Crop disease: गेरूआ रोग के यह हैं लक्षण, फसलों को बचाने के लिए उठाएं यह कदम

Crop disease: गेरूआ रोग के यह हैं लक्षण, फसलों को बचाने के लिए उठाएं यह कदम

Crop disease: खेती-किसानी आज भी भारत में एक जुआ ही है। आज भी भारत में कृषि तकनीक इतनी विकसित नहीं हो सकी है कि बुआई से लेकर कटाई तक फसल को पूरी तरह से सुरक्षित रखा जा सके। अभी भी यह स्थिति है कि प्राकृतिक आपदा-विपदा तो दूर बीमारियों से भी फसलें पूरी तरह सुरक्षित नहीं हो पाई हैं।

यही वजह है कि फसलों को एक ओर जहां प्राकृतिक आपदा-विपदा अतिवृष्टि, अवर्षा, ओलावृष्टि, पाला आदि के कारण तो नुकसान होता ही है, कई बीमारियां भी लगातार घेरती रहती है। इसके चलते किसान मौसम के मिजाज के अलावा फसलों को होने वाली बीमारियों को लेकर भी चिंतित रहते हैं।

हर सीजन में होती है बीमारियां (Crop disease)

उनकी यह चिंता वाजिब भी है। कारण यही है कि हर सीजन में कोई न कोई फसल किसी न किसी बीमारी का शिकार होती है। कई बार समय पर कदम उठा लिए जाने पर यह बीमारियां नियंत्रित हो जाती है तो कई बार पूरा खेत ही साफ कर देती है। कई बार तो ऐसी गंभीर बीमारियां फसलों को घेर लेती है कि कितने भी जतन किए जाएं, कोई असर नहीं होता। इससे किसानों की कमर ही टूट जाती है।

केविके ने जारी की एडवायजरी

इन दिनों बैतूल जिले सहित प्रदेश के अनेक स्थानों पर गेहूं की फसल में गेरुआ रोग का संक्रमण देखा जा रहा है। इसे देखते हुए कृषि विज्ञान केन्द्र बैतूल द्वारा फसल इस फसल को गेरुआ रोग से बचाने के संबंध में एडवाजयरी जारी की गई है। इस एडवायजरी में इस रोग के लक्षण बचाने के साथ ही बचाव के पर्याप्त उपाय भी सुझाए गए हैं।

इस कारण होता है यह रोग (Crop disease)

कृषि वैज्ञानिक द्वारा बताया गया कि इस रोग का प्रकोप अधिक नत्रजनयुक्त उर्वरक एवं अतिरिक्त सिंचाई के कारण रोगग्राही प्रजातियों में होता है। यह रोग होने पर पत्तियों पर उभरे हुए फफोलेनुमान धब्बे बनते हैं। इन धब्बों से जंगनुमा पाउडर निकलता है। आरंभिक अवस्था में पत्तियां पीली दिखती है, गंभीर संक्रमण होने पर पत्तियां सूखने लगती हैं। रोग का संक्रमण होने पर यदि यूरिया का प्रयोग हो तो रोग का फैलाव और तेजी से होता है।

फसल को बचाने यह करें

गेरुआ रोग होने पर प्रभावित फसल पर यूरिया का प्रयोग स्थगित करें एवं प्रोपिकोनेजोल फफूंदनाशी या जिनेब (जेड-78) 2 ग्राम प्रति लीटर पानी का छिड़काव करें। ये फफूंदनाशक उपलब्ध न होने पर कार्बनडेजिम एवं मेंकोजेब 2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी का छिड़काव करें। अधिक जानकारी के लिए कृषि वैज्ञानिक या कृषि अधिकारियों से संपर्क किया जा सकता है।

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