GBS in Madhya Pradesh: मध्यप्रदेश के कई जिलों से सामने आए गुइलेन-बैरे सिंड्रोम (GBS) के मामलों ने स्वास्थ्य महकमे की चिंता बढ़ा दी है। अलग-अलग इलाकों से गंभीर लक्षणों वाले मरीज इंदौर के अस्पतालों में पहुंच रहे हैं। हालात की गंभीरता को देखते हुए केंद्र और राज्य सरकार की संयुक्त टीम ने मौके पर पहुंचकर जांच शुरू कर दी है।
इन जिलों में सामने आए जीबीएस के मामले
प्रदेश के मनासा, नीमच, बैतूल, खण्डवा, धार और हातोद क्षेत्रों से गुइलेन-बैरे सिंड्रोम से पीड़ित मरीजों की पुष्टि हुई है। इन सभी मरीजों को बेहतर इलाज के लिए इंदौर के शासकीय और निजी अस्पतालों में भर्ती कराया गया है। वर्तमान स्थिति में इंदौर में कुल 11 मरीजों का उपचार चल रहा है। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार इनमें कुछ मरीजों की हालत सामान्य है, जबकि दो बच्चों की स्थिति बेहद गंभीर बनी हुई है।
इंदौर के अस्पतालों में इलाज की स्थिति
इलाज से जुड़े अधिकारियों के अनुसार चाचा नेहरू अस्पताल में भर्ती दो बच्चों को वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखा गया है। इनकी हालत लगातार डॉक्टरों की निगरानी में है। अस्पताल की पीडियाट्रिक यूनिट में चार मरीजों का इलाज जारी है। इसके अलावा एमवाय अस्पताल में छह मरीज भर्ती हैं, जबकि एक मरीज का उपचार बांबे अस्पताल में किया जा रहा है। सभी अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम चौबीसों घंटे मरीजों की स्थिति पर नजर बनाए हुए है।
केंद्र और राज्य सरकार की जॉइंट टीम सक्रिय
जीबीएस के बढ़ते मामलों को गंभीरता से लेते हुए राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र और मध्यप्रदेश सरकार की संयुक्त टीम इंदौर पहुंची है। इस टीम में दिल्ली से डॉ. अवधेश कुमार, कोलकाता से डॉ. नंदिता दास और डॉ. गौतम चौधरी के साथ भोपाल से राज्य सर्विलांस अधिकारी डॉ. अश्विन भागवत शामिल हैं। विशेषज्ञों ने अस्पतालों में जाकर मरीजों से जुड़ी जानकारी जुटाई और उनकी स्वास्थ्य स्थिति का जायजा लिया। साथ ही आवश्यक जांच के लिए सैंपल भी एकत्र किए गए हैं।
प्राथमिक जांच के बाद नीमच पहुंची टीम
इंदौर में प्रारंभिक निरीक्षण और आवश्यक प्रक्रिया पूरी करने के बाद विशेषज्ञों की टीम नीमच के लिए रवाना हो गई है। यह टीम देश के अलग-अलग हिस्सों में किसी बीमारी के मामलों में अचानक बढ़ोतरी होने पर वहां पहुंचकर कारणों की पड़ताल करती है। इससे पहले भी इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में दूषित पानी से फैली बीमारियों की जांच के लिए यही टीम वहां पहुंच चुकी है।
आखिर क्या है गुइलेन-बैरे सिंड्रोम
विशेषज्ञ डॉक्टरों के अनुसार गुइलेन-बैरे सिंड्रोम एक दुर्लभ लेकिन गंभीर न्यूरोलॉजिकल बीमारी है। इसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली गलती से खुद की नसों पर हमला करने लगती है। इसके कारण नसों में सूजन आ जाती है और शरीर में कमजोरी बढ़ने लगती है। बीमारी की शुरुआत आमतौर पर पैरों से होती है और धीरे-धीरे शरीर के ऊपरी हिस्सों की ओर बढ़ती है।
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क्यों माना जाता है जीबीएस को खतरनाक
डॉक्टरों का कहना है कि जब यह बीमारी आगे बढ़कर फेफड़ों तक पहुंच जाती है, तो मरीज को सांस लेने में दिक्कत होने लगती है। ऐसे मामलों में मरीज को वेंटिलेटर की जरूरत पड़ सकती है। इसी कारण जीबीएस को गंभीर बीमारी माना जाता है और इसमें समय पर इलाज बेहद जरूरी होता है।
समय पर इलाज से बच सकती है जान
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार जीबीएस के शुरुआती लक्षण दिखाई देते ही मरीज को बिना देरी किए अस्पताल ले जाना चाहिए। इस बीमारी का इलाज महंगा होता है, क्योंकि इसमें मरीज के वजन के अनुसार विशेष इंजेक्शन लगाए जाते हैं। हालांकि समय रहते इलाज शुरू हो जाए तो मरीज की जान बचाई जा सकती है और स्थिति को संभाला जा सकता है।
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जीबीएस के यह हैं सामान्य लक्षण
इस बीमारी में पैरों में झनझनाहट या सुन्नपन महसूस होना शुरू हो सकता है। चलने में कमजोरी या संतुलन बिगड़ने की समस्या आती है। हाथ-पैरों में दर्द या ऐंठन हो सकती है। कई मरीजों को अचानक अत्यधिक थकान महसूस होती है। कुछ मामलों में चेहरे की मांसपेशियां कमजोर पड़ने लगती हैं, जिससे बोलने या आंखें खोलने में परेशानी हो सकती है। स्वास्थ्य विभाग ने लोगों से सतर्क रहने और किसी भी संदिग्ध लक्षण पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करने की अपील की है।
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