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Fish Farming Success Story: आईटी इंजीनियर से सफल मत्स्य उद्यमी बनीं भवनी झा, बंजर जमीन पर खड़ा किया लाखों का कारोबार

Fish Farming Success Story: कॉरपोरेट नौकरी छोड़ी, गांव में खरीदी पथरीली जमीन और आधुनिक तकनीक से बनीं सफल मत्स्य उद्यमी

Fish Farming Success Story: आईटी इंजीनियर से सफल मत्स्य उद्यमी बनीं भवनी झा, बंजर जमीन पर खड़ा किया लाखों का कारोबार
Fish Farming Success Story: आईटी इंजीनियर से सफल मत्स्य उद्यमी बनीं भवनी झा, बंजर जमीन पर खड़ा किया लाखों का कारोबार

Fish Farming Success Story: कई बार जिंदगी में लिया गया एक साहसिक फैसला इंसान की पूरी पहचान बदल देता है। जबलपुर की भवनी झा की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। मल्टीनेशनल कंपनी की सुरक्षित नौकरी, शहर की सुविधाएं और तयशुदा करियर छोड़कर उन्होंने ऐसा रास्ता चुना, जिसे आमतौर पर महिलाएं अपनाने से हिचकती हैं। बिना किसी पारिवारिक पृष्ठभूमि और अनुभव के भवनी ने मछली पालन शुरू किया और आज वे हर साल लाखों रुपये की मछली बेचकर न सिर्फ आत्मनिर्भर बनी हैं, बल्कि कई परिवारों को रोजगार भी दे रही हैं।

इंजीनियरिंग की पढ़ाई और कॉरपोरेट नौकरी

भवनी झा के माता पिता दोनों सरकारी सेवाओं में अच्छे पदों पर कार्यरत रहे हैं। पढ़ाई लिखाई के लिए परिवार ने उन्हें हमेशा प्रोत्साहित किया। भवनी ने वर्ष 2007 में जबलपुर के इंजीनियरिंग कॉलेज से इनफॉरमेशन टेक्नोलॉजी में इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की। पढ़ाई पूरी होते ही उन्हें हैदराबाद में एक मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी का अवसर मिला। दो साल तक उन्होंने वहां काम किया। इसी दौरान उनका विवाह कौस्तुभ से हो चुका था और दोनों की जिंदगी एक तय ढर्रे पर चल रही थी।

नौकरी छोड़कर लिया पहला बड़ा जोखिम

हालांकि कुछ समय बाद भवनी और उनके पति को महसूस हुआ कि कॉरपोरेट नौकरी उन्हें संतुष्टि नहीं दे पा रही है। दोनों ने मिलकर बड़ा फैसला लिया और हैदराबाद की नौकरी छोड़कर जबलपुर लौट आए। यहां उन्होंने एक कोचिंग सेंटर शुरू किया। शुरुआती दौर में इस कोचिंग क्लास ने अच्छी पहचान बनाई और कई छात्रों को पढ़ाने का मौका मिला। इस दौरान परिवार आर्थिक रूप से स्थिर हो गया। समय के साथ भवनी और कौस्तुभ के तीन बच्चे भी हो गए और जिम्मेदारियां बढ़ती चली गईं।

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कोरोना काल में बदल गई जीवन की दिशा

सब कुछ ठीक चल रहा था कि तभी कोरोना महामारी ने दस्तक दी। लॉकडाउन के चलते कोचिंग सेंटर बंद करना पड़ा। इस कठिन समय में दोनों ने फिर से अपने भविष्य को लेकर सोचना शुरू किया। कौस्तुभ ने एक निजी मेडिकल कॉलेज में नौकरी ज्वाइन कर ली, जबकि भवनी ने तय किया कि वे खुद का कोई ऐसा व्यवसाय शुरू करेंगी, जो लंबे समय तक चल सके। उन्होंने तय किया कि यह काम फूड सेक्टर से जुड़ा होना चाहिए, ताकि बाजार की मांग बनी रहे।

कई विकल्पों के बाद चुना सबसे कठिन रास्ता

भवनी ने मशरूम उत्पादन, बकरी पालन, मुर्गी पालन और मत्स्य पालन जैसे विकल्पों पर विचार किया। इन सभी क्षेत्रों के बारे में उन्होंने बुनियादी जानकारी और ट्रेनिंग भी ली। इन विकल्पों में से उन्होंने मछली पालन को चुना, जो सबसे कठिन माना जाता है। शुरुआत में उनके पति भी इस फैसले को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं थे, लेकिन भवनी अपने निर्णय पर अडिग रहीं।

