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Sweet Potato Farming Profit: चार महीने में ही चमक गई किस्मत, पांढुर्णा के किसान ने शकरकंद से कमा लिए लाखों रुपये

Sweet Potato Farming Profit: सिर्फ 10-15 हजार की लागत, 5-6 टन उत्पादन; 120 दिन में तैयार फसल से किसानों को बड़ा फायदा

Sweet Potato Farming Profit: चार महीने में ही चमक गई किस्मत, पांढुर्णा के किसान ने शकरकंद से कमा लिए लाखों रुपये
Sweet Potato Farming Profit: चार महीने में ही चमक गई किस्मत, पांढुर्णा के किसान ने शकरकंद से कमा लिए लाखों रुपये

Sweet Potato Farming Profit: अक्सर किसानों को मेहनत के बाद भी अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता, लेकिन सही फसल और आधुनिक सोच खेती की तस्वीर बदल सकती है। पांढुर्णा जिले के एक किसान ने पारंपरिक फसलों की जगह सफेद शकरकंद उगाकर महज चार महीनों में उल्लेखनीय कमाई कर दिखाई है।

नकदी फसल ने बढ़ाई आमदनी

पांढुर्णा जिले के खैरीपैका गांव के किसान योगराज तुकाराम डोंगरे ने पारंपरिक खेती से अलग रास्ता अपनाया। उन्होंने एक एकड़ जमीन में सफेद शकरकंद की खेती की और इसे नकदी फसल के रूप में चुना। चार महीने की अवधि में उन्हें लगभग 1 लाख 20 हजार रुपये की आय हुई। उनकी इस पहल ने आसपास के किसानों का ध्यान भी आकर्षित किया है।

कम लागत में बेहतर उत्पादन

किसान युवराज डोंगरे के अनुसार एक एकड़ में शकरकंद लगाने का खर्च करीब 10 से 15 हजार रुपये आता है। इस लागत में बीज, मजदूरी और सामान्य देखभाल शामिल है। उत्पादन की बात करें तो एक एकड़ से 5 से 6 टन तक उपज मिल जाती है। बाजार में अच्छी कीमत मिलने पर कुल आमदनी 1 लाख से 1 लाख 20 हजार रुपये तक पहुंच जाती है। उनका कहना है कि कम खर्च में ज्यादा लाभ देने वाली यह फसल किसानों के लिए फायदे का सौदा है।

कम पानी और कम खाद में होती तैयार

कृषि उपसंचालक जितेंद्र सिंह बताते हैं कि शकरकंद की फसल 120 से 130 दिनों में तैयार हो जाती है। जब पौधों की पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं, तब खुदाई का समय समझा जाता है। इस फसल को ज्यादा पानी की जरूरत नहीं होती और उर्वरकों का उपयोग भी सीमित मात्रा में किया जाता है। विशेष निगरानी या देखभाल की भी अधिक आवश्यकता नहीं पड़ती। सर्दियों के मौसम में बाजार में शकरकंद की मांग बढ़ जाती है, जिससे किसानों को अच्छे दाम मिलते हैं।

क्षेत्र में बढ़ रहा है खेती का रकबा

शकरकंद की खेती अब केवल एक गांव तक सीमित नहीं रही। खैरीपैका के साथ खापा और मालेगांव में भी इसका रकबा बढ़ा है। करीब 250 से 300 किसान लगभग 200 हेक्टेयर क्षेत्र में इसकी खेती कर रहे हैं। खास बात यह है कि अधिकतर किसान जैविक तरीके से उत्पादन कर रहे हैं और रासायनिक खाद का उपयोग बहुत कम कर रहे हैं। इससे उपज की गुणवत्ता बेहतर बनी रहती है और स्वास्थ्य के लिहाज से भी यह लाभकारी मानी जाती है।

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उत्तम मालवीय

मैं इस न्यूज वेबसाइट का ऑनर और एडिटर हूं। वर्ष 2001 से पत्रकारिता में सक्रिय हूं। सागर यूनिवर्सिटी से एमजेसी (मास्टर ऑफ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री प्राप्त की है। नवभारत भोपाल से अपने करियर की शुरुआत करने के बाद दैनिक जागरण भोपाल, राज एक्सप्रेस भोपाल, नईदुनिया और जागरण समूह के समाचार पत्र 'नवदुनिया' भोपाल में वर्षों तक सेवाएं दी। अब इस न्यूज वेबसाइट "Betul Update" का संचालन कर रहा हूं। मुझे उत्कृष्ट पत्रकारिता के लिए प्रतिष्ठित सरोजिनी नायडू पुरस्कार प्राप्त करने का सौभाग्य भी नवदुनिया समाचार पत्र में कार्यरत रहते हुए प्राप्त हो चुका है।

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