Daughters Day 2022: संघर्ष और हौसले की मिसाल बेटियों को बैतूल ने दिया मणिकर्णिका खिताब; टी स्टाल या ऑटो चलाकर बनी सहारा, किसी ने किया एवरेस्ट फतह

Manikarnika

Daughters Day 2022: मध्यप्रदेश के बैतूल में डाटर्स डे पर नेत्र चिकित्सक डॉ. वसंत श्रीवास्तव एवं एडव्होकेट नीरजा श्रीवास्तव की सुपुत्री स्व. नेहा अभिषेक श्रीवास्तव की स्मृति में बैतूल सांस्कृतिक सेवा समिति द्वारा मणिकर्णिका सम्मान समारोह का गरिमामय आयोजन किया गया। वर्ष-2022 के मणिकर्णिका सम्मान के लिए विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट कार्य करने वाली 27 बालिकाओं एवं महिलाओं को चुना गया। रामकृष्ण बगिया में कार्यक्रम का आयोजन किया गया। समारोह में जलपुरुष के नाम से प्रसिद्ध समाजसेवी एवं भारत भारती आवासीय विद्यालय के सचिव मोहन नागर, आरडी पब्लिक स्कूल की संचालक ऋतु खण्डेलवाल, समाजसेवी राजकुमार बोथरा, डॉ. वसंत श्रीवास्तव, एडव्होकेट नीरजा श्रीवास्तव, जन अभियान परिषद की जिला समन्वयक प्रिया चौधरी द्वारा सम्मान प्रदान किए गए।

कार्यक्रम में मप्र की प्रथम पर्वतारोही मेघा परमार, भावना डेहरिया, मोटीवेशनल स्पीकर पूनम श्रोती, मप्र ब्लाइंड महिला क्रिकेट टीम की कप्तान निकिता कनाठे, उपकप्तान रवीना यादव एवं खिलाड़ी दीपशिखा महाजन, स्कूटी वाली मेडम अरुणा महाले, खगोलीय जानकार एवं सीएम राईज स्कूल की प्राचार्य साधना हैंड, चाईल्ड लाईन काउंसलर चारुलता वर्मा, डांस इंडिया डांस सूपर मॉम साधना मिश्रा, म्यूजिशियन एवं सिंगर नुपूर मौर्य, ज्योतिषी, टेरो रीडर अंकशास्त्री, क्रिस्टल हीलर एवं कोलंबों विश्वविद्यालय से मेडिकल ज्योतिषी में पीएचडी स्वर्ण पदक विजेता आरजू जैन, प्रथम महिला रेस्टोरेंट व्यवसायी साधना सिन्हा, टी स्टॉल संचालक शाहपुर निशि राठौर, प्रथम महिला ऑटो चालक मीरा पंवार, बाल कल्याण समिति की पूर्व सदस्य एवं समाजसेवी रश्मि साहू, काउंसलर एवं समाजसेवी जमुना पंडाग्रे, एसडीओपी सृष्टि भार्गव, कोतवाली टीआई अपाला सिंह, आरआई मनोरमा बघेल, चिचोली थाना प्रभारी तरन्नुम खान, एसडीएम रीता डेहरिया, महिला रोग विशेषज्ञ डॉ भारती सरियाम, लोक कलाकार प्रीति कृष्णकुमार वर्मा,  ब्रेल लिपि की जानकार शिक्षिका लीला सोनी, प्रिया सलामे नेशनल प्लेयर कराते एवं वंशिका बुंदेले नेशनल प्लेयर परम्परागत लाठी एवं कुश्ती को मणिकर्णिका सम्मान एवं स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया।

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आयोजक मंडल डॉ वंसत श्रीवास्तव, एड नीरजा श्रीवास्तव, समाजसेवी राजेश आहूजा, धीरज बोथरा, अतुल गोठी, विवेक मालवीय, जिला पंचायत सदस्य शैलेन्द्र कुंभारे, नेशनल यूथ अवार्डी मनीष दीक्षित एवं बैतूल सांस्कृतिक सेवा समिति की अध्यक्ष गौरी पदम सहित सभी पदाधिकारियों एवं सदस्यों का कार्यक्रम की सफलता में सहयोग रहा।

