दो साल बाद जमकर गाई फाग और उड़ाया गुलाल, इस गांव में नई पीढ़ी बखूबी निभा रही है पूर्वजों की परंपरा
होली का नाम आते ही बरबस ही उल्लास, रंग और फागों की झलक तैर जाती है। विडंबना है कि संस्कृति की बानगी प्रस्तुत करने वाले होली गीतों के रंग फीके पड़ते जा रहे हैं। शहर में डेढ़ दशक पहले फाग गाने की परंपरा थी, जो अब खत्म होती आ गई है। कुछ ग्रामों में हालांकि यह अभी भी बरकरार है।
जानकार बताते हैं कि इनकी जगह फिल्मी गीतों ने ले ली है। हालांकि जो आनंद फाग गाने में आता था उसका कोई मुकाबला नहीं। नई पीढ़ी उस आनंद को कभी नहीं जान पाएगी। वर्तमान परिदृश्य में न तो फाग (विशेष रूप से फाल्गुन मास में गाया जाने वाला राग) गाया जाता है और न ही फगुआ (धुरेण्डी, रंग और अबीर के साथ मनाया जाने वाला व्यवहारपूर्ण त्योहार) मनाया जाता है।
आधुनिकता की आँधी ऐसी बही कि न अब कोई फाग राग गाने वाला रहा, न ही फगुआ खेलने वाला। फगुआ खेलना क्या? लोग कहना भी नहीं चाहते हैं… चाहे भी क्यों? कहीं उनके अत्याधुनिक, व्यापक लोकाकर्षण और तथाकथित सभ्य होने पर रंग-बिरंगी धब्बे लग गए तो?

हालाँकि होली भी काफ़ी प्राचीन व प्रचलित शब्द है। लेकिन पूर्व में हमारे समाज में बड़े हिस्सों में होली शब्द बहुत कम प्रचलित था। लोग फगुआ ही बोलते थे और इस शब्द के उच्चारण मात्र से ही तन-मन दोनों रंग के उमंग से तरंगित हो उठता था। आज भी गांव में उन बुजुर्गों के चेहरे पर यह उमंग व तरंग देखने को मिलता है, जो होली नहीं होरी फगुआ बोलते हैं।
फागुन रागात्मक अर्थात प्रेममय और प्रीतिवर्धक त्योहार है। लेकिन लोगों के बदलते व्यवहार, कमजोर पड़ती रिश्तों की कड़ी, बढ़ता आपसी विवाद और वैमनस्यता, मद्यपान, अश्लीलता व फूहड़पन, हुड़दंग आदि रागात्मकता को लगभग समाप्त कर दिया है। नतीजतन यह सामाजिक त्योहार अब समाज के बजाय परिवार तक सीमित होता जा रहा है। मौज-मस्ती का त्योहार खाने-पीने में सिमट कर रह गया है।

फाग गाने की ऐसी परंपरा जिला मुख्यालय के समीप ग्राम मलकापुर में जीवंत है। लिंबाजी बाबा भजन मंडल की तीसरी पीढ़ी के युवा गिरधारीलाल महतो के नेतृत्व में अब इस परंपरा को निभा रही है। फागुन के महीने भर यहां ढोलक, मंजीरे और झांझ पर फाग गाई जाती है और धुरेंडी पर ग्राम में फाग जुलूस निकालता है।
भजन मंडली में लल्ला चौधरी, दीपक महतो, श्रीकांत वर्मा, नितेश महतो, अखिल वर्मा, लतेश वर्मा, पुनीत मालवी, प्रेमकांत वर्मा, मनीष परिहार, लोकेश वर्मा, पप्पू मालवी, अर्पित वर्मा, संदीप पवार, प्रीत वर्मा, सजल महतो, आयुष मालवी, गोलू हजारे आदि शामिल है।
ग्रामीणों ने बताया कि कोरोना के चलते पिछली 2 होली बेरंग ही रही। लेकिन इस साल पूरे उत्साह से पूरे ग्रामवासियों ने जमकर होली मनाई। युवाओं की टोली ने जहाँ जमकर फाग गाए वहीं युवाओं सहित बुजुर्गों और महिलाओं-बच्चों ने भी खूब रंग-गुलाल उड़ाया। होली की रौनक इस बार पूरे क्षेत्र में देखते ही बन रही थी।



