Faag Geet: आया फागुन… जमने लगी फाग की महफिलें, इस गांव में आज भी होता है परंपरा का निर्वहन
Faag Geet: Aaya Phagun... The gatherings of Faag started, the tradition continues even today in this village

▪️लोकेश वर्मा, मलकापुर (बैतूल)
Faag Geet: हिंदू पंचांग का बारहवां और अंतिम मास फागुन है। यह आनंद का मास है। इसमें गाए जाने वाले गीतों को फाग कहा जाता है। पहले किसान फसल पकने की खुशी में फाग उत्सव का आयोजन करते थे। समय के साथ-साथ होली का त्योहार मनाने का अंदाज भी बदल गया। एक वक्त था जब प्रत्येक गांव में एक होली होती थी। होलिका दहन की रात पूरे गांव के लोग साथ मिलकर नाच-गाकर खुशियां मनाते थे। इसके बाद अगले दिन जमकर रंग-गुलाल उड़ाते थे।
अब ना त्योहारों में उमंग बची है ना उत्साह। अब लोग भी केवल औपचारिकता के तौर पर बिना घर से बाहर निकले सोशल मीडिया पर ही बधाई और शुभकामनाएं देकर त्योहार मना लेते हैं। इसके विपरीत कुछ गांवों में अभी भी अपनी परंपराओं को जीवित रखा गया है। यही वजह है कि त्योहार का उत्साह और उमंग वहां देखते ही बनती है। वहां पूरा गांव का माहौल रोमांच से भर जाता है।

Faag Geet: मध्यप्रदेश के बैतूल जिला मुख्यालय के समीप का ग्राम मलकापुर इन्हीं दुर्लभ गांवों में से एक है। यहां शिवरात्रि पर्व से ही फाग की महफिलें जमने लगती है। फाग गीतों को कॉपियों में संजोकर रखने वाले ग्राम के लोकेश वर्मा बताते हैं कि फाग गाने की परंपरा वर्षों से जारी है। परंपरा को जीवित रखने वाले फाग के सबसे पुराने गायक गिरधारीलाल महतो के सानिध्य में वर्तमान में तीसरी पीढ़ी के युवा फाग के गायन में पारंगत हो चुके हैं। फाग गाते-गाते पूर्वजों की यादें भी ताजा हो जाती है। फाग गीतों में होली खेलने, प्रकृति की सुंदरता, राधा-कृष्ण, शिव-पार्वती और सीता-राम के प्रेम का वर्णन होता है।
गांव में इस परंपरा को जीवित रखने वाले मंडली के मुखिया गिरधारीलाल महतो है। वे बताते हैं कि फाग लोक संस्कृति है जिसके माध्यम से अशिक्षित और अर्धशिक्षित हिंदू समाज के सदस्य भगवान शिव, श्री राम, श्री कृष्ण की आराधना करते थे। हंसी ठिठोली के बीच प्रेम का पर्व रंग-गुलाल के साथ रंग पंचमी तक मनाया जाता हैं। पुराने समय में दिन भर खेतों में मेहनत मजदूरी कर शाम को जब किसान थक हार कर वापस आता था तब फाग की महफिलों की मस्ती उसकी पूरी थकान दूर कर तरोताजा कर देती थी।
ग्राम के फाग प्रेमी अनिरुद्ध पटेल बताते हैं कि पहले होली पर्व अलाव जलाकर उसके आसपास फाग गीतों को गाकर मनाया जाता है। उस समय शराब पर पूरी तरह प्रतिबंध था। भगवान की आराधना के साथ ही मनोरंजन के रूप में नाच गाकर त्योहार मनाया करते थे। गिले-शिकवे दूर करने का माध्यम गुलाल लगाकर गले लगाना होता था। आज टीवी तथा मोबाइल ने विशुद्ध लोक संस्कृति को पीछे धकेल दिया। युवा वर्ग नशे में फिल्मी गाने और डीजे की धुन पर लोक संस्कृति को भूल कर मनोरंजन कर रहा है।

मंडली के मुख्य युवा फाग गायक अखिल वर्मा बताते हैं कि अन्य गांव में भले ही अब फाग के गीत नहीं गूंजते हो पर हमारे गांव में यह परंपरा जारी है और आगे भी रहेगी। मंडली में फाग को अपनी ढोलक की थाप पर निक्की महतो, श्रीकांत वर्मा, नीरज वर्मा, पुष्प मालवी झुलाते है। वहीं लल्ला चौधरी, लतेश वर्मा, प्रेमकांत वर्मा, मनीष परिहार, अर्पित वर्मा मंजिरों की झंकार से झूमने पर मजबूर कर देते हैं।