बैतूल को गौरवान्वित करने वाला कार्यक्रम

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए डॉ वसंत श्रीवास्तव ने कहा कि डाटर्स डे बेटियों का दिन होता है, लेकिन मेरा मानना है कि हर दिन बेटियों का दिन है। मेरी बड़ी बेटी नेहा अभिषेक श्रीवास्तव की स्मृति में मणिकर्णिका सम्मान समारोह का आयोजन किया गया है। एक साल पहले कांतिशिवा में आयोजन हुआ था तब नौ वर्ष की नातिन जिसने कुछ महीनों पहले ही अपनी मां को खो दिया था। उसने मंच पर स्वस्फूर्त लाईन कही थी, मेरी मां हमेशा मेरे साथ है और हमेशा रहेगी। मैं आज यह लाईन दोहरा रहा हूं कि मेरी बिटिया है और हमेशा रहेगी। उन्होंने मणिकर्णिका समारोह से जुड़ी हर कड़ी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की।

समाजसेवी मोहन नागर ने कहा कि मणिकर्णिका बैतूल जिले को गौरवान्वित करने वाला आयोजन है। स्व नेहा श्रीवास्तव की स्मृति में किया जा रहा यह आयोजन बेटियों की प्रतिभा को मंच प्रदान कर रहा है। उन्होंने बैतूल जिले की बेटियों के लिए भी कहा कि छोटे से जिले की बेटियां अब देश और दुनियां में नाम रोशन कर रही है। इस तरह के आयोजन प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करते है।

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आरडीपीएस स्कूल की डायरेक्टर रितु खण्डेलवाल ने कहा कि हम सभी में एक मणिकर्णिका छुपी है उसे बाहर लाने की जरुरत है। एजुकेशन का एक पहलु व्यक्तित्व का विकास, विरोधाभास के बाद भी चुनौतियों के बाद भी नहीं टूटना, हमारी सारी मणिकर्णिकाएं जिन्होंने शारीरिक-सामाजिक चुनौतियों को झेला। इन सबके प्रयासों के सामने हम नतमस्तक है। डीआईडी सुपर मॉम साधना मिश्रा ने कहा कि हर व्यक्ति के जीवन में संघर्ष होना ही चाहिए। इस अवसर पर शहर के गणमान्य नगारिक समाजसेवी परमजीत सिंह बगगा, राजकुमार अग्रवाल, प्रमोद अग्रवाल, धीरज हिराणी, डॉ विनय सिंह चौहान, राकेश मौर्य, सुनील पलेरिया, मीरा एंथोनी, प्रभा वागद्रे, डैनी सावन कुमार, पूर्व सैनिक संघ के सभी पदाधिकारी, बंटी वर्मा, आशीष राठौर एवं सदस्यों सहित सौ से अधिक मूकबधीर बच्चे मौजूद थे। इन बच्चों ने साईन लेगवेज के माध्यम से पूरा कार्यक्रम समझा। इस दौरान हाल ही में सिक्किम में लिंगडम एवं नाथूला बार्डर पर सेना के साथ रक्षाबंधन मनाने वाले दल का भी सम्मान किया गया।

प्रेरक मणिकर्णिकाओं ने कही आपबीती

बेटी दिवस की शुभकामनाएं देते हुए देश की सौ सुपर वुमन में शामिल पूनम श्रोती ने कहा कि जो भी कहानियां यहां बैठी बेटियां सुन रही है, ये कहानी आज के लिए नहीं होनी चाहिए। हमने कहानी सुनी, हम प्रभावित हुए और भूल गए। इन कहानियों को अपने अंदर समेटकर रखों और आगे बढऩे के लिए खुद को प्रेरित करो। बचपन से मैं ऐसी बीमारी से पीडि़त हूं जिसमे जरा से धक्के से मेरी हड्डी टूट जाती है। आज जितनी मेरी उम्र है उससे कहीं गुना बार मैं फेक्चर और ऑपरेशन देख चुकी हूं। मेरी शरीर का कोई पार्ट ऐसा नहीं है जहां रॉड नहीं है, हर हड्डी सपोर्ट से जुडी है। इसके बावजूद मैंने और मेरे पेरेन्ट्स ने कभी हार नहीं मानी। मैने अपनी पढ़ाई पूरी की नार्मल बच्चे की तरह। आज मैं अपने जैसे बच्चों के लिए काम कर रही हूँ। मेरा मानना है कि सिर्फ मिसाल कायम करनेसे कुछ नहीं होता। मिसाल कायम रखने के लिए हमें और मिसाले बनानी पड़ेगी। जहां लोग सोचते हैं कि बेटी बोझ है उन्होंने अपनी ऐसी बेटी को मिसाल बनाया जिसका जीवन एक कांच की गुडिय़ा की तरह है इसलिए बेटी दिवस की मेरी शुभकामनाएं अपने पेरेट्स के लिए सबसे पहले है।

