श्री बांके बिहारी मंदिर : ज्यादा देर निहारा तो साथ चले जाते हैं बांके बिहारी, इसलिए बीच-बीच में डाल दिया जाता है पर्दा

Shri Banke Bihari Temple: If you look for a long time, then Banke Bihari go together, so the curtain is put in between

• लोकेश वर्मा (यायावर : Betul update)
भारत की प्रसिद्ध धार्मिक नगरी वृन्दावन (Vrindavan), मथुरा (उत्तर प्रदेश) में स्थित बांके बिहारी मंदिर (Banke Bihari Temple) अत्यंत सुन्दर और भव्य है। यहां श्री कृष्ण और श्री राधा रानी (Shri Krishna and Shri Radha Rani) विग्रह रूप (grace form) में सदैव उपस्थित हैं। यह मंदिर भारत के प्राचीन मंदिरों में से एक है, जिसका निर्माण स्वामी हरिदास जी (Swami Haridas Ji) द्वारा करवाया गया था। श्रीधाम वृन्दावन की पवित्र भूमि में बड़ी दूर-दूर से लोग बांके बिहारी जी के दर्शन के लिए आते हैं। इनके दर्शन सौभाग्य से प्राप्त होते हैं। कहते हैं इस पावन भूमि में आने मात्र से ही मनुष्य के पाप कट जाते हैं।

मंदिर का इतिहास

पहले बिहारी जी की मूर्ति निधिवन के समीप ही स्थापित की गयी थी। किन्तु, बाद में इसे इसके वर्तमान स्थान पर स्थापित किया गया। वृन्दावन बांके बिहारी लाल के आधुनिक मंदिर की स्थापना लगभग 200 वर्ष पूर्व हुई थी। इस मंदिर के निर्माण के पीछे भी एक दिलचस्प कथा प्रचलित है। कहा जाता है कि एक बार बांके बिहारी जी के दर्शन करने भरतपुर के राजा अपनी रानी के साथ वृन्दावन पधारे।

रानी अत्यंत सुन्दर थी। जब उन्होंने बांके बिहारी जी की आँखों में देखा तो बिहारी जी उनके सौंदर्य पर मोहित हो गए और एक गोप का रूप धारण कर उनके साथ भरतपुर चले गए। जब मंदिर के पुजारियों ने देखा की बिहारी जी अपने स्थान पर नहीं हैं तब वे समझ गए कि बिहारी जी भरतपुर जा चुके हैं।

पुजारियों ने भरतपुर जाकर बिहारी जी को बहुत मनाया। तब जाकर वे वापस आने के लिए तैयार हुए। उन्हें राजा और रानी दोनों ही वृन्दावन छोड़ने के लिए आये। तब राजा ने कहा की वे यहां पर बांके बिहारी का भव्य मंदिर बनवाना चाहते हैं। यह कार्य उन्होंने अपने पुत्र रतनसिंह को सौंप दिया। राजकुमार ने वृन्दावन में ही रह कर इसके भव्य मंदिर का निर्माण करवाया। और इसका कार्य 1865 ईसवी में पूरा हुआ था।

बांके बिहारी मंदिर की पौराणिक कथा

श्री हरिदास जी वैष्णव समाज के थे। वे एक प्रसिद्द संगीतकार भी थे और उनके सभी भजन केवल श्री कृष्ण जी को ही समर्पित थे। हरिदास जी का जन्म सन 1535 में भाद्रपद में शुक्ल पक्ष की अष्टमी को वृन्दावन के ही निकट गाँव में हुआ था। इनके पिता श्री गंगाधर जी एवं माता श्रीमती चित्रा देवी थीं। हरिदास जी ने स्वामी आशुधीर जी के सानिध्य में शिक्षा ग्रहण की थी।

उन्हीं से युगल मन्त्र की दीक्षा ली। दीक्षा लेने के पश्चात् वे यमुना के समीप ही एकांतवास में चले गए तथा वहीं ध्यानमग्न रहने लगे। इनका मन बाल्यावस्था से ही संसार से विरक्त था। युवावस्था आते आते वे और अधिक भक्ति में लीन होने लगे। वे कभी-कभी प्रभु भक्ति में लीन होकर ऐसे भजन गाते कि उनकी आँखों से प्रेम के अश्रु बहने लगते। कहा जाता है कि उनके मधुर भजन सुनकर तथा उनके मन के शुद्ध भावों को देखकर श्री कृष्ण तथा राधारानी ने उन्हें दर्शन भी दिए।

वे चाहते थे कि बिहारी जी सदैव उनके पास ही रहे। इसलिए बिहारी जी तथा राधारानी एक विग्रह के रूप में प्रकट हुए। तथा हरिदास जी को स्वप्नादेश दिया की उनके विग्रह को भूमि से बहार निकालो तथा उसकी सेवा करो। यही विग्रह बांके बिहारी नाम से जगत प्रसिद्ध हुआ। चूँकि मूर्ति को मार्गशीर्ष के शुक्ल पक्ष की पंचमी के दिन निकाला गया था, इसलिए इस दिन को प्रत्येक वर्ष प्राकट्य दिवस के रूप में मनाते हैं।

