहीं बढ़ पाया। जिसके चलते हर साल दालों के आयात की जरूरत पड़ती है। दालों का 15 से 20 प्रतिशत हिस्सा विदेशों से बुलाना पड़ता है।
केंद्रीय बजट में की गई थी घोषणा
वित्त वर्ष 2025-26 के केंद्रीय बजट में इस छह वर्षीय मिशन की घोषणा की गई थी। इसका मकसद दालों के उत्पादन को अधिकतम स्तर तक पहुंचाना, किसानों की आय में सुधार करना और आयात पर निर्भरता को घटाना है। इस मिशन के तहत अनुसंधान, बीज उत्पादन, खरीद व्यवस्था और मूल्य स्थिरता जैसी गतिविधियों को शामिल करते हुए व्यापक रणनीति अपनाई जाएगी।

नवीनतम किस्मों पर रहेगा जोर
मिशन में दालों की ऐसी किस्मों को विकसित करने और उन्हें किसानों तक पहुंचाने पर ध्यान दिया जाएगा, जो अधिक उत्पादन देने वाली हों और जलवायु परिवर्तन तथा कीटों के प्रति सहनशील हों। इसके लिए विभिन्न राज्यों में बहु-स्थानीय परीक्षण किए जाएंगे ताकि हर क्षेत्र के अनुकूल किस्मों की पहचान हो सके।
बीज उत्पादन और वितरण की योजना
बीजों की गुणवत्ता और उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए राज्य सरकारें पंचवर्षीय बीज उत्पादन योजनाएं बनाएंगी। आईसीएआर प्रजनक बीजों के उत्पादन की निगरानी करेगा, जबकि आधारभूत और प्रमाणित बीजों का उत्पादन राज्य और केंद्र स्तर की एजेंसियों द्वारा किया जाएगा। बीजों की प्रमाणीकरण व्यवस्था और ट्रैकिंग साथी पोर्टल के माध्यम से होगी।

इतने बीज वितरित करने का लक्ष्य
वर्ष 2030-31 तक लगभग 126 लाख क्विंटल प्रमाणित बीज किसानों को वितरित किए जाएंगे। जिससे करीब 370 लाख हेक्टेयर भूमि को कवर करने का लक्ष्य रखा गया है।
किसानों को मुफ्त बीज किट
दलहन क्षेत्र को बढ़ाने के लिए चावल की कटाई के बाद खाली पड़ी जमीन और अन्य विविधीकरण योग्य भूमि पर फसल लगाने का लक्ष्य रखा गया है। इसके लिए 35 लाख हेक्टेयर अतिरिक्त क्षेत्र को शामिल किया जाएगा। किसानों को प्रोत्साहन देने के लिए 88 लाख बीज किट मुफ्त वितरित किए जाएंगे।
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प्रसंस्करण इकाइयों की भी स्थापना
कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम करने और मूल्य संवर्धन को बढ़ावा देने के लिए मिशन के तहत प्रसंस्करण और पैकेजिंग इकाइयां स्थापित की जाएंगी। इसके लिए 1000 प्रसंस्करण इकाइयों को मदद दी जाएगी और प्रत्येक इकाई पर अधिकतम 25 लाख रुपये तक की सब्सिडी उपलब्ध कराई जाएगी। इससे न केवल किसानों की आय बढ़ेगी बल्कि रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे।
क्षेत्र की विशेषताओं के आधार पर योजना
मिशन क्लस्टर आधारित दृष्टिकोण अपनाएगा, जिसके अंतर्गत हर क्षेत्र की विशेषताओं और जरूरतों के अनुसार योजनाएं बनाई जाएंगी। इससे संसाधनों का बेहतर उपयोग हो सकेगा और उत्पादन क्षमता में सुधार होगा। साथ ही दलहन उत्पादन का भौगोलिक विस्तार भी होगा।
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सरकार करेगी 100 प्रतिशत खरीदी
इस मिशन का एक अहम हिस्सा मूल्य समर्थन योजना है। प्रधानमंत्री आशा योजना के तहत अरहर, उड़द और मसूर जैसी दालों की अधिकतम खरीद सुनिश्चित की जाएगी। नेफेड और एनसीसीएफ अगले चार वर्षों तक राज्यों में किसानों से सीधी खरीद करेंगे। जो किसान इन एजेंसियों से जुड़कर पंजीकरण कराएंगे, उनकी फसल की पूरी खरीद की जाएगी।
इसके साथ ही वैश्विक बाजार में दालों की कीमतों पर नजर रखने के लिए भी एक विशेष व्यवस्था बनाई जाएगी, ताकि किसानों को उचित दाम मिल सके और मूल्य अस्थिरता से बचा जा सके।
इतना उत्पादन करने की प्लानिंग
इस मिशन से उम्मीद की जा रही है कि 2030-31 तक देश में दलहन का क्षेत्रफल बढ़कर 310 लाख हेक्टेयर तक पहुंच जाएगा। उत्पादन 350 लाख टन तक हो सकता है और औसत उपज 1130 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तक बढ़ जाएगी।
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