बिना अनुभव के गांव में खरीदी जमीन

भवनी के परिवार में पहले कभी किसी ने मछली पालन जैसा काम नहीं किया था। उनके माता पिता दोनों नौकरीपेशा थे और खेती या पशुपालन से कोई नाता नहीं था। इसके बावजूद भवनी ने अपने जीवन की सबसे बड़ी जोखिम उठाई। उन्होंने अपनी पूरी जमा पूंजी लगाकर जबलपुर से करीब 15 किलोमीटर दूर हिनोतिया गांव में लगभग 4.5 एकड़ जमीन खरीदी। यह जमीन पथरीली थी और मछली पालन के लिहाज से बिल्कुल उपयुक्त नहीं मानी जाती थी।

पहली असफलता से नहीं मानी हार

जमीन खरीदने के बाद भवनी ने पहला तालाब खुदवाया। उन्हें लगा कि तालाब बनते ही पानी भर जाएगा और मछली पालन शुरू हो जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। कुछ ही दिनों में तालाब का सारा पानी जमीन में समा गया। वजह थी वहां की मुरम और रेतीली मिट्टी, जिसमें पानी टिकता नहीं था। इस असफलता के बावजूद भवनी ने पीछे हटने का फैसला नहीं किया, क्योंकि वे अपनी पूंजी और करियर दोनों इस काम में लगा चुकी थीं।

ट्रेनिंग लेकर बदली तस्वीर

भवनी ने तय किया कि वे इस काम को पूरी समझ के साथ करेंगी। इसके लिए उन्होंने भुवनेश्वर स्थित केंद्रीय मीठा जल जलीय संस्थान और मुंबई के केंद्रीय मत्स्य संस्थान से शॉर्ट टर्म कोर्स किए। इसके साथ ही जबलपुर के मत्स्य पालन विभाग से तकनीकी सहयोग लिया। सरकारी योजनाओं के तहत उन्हें कुछ अनुदान भी मिला, जिससे आगे बढ़ने में मदद मिली।

आधुनिक तकनीक से मिली सफलता

ट्रेनिंग के दौरान भवनी को मछली पालन की आधुनिक तकनीक के बारे में जानकारी मिली। उन्होंने तालाब में एचडीपीई लाइनर शीट बिछाने की तकनीक अपनाई, जिससे पानी रिसने की समस्या खत्म हो गई। इस तरीके से उन्होंने पेंगासस प्रजाति की मछली का पालन शुरू किया। यह तकनीक थोड़ी महंगी थी, जिसमें प्रति वर्ग मीटर लगभग सौ रुपये का खर्च आया, लेकिन इससे मछली पालन सफलतापूर्वक हो सका।

हर साल 20 से 30 टन मछली का उत्पादन

भवनी ने शुरुआत एक ही तालाब से की और धीरे धीरे काम बढ़ाया। छत्तीसगढ़ से मछली का बीज मंगाया गया और रेडीमेड दाने का इस्तेमाल किया गया, ताकि तालाब में पानी की गुणवत्ता बनी रहे। आज उनके पास कुल छह तालाब हैं। इन तालाबों से वे हर साल करीब 20 से 30 टन मछली बेच रही हैं। मछलियां थोक में मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के व्यापारियों को बेची जाती हैं, जहां उन्हें करीब 120 रुपये प्रति किलो तक का भाव मिल जाता है।

सही फैसले पर नहीं कोई पछतावा

तीन बच्चों की मां होने के बावजूद भवनी अपने फार्म और परिवार दोनों को समय दे पा रही हैं। उनका फार्म शहर से कुछ दूरी पर है, लेकिन वे काम को पूरी जिम्मेदारी से संभाल रही हैं। आज उनके व्यवसाय से एक दर्जन से ज्यादा परिवारों को रोजगार मिला है। भवनी का मानना है कि मल्टीनेशनल कंपनी की नौकरी छोड़ने का फैसला बिल्कुल सही था। उनकी कहानी यह साबित करती है कि अगर हिम्मत और सीखने की इच्छा हो, तो बंजर जमीन पर भी सफलता की फसल उगाई जा सकती है।

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उत्तम मालवीय

मैं इस न्यूज वेबसाइट का ऑनर और एडिटर हूं। वर्ष 2001 से पत्रकारिता में सक्रिय हूं। सागर यूनिवर्सिटी से एमजेसी (मास्टर ऑफ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री प्राप्त की है। नवभारत भोपाल से अपने करियर की शुरुआत करने के बाद दैनिक जागरण भोपाल, राज एक्सप्रेस भोपाल, नईदुनिया और जागरण समूह के समाचार पत्र 'नवदुनिया' भोपाल में वर्षों तक सेवाएं दी। अब इस न्यूज वेबसाइट "Betul Update" का संचालन कर रहा हूं। मुझे उत्कृष्ट पत्रकारिता के लिए प्रतिष्ठित सरोजिनी नायडू पुरस्कार प्राप्त करने का सौभाग्य भी नवदुनिया समाचार पत्र में कार्यरत रहते हुए प्राप्त हो चुका है।

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