Aeroponic Potato Farming: अब हवा में उगेगा आलू! एरोपोनिक तकनीक से बदलेगी खेती, किसानों को मिलेगा 50 गुना फायदा
Aeroponic Potato Farming: ग्वालियर कृषि विश्वविद्यालय का बड़ा प्रयोग सफल, रोगमुक्त बीज और रिकॉर्ड उत्पादन से किसानों की आय बढ़ेगी

Aeroponic Potato Farming: खेती अब सिर्फ मिट्टी और पानी तक सीमित नहीं रही। विज्ञान और शोध ने कृषि को ऐसे मुकाम पर पहुंचा दिया है, जहां हवा में भी फसल उगाई जा सकती है। मध्य प्रदेश के ग्वालियर स्थित राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय ने दो साल पहले जिस नई तकनीक पर काम शुरू किया था, वह अब सफल नतीजों के साथ सामने आई है। एरोपोनिक तकनीक के जरिए वैज्ञानिकों ने हवा में आलू उगाकर ऐसे बीज तैयार किए हैं, जो पूरी तरह रोगमुक्त हैं और जिनकी उत्पादकता सामान्य बीजों की तुलना में कई गुना अधिक है। यह तकनीक आने वाले समय में किसानों की आय बढ़ाने और खेती की दिशा बदलने की क्षमता रखती है।
ग्वालियर कृषि विश्वविद्यालय की अनोखी पहल
देश में कृषि अनुसंधान के क्षेत्र में लगातार नए प्रयोग किए जा रहे हैं। किसानों की लागत कम हो और उन्हें आधुनिक तकनीक का लाभ मिले, इसी उद्देश्य से राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय ने एरोपोनिक तकनीक पर काम शुरू किया। विश्वविद्यालय परिसर में स्थापित एरोपोनिक्स यूनिट में बिना मिट्टी के, केवल हवा और पोषक तत्वों की मदद से आलू के पौधे तैयार किए जा रहे हैं। यह प्रयोग न केवल सफल रहा है, बल्कि इसके परिणाम उम्मीद से कहीं बेहतर सामने आए हैं।
क्या है एरोपोनिक तकनीक
एरोपोनिक तकनीक खेती की वह आधुनिक विधि है, जिसमें पौधों को मिट्टी में नहीं उगाया जाता। इसमें पौधों की जड़ों को हवा में रखा जाता है और समय-समय पर फॉगिंग सिस्टम के जरिए उन्हें आवश्यक पोषक तत्व दिए जाते हैं। इस तकनीक में पानी की खपत भी कम होती है और पौधों को नियंत्रित वातावरण में बढ़ने का मौका मिलता है। यही वजह है कि इस विधि से उगाए गए पौधे अधिक स्वस्थ और रोगमुक्त होते हैं।
लैब से शुरू होती है प्रक्रिया
एरोपोनिक तकनीक में आलू के बीज सीधे खेत से नहीं आते। सबसे पहले टिशू कल्चर के माध्यम से प्रयोगशाला में पौधे तैयार किए जाते हैं। इन पौधों को एरोपोनिक यूनिट में लगाने से पहले लगभग एक महीने तक हार्डनिंग प्रक्रिया से गुजारा जाता है, ताकि वे बाहरी वातावरण के अनुकूल हो सकें। इसके बाद इन्हें यूनिट में ट्रांसप्लांट किया जाता है, जहां हवा में ही इनके विकास की पूरी प्रक्रिया होती है।
रोगमुक्त और उच्च गुणवत्ता वाले बीज
एरोपोनिक यूनिट में तैयार होने वाले आलू के बीज को मिनी ट्यूबर कहा जाता है। इनका वजन केवल 2 से 3 ग्राम के बीच होता है। फॉगिंग सिस्टम के जरिए जब पौधों को संतुलित मात्रा में पोषक तत्व मिलते हैं, तो बीज की गुणवत्ता काफी बेहतर होती है। सबसे बड़ी बात यह है कि ये बीज पूरी तरह रोग और वायरस से मुक्त होते हैं। सामान्य खेती में वायरस और बीमारियों का असर फसल पर पड़ता है, लेकिन एरोपोनिक तकनीक में तैयार बीजों में यह समस्या नहीं होती।
उत्पादन में होगी रिकॉर्ड बढ़ोतरी
इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत इसकी उत्पादकता है। विश्वविद्यालय में किए गए प्रयोग के दौरान देखा गया कि एक किलो एरोपोनिक बीज से लगभग 400 किलो तक आलू की फसल प्राप्त की जा सकती है। यही नहीं, बीज उत्पादन के स्तर पर देखा जाए तो एरोपोनिक तकनीक से सामान्य बीजों की तुलना में करीब 50 गुना अधिक उत्पादन संभव है। यही कारण है कि इसे खेती के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव माना जा रहा है।
तीन चरणों में किसानों तक पहुंचता है बीज
एरोपोनिक तकनीक से तैयार बीज सीधे किसानों को नहीं दिए जाते। इसके लिए तीन चरणों की प्रक्रिया अपनाई जाती है। पहला चरण जी-जीरो कहलाता है, जिसमें टिशू कल्चर से लैब में बीज तैयार किया जाता है। इसके बाद एरोपोनिक यूनिट में मिनी ट्यूबर विकसित किए जाते हैं। दूसरा चरण जी-1 होता है, जिसमें इन मिनी ट्यूबर को नेट हाउस या विशेष ग्रीन हाउस में लगाया जाता है। तीसरे और अंतिम चरण जी-2 में इन बीजों को विश्वविद्यालय के खेतों में बोया जाता है, जहां मिट्टी आधारित बीज तैयार होते हैं। यही बीज बाद में किसानों को उपलब्ध कराए जाते हैं।
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किसानों को मिलेंगे कई किस्मों के विकल्प
इस शोध का एक बड़ा फायदा यह भी है कि किसानों के पास अब अधिक विकल्प होंगे। विश्वविद्यालय में आलू की करीब 20 किस्मों के मिनी ट्यूबर तैयार किए जा रहे हैं। इनमें अलग-अलग उपयोग के लिए अलग किस्में शामिल हैं। जैसे फ्रेंच फ्राई बनाने के लिए फ्राइओम किस्म और चिप्स के लिए चिपसोना आलू। इससे किसान अपनी जरूरत और बाजार की मांग के अनुसार फसल का चयन कर सकेंगे।
पोषक तत्वों की पूरी व्यवस्था
एरोपोनिक यूनिट में पौधों को पोषक तत्व देने के लिए विशेष व्यवस्था की गई है। यहां दो अलग-अलग टैंक बनाए गए हैं, जिनमें माइक्रो न्यूट्रिएंट्स घोले जाते हैं। इनका इलेक्ट्रिक कंडक्टिविटी स्तर लगातार नियंत्रित किया जाता है। बड़े पाइप और आधुनिक फॉगिंग सिस्टम के जरिए पौधों तक पोषक तत्व पहुंचाए जाते हैं। कंट्रोल पैनल से यह तय किया जाता है कि कितनी देर और कितनी मात्रा में फॉग दिया जाएगा। आमतौर पर 30 सेकंड तक फॉगिंग कर पौधों की जरूरत पूरी की जाती है।
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व्यवसायिक अवसर भी थोक में मिलेंगे
एरोपोनिक तकनीक सिर्फ शोध तक सीमित नहीं है। यह किसानों के लिए एक व्यवसायिक विकल्प भी बन सकती है। एक एरोपोनिक यूनिट तैयार करने में करीब 70 से 75 लाख रुपये का खर्च आता है। एक बार यूनिट स्थापित होने के बाद इसे 5 से 7 साल तक उपयोग में लाया जा सकता है। इस दौरान केवल सामान्य रिपेयर और मेंटेनेंस की जरूरत होती है। किसान खुद उच्च गुणवत्ता के बीज तैयार कर सकते हैं और उन्हें बाजार में बेचकर अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं। पंजाब और हिमाचल प्रदेश के कुछ किसान पहले से ही इस तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं।
भविष्य में किसानों को मिलेगा लाभ
कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि फिलहाल तैयार बीजों की मात्रा सीमित है, लेकिन आने वाले दो वर्षों में बड़ी संख्या में अलग-अलग किस्मों के बीज उपलब्ध होंगे। इससे किसानों को बेहतर गुणवत्ता के बीज मिलेंगे, उत्पादन बढ़ेगा और उनकी आय में भी सुधार होगा। एरोपोनिक तकनीक आने वाले समय में खेती के क्षेत्र में एक नया अध्याय लिखने की पूरी क्षमता रखती है।
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