मिसाल: नहीं हुई कोई सुनवाई तो किया चंदा और बना डाली सड़क

कोचाभुरु और गवाड़ीढाना के बीच वाहन निकलना तो दूर पैदल चलना भी था दूभर

इलाज के अभाव में हो चुकी थी कई लोगों की मौत, इसलिए उठाया ग्रामीणों ने यह कदम

  • मनोहर अग्रवाल, खेड़ी सांवलीगढ़ (बैतूल)
    यूँ तो चहुँमुखी विकास के इतने दावें होते हैं कि ऐसा लगता है कि अब कुछ बाकी ही नहीं रहा, लेकिन ग्रामीण अंचल में पहुंचते ही तस्वीर का दूसरा पहलू नजर आता है। आज भी कई इलाके हैं जहाँ सड़क जैसी बुनियादी सुविधा तक मुहैया नहीं है। हद तो यह है कि जिनके काँधों पर विकास की अहम जिम्मेदारी हैं उनके समक्ष बार-बार गुहार लगाने पर भी उनके कानों पर जूं तक नहीं रेंगती। यही वजह है कि आए दिन कहीं श्रमदान से तो कहीं चंदा एकत्रित कर सड़क, पुलिया निर्माण कराने जैसे मामले मामले सामने आते रहते हैं। इसी कड़ी में अब भैंसदेही ब्लॉक की ग्राम पंचायत मच्छी एवं केरपानी ग्राम पंचायत का मामला सामने आया है।

    मच्छी पंचायत के कोचाभुरु गांव के लोगों को खेत, स्कूल सहित अन्य कार्यों से गवाड़ीढाना जाना पड़ता है। इस मार्ग की हालत इतनी खराब थी कि वाहन निकलना तो दूर पैदल चलना तक मुश्किल था। इसे देखते हुए आवाजाही को आसान करने इस दुर्गम मार्ग को बनाने के लिए भैंसदेही के विधायक और सांसद से लेकर अधिकारियों तक ग्रामीणों ने गुहार लगाई। इसके बावजूद कोचाभुरु पहुंच मार्ग पर नाले तक सड़क नहीं बनी। इस मार्ग पर पहाड़ीनुमा विशाल टीले की वजह से इस गांव में साइकिल तो क्या पैदल व्यक्ति को भी परेशानी होती थी। लेकिन, किसानों का वास्ता रोजाना इसी सड़क से होता था।

    लंबे समय तक जब किसानों की बात नहीं बनी तो उन्होंने खुद ही रास्ते को बनाने का संकल्प लिया। इस बीच कोचाभुरु गांव में बरसात के दिनों में एक प्रसूता और एक सर्पदंश पीड़ित की मौत हो गई। इस गांव में जननी और एम्बुलेंस नहीं जा सकती थी। ऐसे हालत में किसानों ने चंदा एकत्र कर लगभग डेढ़ लाख में 200 मीटर लंबी सीमेंट रोड का निर्माण किया। इससे पूर्व पहाड़ को काटने पत्थरों को बड़ी मशक्कत से तोड़ा गया।

    ग्रामीणों की एकता, जागरूकता और जज्बे से अब आवाजाही में उन्हें ज़रा भी परेशानी नहीं होती है। अब न तो शिक्षकों व बच्चों को स्कूल जाने में परेशानी होती है और ना ही किसानों को खेत जाने में दिक्कत होती है। यही नहीं गांव तक आसानी से एम्बुलेंस भी पहुंच जाती है। इससे ग्रामीणों को अब जरा भी परेशानी नहीं होती है। इस कार्य में ग्रामीण मुन्ना धाड़से, सुरेश पन्दराम, पंढरी पाटनकर, पप्पू पाटनकर, सोमलाल सिरसाम और संदीप पाटनकर का विशेष योगदान रहा।