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बस 700 मीटर छूट गया था एवरेस्ट

जब माऊटेन पर जब गलेशियर मूवमेंट करता है तो कई सारी डेड बॉडी दिखाई देती है। कई बार उनके बगल से क्रॉस करना होता है। एवरेस्ट पर पहुंचना आसान नहीं है। जिद, जूनून और जज्बा सब चाहिए होता है। मेघा परमार ने अपने एवरेस्ट फतह के अनुभव बताते हुए कहा उन्होंने 2018 में भी समिट किया था लेकिन वह एवरेस्ट नहीं पहुंच पाई थी। एवरेस्ट मात्र 700 मीटर दूर रह गया था। मैने बहुत मुश्किल से पैसे जुटाए थे। यह मेरे लिए ठीक वैसा ही था जैसे यूपीएससी में आप पाइंट वन नंबर से पीछे रह जाते है। मुझे उस वक्त सीख दी गई कि जीवन रहा तो पहाड़ तो हम धीरे-धीरे चढ़ लेगें। सबसे महत्वपूर्ण होती है जिदंगी। जब मंै वापस आई तो अखबारों में छप गया था कि मैंने एवरेस्ट फतह कर लिया, लेकिन मैंने सच को स्वीकार किया और अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर लिख दिया था कि मैं एवरेस्ट नहीं जीत पाई। लोगों ने आलोचना भी की। मैने अपनी कमिया दूर की और दोबारा एवरेस्ट समिट किया और एवरेस्ट फतह किया।

मेरे जीवन में दो एवरेस्ट थे एक माउंट एवरेस्ट, दूसरा संघर्ष का एवरेस्ट- भावना

एवरेस्ट की सोच कैसे आई यह सवाल अक्सर सामने आता है। कक्षा सातवी में जब बछेन्द्री पाल के बारे में पढ़ा मैंने पढ़ा कि वह वह देश की पहली महिला थी जिन्होंने एवरेस्ट फतह किया। तब मैने अपने टीचर से कहा कि मुझे भी एवरेस्ट चढऩा है मैं भी पर्वतारोही बनना चाहती हू। तब उन्होंने हंसकर कहा कि एवरेस्ट हर किसी के बस की बात नहीं है, बहुत कठिनाई आती है। सच में एवरेस्ट अपने आप में एक चैलेंज है। मैंने ठान लिया था इसलिए मैंने कक्षा सातवी में ही अपना लक्ष्य तक किया। मैं अपना लक्ष्य कभी नहीं भूली। भावना डेहरिया ने एवरेस्ट फतह के अपने यह अनुभव मणिकर्णिका सम्मान समारोह में साझा किए।

उन्होंने कहा कि उनकी लाईफ में दो एवरेस्ट थे, संघर्ष का एवरेस्ट और माउंट एवरेस्ट, संघर्ष का एवरेट माऊंट एवरेस्ट से भी अधिक कठिन था। व्यक्ति कुछ अचीव करता है उसके पीछे संघर्ष होता है। मप्र के सबसे डीप पाइंट जहां एजुकेशन भी नहीं था, उस टाईम पर मै समाज को, गांव वालों को समझाना मुश्किल था पर माता-पिता को भरोसा था कि एक उनकी बेटी उनका नाम रोशन करेगी। मेरा मजाक भी उड़ाया गया कि पातालकोट की लडक़ी एवरेस्ट चढ़ेगी। अगर आपने सोच लिया तो और आप प्रयास करते रहे तो जीत आपकी होगी।

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