Crop Disease Management Betul: खेतों में पहुंचे अफसर, फसलों पर मिला रोगों का डेरा, बताए बचाव के उपाय
Crop Disease Management Betul: मध्यप्रदेश के बैतूल जिले के मुलताई विकासखंड में शनिवार को कृषि विभाग और कृषि विज्ञान केंद्र बैतूल बाजार की संयुक्त टीम ने किसानों के खेतों का दौरा किया। फसलों की वर्तमान स्थिति, रोग और कीट प्रकोप की जानकारी लेना तथा किसानों को सही समय पर आवश्यक सलाह देना, इस दौरे का उद्देश्य था। इस दौरान खेतों में जाकर वैज्ञानिकों और कृषि अधिकारियों ने सोयाबीन, मक्का, अरहर, धान और मूंगफली जैसी प्रमुख फसलों की स्थिति देखी और प्रबंधन उपाय बताए।
निरीक्षण में यह अधिकारी शामिल
दल में कृषि विज्ञान केंद्र के पौध संरक्षण वैज्ञानिक आरडी बारपेटे, उप संचालक कृषि डॉ. आनंद कुमार बड़ोनिया, सहायक संचालक कृषि सुरेंद्र कुमार परहाते, वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी घनश्याम घिघोडे, फसल बीमा प्रतिनिधि सचिन झाड़े और दीपांशु हरोड़े शामिल रहे।
इन सभी अधिकारियों ने ग्राम परमंडल और ग्राम बाडेगांव के किसानों के खेतों का निरीक्षण किया। जिन किसानों के खेतों में दौरा किया गया, उनमें भारत चौहान, किशोरी झाड़े, तिलकचंद्र बोरबन और राजेश चौरे प्रमुख रहे।

सोयाबीन की फसल की यह स्थिति
निरीक्षण में पाया गया कि सोयाबीन की फसल अतिवृष्टि की वजह से कई समस्याओं का सामना कर रही है। खेतों में जड़ सड़न, तना सड़न और अन्य फफूंदजनित रोग पाए गए। इसके अलावा तना मक्खी के प्रकोप से पौधों की पत्तियां पीली पड़ रही थीं। अच्छी बात यह रही कि पीला मोजेक रोग का असर बहुत ही कम देखा गया।
वैज्ञानिक आरडी बारपेटे ने किसानों को समझाया कि पीला मोजेक रोग मुख्य रूप से सफेद मक्खी से फैलता है। यदि पौधों में शुरुआती अवस्था में लक्षण दिखाई दें तो उन्हें तुरंत उखाड़कर खेत से बाहर फेंक देना चाहिए। सफेद मक्खी की रोकथाम के लिए थायोमिथोक्सम+लेम्डा सायहेलोथ्रिन या बीटासायफ्लुथ्रिन+इमिडाक्लोप्रिड दवा का छिड़काव करने की सलाह दी गई।
इसके साथ ही सेमीलूपर की रोकथाम के लिए स्पायनेटोरम का प्रयोग करने पर जोर दिया गया। वैज्ञानिकों ने यह भी बताया कि सोयाबीन में कुछ किस्में जल्दी पक जाती हैं और उनमें पत्ते पीले हो जाते हैं। इसे रोग समझने की बजाय परिपक्वता का संकेत मानना चाहिए।
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मक्का की फसल में कीट और रोग
दल ने मक्का की फसल का भी विस्तृत निरीक्षण किया। खेतों में फॉल आर्मी वर्म के कारण पत्तियों और तनों में छिद्र देखे गए। साथ ही जीवाणुजन्य बेक्टीरियल स्टॉक रॉट और फफूंदजन्य शीथ ब्लाइट रोग का भी प्रकोप पाया गया। विशेषज्ञों ने बताया कि आने वाले दिनों में इनका असर और बढ़ सकता है।
