America’s Vaisakhi : अमेरिका में भी धूमधाम से मनाया गया वैशाखी पर्व, हर गुरुद्वारे में अलग-अलग दिन होता आयोजन

Vaisakhi festival celebrated with pomp in America too, every gurudwara is organized on different days

  • रोमी अहलूवालिया, विंडसर
    वैशाखी का पावन पर्व अमेरिका में भी धूमधाम से मनाया जा रहा है। इस पर्व पर जितना उत्साह भारत में होता है, वही उत्साह अमेरिका में रह रहे भारतीयों में भी रहता है। खास बात यह है कि अमेरिका में यह पर्व एक ही दिन सभी जगह ना मनाकर अलग-अलग गुरुद्वारों में अलग-अलग दिन मनाया जाता है।

    विंडसर के दुखभंजन साहिब गुरुद्वारे में धूमधाम से वैशाखी का पर्व मनाया गया। यह गुरुद्वारा एक डॉक्टर ने बनवाया था। गुरुद्वारे के पीछे नदी बहती है। यही कारण है कि यहां का दृश्य बेहद आकर्षक नजर आता है। कोरोना के कारण इस बार थोड़े कम श्रद्धालु आयोजन में शामिल हुए, लेकिन जितने श्रद्धालु आए, उनमें खासा उत्साह देखने को मिला।

    विंडसर के इस गुरुद्वारे में लंगर के अलावा गरम-गरम जलेबी, समोसे, ताजे गन्ने के रस, चाट, पापड़ी की फ्री सेवा होती हैं। इस क्षेत्र में 4-5 गुरुद्वारे हैं। सभी गुरुद्वारों में वैशाखी मनाई जाती है। लेकिन सभी दूर एक ही दिन आयोजन नहीं होता बल्कि हर गुरुद्वारा में अलग-अलग दिन वैशाखी मनाई जाती है। इसका उद्देश्य यही होता है कि सभी लोग सभी जगह के आयोजन में शामिल हो सके। न्यूयार्क में इस मौके पर विशाल जुलूस और प्रभात फेरी भी निकाली जाती है।

    बैतूल में वैशाखी पर हो रहे यह आयोजन

    गुरूद्वारा गुरु सिंघ सभा बैतूल में आज 14 अप्रैल गुरुवार को वैसाखी पर्व (खालसा साजना दिवस) श्रद्धा भावना के साथ मनाया जा रहा है। गुरूद्वारा प्रबंधक कमेटी से मिली जानकारी के अनुसार आज सुबह 11.30 बजे सहज पाठ की समाप्ति, 11.45 से 1.15 तक कीर्तन एवं दोपहर 1.30 बजे से 3 बजे तक गुरु का लंगर का आयोजन किया गया है। गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी में समस्त श्रद्धालुओं से  गुरूद्वारा गुरु सिंघ सभा बैतूल में उपस्थित होकर पुण्य लाभ अर्जित करने का आग्रह किया है।

    उल्लेखनीय है कि अप्रैल महीने के 13 या 14 तारीख को बैसाखी का त्योहार मनाया जाता है। इस दिन सूर्य अपनी उच्च गति में होता है। पंजाब में खेतों में पक चुकी फसल की कटाई बैसाखी से ही आरंभ करने की सदियों पुरानी परंपरा है। यह त्योहार रंग-बिरंगे वस्त्र पहन कर खुशियों के गीत गाते, लोक नृत्य भांगड़ा करते मनाया जाता है। 

    यह है मान्यता

    सिख संप्रदाय में मान्यता है कि इस दिन वर्ष 1699 में गुरु गोविंद सिंह जी ने पत्र भेज कर देश के कोने-कोने से सिखों को आनंदपुर साहिब बुलाया। लगभग अस्सी हजार सिख उपस्थित हुए। सुंदर तंबू और कनात लगे दरबार में प्रात: गुरुवाणी के बाद शबद कीर्तन हुआ। इसके बाद वे आगे बढ़े, म्यान में से अपनी तलवार निकाली और नंगी तलवार लेकर मंच के बीचो-बीच जाकर बोले, “मेरी संगत मेरे लिए सबसे प्यारी है। मेरी संगत मेरी ताकत है, मेरा सब कुछ है। लेकिन क्या आप सब में से ऐसा कोई है, जो अभी, इसी वक्त मेरे लिए अपना सिर कलम करवाने की क्षमता रखता हो? तो लाहौर के एक सिख भाई दयाराम उठे। उन्हें गुरु साहब निकट के छोटे तंबू में ले गए। वहां से रक्तरंजित तलवार लेकर आए गुरु साहब ने फिर एक शीश की मांग की। इस बार दिल्ली के भाई धरम दास अपना शीश भेंट करने के लिए उठे।

    गुरु साहिब ने फिर वापस आकर उसी तरह तीन और शीश मांगे। गुरु साहब की मांग पूरी करने के लिए बिदर के भाई साहिब चंद, जगन्नाथपुरी के भाई हिम्मत राय और द्वारिका के भाई मोहकम चंद आगे आए। कुछ समय बाद गुरु गोबिंद सिंह केसरिया वस्त्रों में सजे उन पांचों सिखों को लेकर आए।

    गुरु साहब ने लोहे के बाटे में पानी और बताशे डाल कर खंडे से तैयार अमृत उन पांचों सिखों को पिलाया और कहा कि ये सभी अब सिंह बन गए हैं। मान्यता है कि गुरु गोबिंद सिंह के पंज प्यारों को स्वयं गुरु जी द्वारा ही कुछ अधिकार प्रदान किए गए थे। गुरु साहिब ने खालसा की स्थापना की घोषणा की और सिखों से कहा कि वे भी अमृत पान कर पांच ककार धारण करें और सिंह के नाम से जाने जाएं। बैसाखी को खालसा पंथ की स्थापना के रूप में मनाया जाता है।