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OMG : शरीर में लोहे की सुई के सहारे पिरोते हैं धागा, फिर भी नहीं होता दर्द का एहसास, इसी हालत में नृत्य कर पूरी करते हैं मन्नत


उत्तम मालवीय, बैतूल
बैतूल जिले के ग्रामीण अंचलों में आज भी परम्पराओं का निर्वहन बड़ी निष्ठा के साथ होता है। इनमें से कई परंपराएं तो ऐसी हैं जिन्हें देखकर ही आम व्यक्ति के रोंगटे खड़े हो जाए, लेकिन इनका निर्वहन करने वाले को दर्द का जरा भी एहसास तक नहीं होता। मन्नत पूरी होने पर अपने शरीर में लोहे की नुकीली सुई से धागे पिरोकर नाचने और बैलगाड़ी खींचने की भी ऐसी ही परंपरा है।

बैतूल जिले के ऐसे कई गाँव हैं जहां लोग मन्नत पूरी होने पर अपने शरीर में लोहे की नुकीली सुई से धागे पिरोकर नाचते हैं। यही नहीं वे बैलगाड़ियां भी खींचते हैं। चैत्र के महीने में होने वाले इस आयोजन को नाड़ा गाड़ा कहा जाता है। शरीर में नाड़े पिरोकर नाचने की ये परम्परा सदियों से चली आ रही है। चिकित्सक इसे सेहत के लिए घातक बताते हैं, लेकिन यह परंपरा बदस्तूर जारी है।

सुई धागे का काम कपड़ों या किसी दूसरी चीज को सिलने के लिए होता है, लेकिन बैतूल में एक ऐसी परम्परा भी है जहां नुकीली सुई का इस्तेमाल इंसानी शरीर में नाड़े पिरोने के लिए किया जाता है। यकीन ना हो तो ये तस्वीरें देखिए जो बैतूल की भैंसदेही तहसील के चिचोलाढाना गाँव की है।

भगत भुमका का वेश बनाए वृद्ध और बच्चे मदमस्त होकर नाच रहे हैं। जबकि उनके शरीर मे लोहे की सुई से नाड़े पिरो दिए गए हैं। उस आयोजन को नाड़ा गाड़ा कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि बीमारियों से निजात पाने के लिए लोग देवी से मन्नत मांगते हैं और जब मन्नत पूरी हो जाती है तो देवी का आभार जताने के लिए अपने शरीर मे नाड़े पिरोकर नाचते हैं।

हर साल चैत्र महीने में होने वाले इस आयोजन में मन्नत पूरी होने की खुशी में कई ग्रामीण खुशी खुशी अपने शरीर मे नाड़े पिरोते हैं। सूती धागों को गूथकर नाड़े तैयार किये जाते हैं जिन पर मक्खन का लेप चढ़ाया जाता है। इन नादौन को एक लोहे की मोटी सुई की मदद से शरीर के दोनों तरफ चमड़ी में पिरो दिया जाता है और उस जगह भी मक्खन का लेप लगाया जाता है। इसके बाद इन नाड़ों को दो छोर पर लोग पकड़कर खड़े होते हैं और भगत बना शख्स नाड़ों के बीच नृत्य करता है । इस दौरान ये नाड़े शरीर का अंदर ही रहते हैं। कुछ ग्रामीण लगातार तो कुछ दो चार साल तक अपने शरीर में नाड़े पिरोने का काम करते हैं।

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शरीर में नाड़े पिरोने का नज़ारा देखने वालों के रोंगटे खड़े कर देता है। लेकिन जिनके शरीर में नाड़े पिरोए जाते हैं वो टस से  मस नहीं होते। मन्नत पूरी होने पर देवी को सम्मान देना ही उनका मकसद रहता है। जिसके लिए शरीर नाड़े पिरोना वो शुभ मानते हैं। बैतूल जिले के आठनेर, मुलताई, आमला और भैंसदेही तहसीलों के दर्जनों गांवों में ये आयोजन होते हैं।

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शरीर मे नाड़े पिरोने की वजह से इस आयोजन के नाम में नाड़ा शब्द जुड़ा है जबकि गाड़ा शब्द बैलगाड़ी का प्रतीक है। कुछ लोग शरीर में नाड़े पिरोकर मन्नत पूरी करते हैं तो वहीं दूसरे आयोजन गाड़ा में कई बैलगाड़ियों को एक लकीर में बांध दिया जाता है और फिर इन बैलगाड़ियों को बैलों की मदद से नहीं बल्कि खुद ग्रामीण बैल बनकर खींचते हैं। इस तरह से ये आयोजन नाड़ा गाड़ा कहलाता है। हालांकि चिकित्सकों का कहना है कि शरीर में लोहे की सुई से नाड़े पिरोना गंभीर इंफेक्शन को न्यौता देने जैसा है।

उत्तम मालवीय

मैं इस न्यूज वेबसाइट का ऑनर और एडिटर हूं। वर्ष 2001 से पत्रकारिता में सक्रिय हूं। सागर यूनिवर्सिटी से एमजेसी (मास्टर ऑफ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री प्राप्त की है। नवभारत भोपाल से अपने करियर की शुरुआत करने के बाद दैनिक जागरण भोपाल, राज एक्सप्रेस भोपाल, नईदुनिया और जागरण समूह के समाचार पत्र 'नवदुनिया' भोपाल में वर्षों तक सेवाएं दी। अब इस न्यूज वेबसाइट "Betul Update" का संचालन कर रहा हूं। मुझे उत्कृष्ट पत्रकारिता के लिए प्रतिष्ठित सरोजिनी नायडू पुरस्कार प्राप्त करने का सौभाग्य भी नवदुनिया समाचार पत्र में कार्यरत रहते हुए प्राप्त हो चुका है।

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