स्वामी हरिदास जी प्रसिद्द गायक तानसेन और बैजू बावरा के गुरु भी थे। यह सभी जानते हैं कि तानसेन अपने समय के कितने अच्छे गायक थे। एक बार अकबर ने तानसेन को विश्व का सबसे अच्छा गायक घोषित कर दिया। किन्तु तानसेन ने अपने गुरु की गायकी के विषय में बताया जो किसी के दरबार की शोभा नहीं बढ़ाती थी, केवल बांके बिहारी जी को समर्पित थी।

स्वामी हरिदास जी के विषय में सुनकर अकबर भी उनसे मिलने को उतावले हो गए। तानसेन उन्हें स्वामी जी के पास ले गए। किन्तु, वे जानते थे स्वामी जी अपने मन से गाते हैं। किसी को सुनाने के लिए नहीं। इसलिए एक दिन तानसेन एक राग का रियाज करने लगे और जानबूझ कर राग के सुर गलत लगा दिए। गलत सुर सुनकर स्वामी हरिदास जी को बहुत क्रोध आया और वह सही राग गाने लगे। उनका मधुर गायन सुनते ही आकाश के बदल झमाझम बरस उठे। और सम्राट अकबर भी उनके मुरीद हो गए।

बांके बिहारी की विशेषता

बिहारी जी के सम्पूर्ण भारत में अलग-अलग नामों से कई मंदिर हैं। किन्तु इस मंदिर की विशेषता इसको अन्य मंदिरों से भिन्न बनाती है। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि अन्य मंदिरों की तरह यहां हर रोज़ मंगला आरती नहीं होती। कहते हैं यहां निधिवन में हर रात्रि रास लीला के बाद कृष्ण और राधा विश्राम करते हैं और सुबह-सुबह आरती करने से उनकी निद्रा भंग होती है।

बांके बिहारी जी की मंगला आरती केवल जन्माष्टमी के दिन ही होती है। इसी प्रकार केवल शरद पूर्णिमा के दिन ही श्री बांके बिहारी जी को बंशी धारण कराई जाती है। केवल श्रावण तीज के दिन ही ठाकुर जी झूले पर बैठते हैं। उनके चरण दर्शन भी केवल अक्षय तृतीया के दिन होते हैं। इन दिनों में ठाकुर जी के दर्शन के लिए भरी संख्या में भीड़ उमड़ती है।

यहां पर भक्तजन लगातार बांके बिहारी जी को नहीं निहार सकते। कहा जाता है कि बिहारी जी की आँखों में एक दिव्य तेज है। यदि कोई उनकी आँखों को लगातार देखता रहे तो वह अपनी सुध खोकर कृष्ण की लीला में खो जाता है। इसलिए मंदिर में नियम है कि बांके बिहारी जी के दर्शन में बीच-बीच में पर्दा डाल दिया जाता है। यह भी मान्यता है कि बिहारी जी यदि किसी की आँखों में ज्यादा देर तक देख लें तो वे उसी के साथ चले जाते हैं। इसलिए भी पर्दा करते रहने का नियम बनाया गया है।

मथुरा वृंदावन घूमने का उत्तम समय

यहां बहुत अधिक गर्मी रहती है। इसलिए यहां घूमने का उत्तम समय सितम्बर से नवंबर के बीच है। वृंदावन में ज्यादातर मंदिरों में दोपहर 12 बजे से सायं 4 बजे तक द्वार बंद कर दिए जाते हैं। यहां समय का ध्यान रखकर ही अपनी यात्रा शुरू करें।

कैसे पहुंचे

विमान द्वारा : वृन्दावन का निकटतम हवाई अड्डा आगरा का खोरिया हवाई अड्डा है जो मथुरा से 62 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। निकटतम अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा दिल्ली का इंदिरा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा है।

ट्रेन द्वारा: वृन्दावन का निकटतम रेलवे स्टेशन मथुरा जंक्शन है। जहाँ पहुंचने के बाद बस या कैब द्वारा आप वृंदावन पहुंच सकते हैं। मथुरा का रेलवे स्टेशन वृंदावन से लगभग 14 किमी की दूरी पर है।

बस द्वारा: बस द्वारा वृन्दावन दिल्ली से सीधा जुड़ा हुआ है किन्तु इनकी संख्या सीमित है। हालाँकि दिल्ली से मथुरा के लिए पर्याप्त संख्या में बस चलती हैं। मथुरा बसों के माध्यम से प्रमुख शहरों से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है। जहाँ से वृन्दावन के लिए आराम से कोई भी वाहन मिल जाता है।