शाहपुर के देशी फ्रिज की बिक्री ने फिर पकड़ा जोर : देखने में आकर्षक, पानी भी मिलता बड़ा शीतल, दूर-दूर तक है डिमांड
• नवील वर्मा, शाहपुर
बैतूल जिले के शाहपुर में बनने वाले देशी फ्रिज मतलब मटकों की बिक्री ने एक बार फिर जोर पकड़ लिया है। दो साल से कोरोना संकट के चलते यह कारोबार भी पूरी तरह से ठप पड़ा था। यहां बनने वाले मटके एक ओर देखने में बड़े आकर्षक लगते हैं, वहीं पानी भी बड़ा शीतल देते हैं। यही कारण है कि इन मटकों की दूर-दूर तक डिमांड होती है।
पीढ़ियों से भारतीय घरों में गर्मी में ठंडा पानी प्राप्त करने के लिए मिट्टी के बर्तन यानी घड़े का इस्तेमाल किया जाता रहा है।आज भी बहुत से लोग ऐसे हैं जो इन्हीं मिट्टी से बने बर्तनों का पानी ही पीते हैं। उन्हें मिट्टी की भीनी-भीनी खुशबू बहुत भाती है क्योंकि स्वास्थ्य की दृष्टि से मटके का पानी अच्छा होता है। फ्रिज के ठन्डे पानी की तुलना में इसका सेवन करना लाभदायक होता है।
मटके के पानी एक बड़ा फायदा यह भी है कि यह प्राकृतिक तौर पर ठंडा तो होता ही है साथ ही इससे बिजली की बचत भी होती है। मटके में रखा पानी सही तापमान पर रहता है, ना बहुत अधिक ठंडा ना गर्म. इसलिए घड़े का पानी पीने से शरीर स्वस्थ रहता है।
वैसे तो हर शहर और कई गांवों में भी मटके बनाने का काम होता है, लेकिन इस मामले में शाहपुर के मटकों ने अपनी अलग ही पहचान बनाई है। यहां पर प्रजापति परिवारों द्वारा बनाए जाने वाले मटके ना केवल बेहद आकर्षक होते हैं बल्कि इनसे पानी भी बड़ा ठंडा मिलता है। नेशनल हाईवे पर होने का एक बड़ा लाभ यह मिलता है कि यहां के मटके देश भर में पहुंच जाते हैं। यहां के मटके इस कदर मशहूर हैं कि गर्मी के सीजन में यहां से जो भी गुजरता है वह यहां रुककर मटके जरूर खरीदता है।
यहां की कला की कंगना भी हुई थीं मुरीद
वैसे यहां केवल मटके ही नहीं बनते बल्कि मिट्टी के कई तरह के अन्य खिलौने और अन्य सामग्री भी बनाई जाती है। यह सभी देखने में बड़ी आकर्षक होती हैं। यही वजह है कि हाईवे से गुजरने वाले यहां रुककर इन्हें खरीदने का मोह संवरण नहीं कर पाते। पिछले साल सारनी में जब मशहूर फिल्म अभिनेत्री कंगना रानावत एक फिल्म की शूटिंग करने आई थीं, तो वे भी यहां रुकी थी और कुछ खिलौने उन्होंने खरीदे थे।
इस बार मटकों पर भी महंगाई की मार
अब बात करें शाहपुर में बनने वाले मटकों की तो इस बार महंगाई की मार ने गरीबों का फ्रिज कहलाने वाले मिट्टी के मटके को भी नहीं बख्शा है। जो मटके पहले 40-50 रुपये में आसानी से उपलब्ध हो जाते थे वे अब 100-250 रुपये में मिल रहे हैं। गरीब तबका गला तर करने के लिए भी अब दोगुनी कीमत चुकाने को मजबूर है। हालांकि जब हर चीज के दाम बढ़े हैं तो इनके दाम भी बढ़ना ही है। इसलिए सभी लोग बढ़ी कीमत में भी इनकी खरीदी कर रहे हैं।
दो साल बाद आया कारोबार में उछाल
पिछले दो साल से कोरोना महामारी के कारण मटके का कारोबार मंदा चल रहा था। चैत्र नवरात्रि से मटके बनाने वाले कुम्हार नगर के बाजार में दुकान लगाकर मटके बेचते थे। लेकिन दो सालों से उनकी बिक्री काफी कम हो गई थी। इस बार मटका व्यवसाय अब पुराने रौनक में आ गया है। बाजार में मटकों की बहुत सी दुकानें लगी हुई हैं। मटका व्यवसाई वर्षा प्रजापति और योगेश प्रजापति बताते हैं कि कोरोना काल के बीते दो साल बेहद मुश्किल में गुजरे। अब जाकर मटकों की बिक्री शुरू हुई है। उन दो सालों में खाने तक के लाले पड़ गए थे। अब बिक्री शुरू हो जाने से राहत मिली है। इन दो सालों में हर चीज के दाम बढ़े हैं, इसलिए मटके के दाम भी बढ़े हैं। इसके बावजूद बिक्री अच्छी हो रही है।



