Solar Village Bacha : इस गांव में फिजूल नहीं बहती पानी की एक भी बूंद, सूरज से प्राप्त करते हैं बिजली और ईंधन, प्लास्टिक का नामोनिशान नहीं

Not a single drop of water flowing in this village, we get electricity and fuel from the sun, there is no trace of plastic

  • उत्तम मालवीय, बैतूल
    धरती पर रहने वाले हर जीव, जंतु और वनस्पतियों को बचाने के लिए आज जरूरत है पानी और पर्यावरण को सहेजने की। आपने पोस्टर, बैनर और नारों में तो पर्यावरण बचाने की बातें खूब देखी और सुनी होगी, लेकिन बैतूल जिले में एक गाँव ऐसा भी है जो पानी और पर्यावरण को बचाने की दिशा में अनूठे प्रयास कर रहा है।

    इसी के चलते इस गाँव को सोलर विलेज या वाटर विलेज जैसे उपनाम मिल गए हैं। सौ फीसदी सौर ऊर्जा का इस्तेमाल, स्वच्छता और जल संरक्षण के भागीरथी प्रयासों ने बैतूल के इस ग्राम बाचा को देश-विदेश में एक मॉडल की तरह स्थापित कर दिया है। 

    बैतूल के घोड़ाडोंगरी ब्लॉक का आदिवासी बाहुल्य ग्राम बाचा आज पूरे देश के लिए एक आदर्श गांव है। चारों तरफ जलसंरचनाओं का जाल, लहलहाते खेत, साफ सुथरे घर और 100 फीसदी सौर ऊर्जा का इस्तेमाल इस गाँव को अलग पहचान देता है। लेकिन केवल एक दशक पहले इसी गांव में भीषण जल संकट, बिजली ना होने से अंधकार में जीवन और गंदगी से बीमारियों के हालात  थे।

    यहां इंसान तो क्या मवेशियों का जीना भी दूभर हो गया था। इसके बाद बैतूल की विद्या भारती शिक्षा समिति ने ग्रामीणों को जल संरक्षण, स्वच्छता और सौर ऊर्जा का महत्व समझाया। जिसे अपनाते हुए ग्राम बाचा आज ऊर्जा और पानी को लेकर पूरी तरह से आत्मनिर्भर बन चुका है। 

    बाचा में जल क्रांति की शुरुआत हुई घरों से निकलने वाले पानी को सहेजने के साथ। गांव में  74 घरों के लिए कुल 14 हैंडपंप हैं और हर हैंडपंप के सामने सोखता गड्ढे बनाकर अतिरिक्त बहते पानी को वापस जमीन में पहुंचाया गया। वहीं घरों से निकलने वाला पानी जो सड़कों पर बहता था, उसे भूमिगत नालियों के जरिए सभी घरों में बनी बाड़ियों या बगीचे से जोड़ दिया गया।

    इससे इन बाड़ियों में साल भर बिना सिंचाई किये सब्जियों और फल फूलों का उत्पादन आसानी से होता है। 100 फीसदी सौर ऊर्जा के इस्तेमाल से अब रात के समय भी गाँव में उजाला रहता है और सोलर कुकर की वजह से पेड़ों की कटाई भी लगभग बन्द हो चुकी है। 

    पानी के मामले में पूरी तरह आत्मनिर्भर हो चुके बाचा में ग्रामीणों सहित मवेशियों के लिए भी पानी की अलग व्यवस्था बनाई गई है। छोटी नदियों, नालों पर हर साल श्रृंखलाबद्ध बोरी बंधान बनाकर इतना पानी रोका जा रहा है जिसने खेती को हर मायने में लाभ का व्यवसाय बना दिया है।

    वहीं गांव में स्वच्छता ऐसी की किसी भी तरफ नजर जाए, गांव सुंदर ही दिखेगा। इसके पीछे भी जल संरक्षण ही वजह है। गाँव के लोग जरा सा भी प्लास्टिक या कचरा गांव के जलस्रोतों तक नहीं जाने देते हैं। जिससे गाँव और पानी दोनों स्वच्छ हैं। 

    केवल स्वच्छता और जल संरक्षण ही नहीं बल्कि सौर ऊर्जा का 100 फीसदी इस्तेमाल करने वाला भी ग्राम बाचा देश मे इकलौता गांव है। देश के कई आईआईटी सहित दुनिया के 8 देशों से यहां छात्र और मैनेजमेंट के दिग्गज  आकर  बाचा मॉडल का अध्ययन कर चुके हैं। 

    इन दिनों जब भी देश, प्रदेश या दुनिया में कभी जल संरक्षण या आदर्श गांव की बात होती है तो बैतूल के इस छोटे से गांव बाचा का नाम लिया जाता है। स्वच्छता, जल संरक्षण और सौर ऊर्जा की दिशा में ग्रामीणों ने विलक्षण काम किया है। अब पूरे देश को जरूरत है ग्राम बाचा के मॉडल को अपनाने की जिससे ये धरती जल और ऊर्जा संकट से मुक्त हो सके। 

    ग्रामीणों को जल और पर्यावरण का महत्व बताया गया तो उन्हें इनकी महत्ता बड़ी आसानी से समझ आ गई। अब ग्रामीण इतने समझदार हो गए हैं कि खुद ही पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली कोई भी गतिविधि उनसे गलती से भी नहीं होती। उनके आगे बढ़कर दिए गए सहयोग के कारण ही आज बाचा गांव न केवल देश भर में बल्कि विदेश तक में भी जाना जाता है। ग्रामवासियों का पर्यावरण संरक्षण के लिए यह समर्पण और योगदान वाकई प्रशंसनीय है।
    मोहन नागर
    सचिव, भारत भारती आवासीय विद्यालय, जामठी (बैतूल)

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