Betul News Termite: बेकाम नहीं होता है दीमक, खामोशी से करता है प्रकृति की सेवा, वह न हो तो हो जाएगा वनों का सफाया
Betul News Termite: Termite is not useless, it serves nature silently, if it is not there, the forests will be destroyed
Betul News Termite : दीमक को लेकर कई मुहावरें और लोकोक्तियां हैं, जैसे दीमक लग जाना, दीमक की तरह चट कर जाना आदि। इन्हें पढ़ या सुनकर दीमक के बारे में हमारे मन मस्तिष्क में दीमक की एक नकारात्मक छवि ही बनती है। यही कारण है कि कोई भी नहीं चाहता कि उसके घर के आसपास या खेत में दीमक का घर हो। यही वजह भी है कि इनका तेजी से सफाया होता जा रहा है। यहां तक कि आजकल के बच्चों को तो शायद दीमक के बारे में कोई जानकारी तक नहीं होती है।
दीमक के कार्यों के कारण भले ही उसकी छवि ऐसी बन गई है, लेकिन क्या वास्तव में दीमक किसी काम की नहीं है, उसका कहीं कोई सकारात्मक योगदान नहीं है और यदि इस धरती से दीमक का पूरी तरह सफाया हो जाएगा तो मानव जीवन या प्रकृति पर उसका कोई असर नहीं होगा…? इसे लेकर प्रकृति को बेहद करीब से जानने वाले और बैतूल के पर्यावरणविद मोहन नागर ने फेसबुक पर बेहद रोचक, पठनीय और उपयोगी जानकारी साझा की है। प्रस्तुत है उनके द्वारा दीमक के बारे में दी गई जानकारी…

‘प्रकृति में दीमक की कीमत’ शीर्षक से लिखी गई इस पोस्ट में श्री नागर बताते हैं कि बारिश से बचने के लिए सभी जीव अपने घर व्यवस्थित करते हैं। आज खेत किनारे देखा दीमक भी वर्षा से बचने के लिए अपनी कॉलोनी को बहुमंजिला बना रहे हैं। लेकिन, हमें अपनी तथाकथित जागीर में किसी ओर का घर कहाँ सुहाता है? और वह घर अगर दीमक हो तो लोग उसे तुरन्त लात मारकर गिरा देते हैं। क्योंकि दीमक का नाम सुनते ही सबके मन में एक दुश्मन जीव होने का भाव पैदा होता है।
हर एक को लगता है कि दीमक प्रकृति के लिए एक हानिकारक जीव है। क्योंकि मनुष्य ने स्वयं को ही प्रकृति का सर्वेसर्वा मानकर रखा है। प्रकृति में स्थित उसकी आवश्यकता की चीजों को जिससे नुकसान होता है वह मनुष्य का दुश्मन है। इसी को ध्यान में रखते हुए हमने प्रकृति में रहने वाले जीव जन्तुओ की श्रेणियाँ निर्धारित कर रखी है।
हर जीव का जन्म कोई मनुष्य की आवश्यकता पूर्ति के लिए तो नहीं हुआ। उसका योगदान प्रकृति में अन्य प्रकार से होता है। दीमक भी ऐसा ही जीव है। जिसके बारे में धारणा बना रखी है कि यह हानिकारक है। यहाँ तक कि अनेक प्रकार की लोकोक्तियाँ और मुहावरे भी दीमक के नाम से बने हैं। दीमक लग जाना, दीमक की तरह चट कर जाना आदि।
दीमक भी चीटियों व केंचुए की तरह ही धरती की निरन्तर सेवा में लगा हुआ जीव है। यह हमारे वन क्षेत्र व खेतों के सूखे पेड़ व अपशिष्ट को खाता है। अगर दीमक नहीं हो तो कुछ ही दशकों में जंगल सूखे पेड़ों से भर जायेगा व नया जंगल उगेगा ही नहीं। दीमक के द्वारा मृत पेड़ों का अपघटन और इन पेड़ों के खनिज पोषक तत्वों को मिट्टी में मिलाना है।
अर्थात दीमक ही जंगल में सूखे पेड़ों व अन्य अपशिष्टों को खाकर नष्ट करते हैं और बदले में आर्गनिक कार्बन बनाकर देते हैं जो नई वनस्पति और पेड़-पौधों के लिए संजीवनी का काम करता है। दीमक केंचुए की तरह ही मृत पौधों को खाकर पोषक तत्वों को पारिस्थितिकी तंत्र में वापस भेज देते हैं।
रबी फसल के बाद आज हम आग लगाकर जो फसल अपशिष्ट नष्ट कर रहे हैं, पहले दो-तीन माह में दीमक ही उसे नष्ट कर अगली फसल के लिए पोषक तत्व बना देता था। दीमक जीवहीन चीज खाता है । बीज नहीं खाता, क्योंकि उसमें जीव होता है। अगर दीमक बीज खाता तो वनस्पति की नई पौध तैयार ही नहीं हो पाती।
दूसरा, दीमक को अपना घर बनाने के लिए जमीन खोदना पड़ता है, जिससे एक प्राकृतिक वर्षाजल हार्वेस्टिंग सिस्टम बनता है जो मिट्टी में पानी सोखने की क्षमता बढ़ाता है। इसलिए अब कहीं आपको दीमक का घर (बामी) दिखे तो उसकी तरफ देखने की थोड़ी दृष्टि बदलें। पर हाँ दूर से ही देखें, क्योंकि दीमक के घर में कोई ओर भी कुण्डली मारकर बैठे रहता है। और हाँ, खेती में दीमक नियन्त्रण के लिए पका हुआ गोबर खाद व नीम खाद डालें। सबसे अच्छा हो नीम के पेड़ मेड़ों पर लगा दें।