वैज्ञानिकों ने कहा कि नत्रजनयुक्त उर्वरक का असंतुलित प्रयोग इन रोगों को बढ़ावा देता है। इसलिए यूरिया का प्रयोग तुरंत रोकने की सलाह दी गई। फॉल आर्मी वर्म की रोकथाम के लिए इमामेक्टिन बेंजोएट या फ्लूबेंडामाइड का छिड़काव करने को कहा गया। वहीं बेक्टीरियल स्टॉक रॉट पर नियंत्रण के लिए कॉपर ऑक्सीक्लोराइड, स्ट्रेप्टोसाइक्लीन या एग्रीमाइसिन मिश्रण का उपयोग करने का सुझाव दिया गया।

अरहर की फसल के यह मिले हालात
दलहनी फसलों में अरहर में फफूंदजन्य झुलसा रोग की शुरुआती स्थिति देखी गई। इस रोग में पौधे अचानक मुरझा जाते हैं और फसल नष्ट हो जाती है। किसानों को इस समस्या पर तुरंत ध्यान देने की सलाह दी गई।
धान की फसल पर भी की चर्चा
धान की फसल में दल ने लीफ ब्लाइट रोग और अन्य कीटों का प्रकोप देखा। लीफ ब्लाइट में पत्तियां पीली होकर सूखने लगती हैं, जो फसल की हैडिंग अवस्था में अधिक दिखाई देती है। इसके नियंत्रण के लिए स्ट्रेप्टोमाइसिन सल्फेट और टेट्रासाइक्लिन मिश्रण का प्रयोग करने की सलाह दी गई।
धान में तना छेदक, पत्ती लपेटक, गंधी बग, फुदका और भूरा भृंग जैसे कीट आमतौर पर भारी नुकसान पहुंचाते हैं। तना छेदक पौधों को खोखला कर देता है, जिससे बालियां सफेद हो जाती हैं और दाने नहीं बन पाते। इसके प्रबंधन के लिए क्लोरेंट्रानिलिप्रोल के छिड़काव की सलाह दी गई।
पत्ती लपेटक पत्तियों को लपेटकर खाता है, जिससे सफेद धारियां और सुखे पत्ते दिखाई देते हैं। गंधी बग दानों का दूध चूस लेते हैं, जिससे दाने अपूर्ण रह जाते हैं। इसके नियंत्रण के लिए कार्टैप हाइड्रोक्लोराइड और बुप्रोफेजिन मिश्रण का उपयोग करने की बात कही गई। धान का फुदका भी तनों और पत्तियों का रस चूसकर पौधों को कमजोर कर देता है। इसके लिए भी वही दवा कारगर बताई गई।
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मूंगफली की फसल में टिक्का रोग
निरीक्षण के दौरान मूंगफली में कॉलर रॉट और टिक्का रोग के लक्षण भी देखे गए। कॉलर रॉट नियंत्रण के लिए टेब्यूकोनाजोल के छिड़काव की सिफारिश की गई। वहीं टिक्का रोग, जिसमें पत्तियों पर भूरे-काले धब्बे बनते हैं, के लिए कार्बेंडाजिम और मैन्कोजेब मिश्रण के छिड़काव की जानकारी दी गई।
वैज्ञानिकों ने किसानों को दी यह सलाह
दल ने किसानों को यह स्पष्ट रूप से कहा कि किसी भी कीटनाशक या दवा का उपयोग करने से पहले कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि अधिकारियों से सलाह अवश्य लें। अनियंत्रित और असंतुलित उपयोग फसलों को नुकसान पहुंचा सकता है।
फसल बीमा योजना की भी दी जानकारी
किसानों को फसल बीमा योजना की जानकारी भी दी गई। अतिवृष्टि या अन्य कारणों से फसल क्षति होने पर किसान 14447 नंबर पर कॉल करके नुकसान की सूचना दर्ज कर सकते हैं। इससे फसल क्षति का आकलन किया जाएगा और समय पर मुआवजा मिल सकेगा।
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