कलेक्टर साहब… इस मासूम को दिव्यांग नहीं मानते आपके कर्मचारी-अधिकारी…

दिव्यांगों के लिए चलाई जा रही योजनाएं बैतूल जिले में साबित हो रहीं सफेद हाथी

Collector sir… your employees-officers don’t consider this innocent handicapped…

  • मनोहर अग्रवाल, खेड़ी सांवलीगढ़
    कहने के लिए भले ही केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा दिव्यांगों (handicapped) को सहारा देने अनेक योजनाएं (Schemes) संचालित की जा रही हैं, लेकिन वास्तविक लोगों (real people) को इनका लाभ नहीं मिल पा रहा है। संवेदनशीलता (sensitivity) की दुहाई देते कई अभियान (Campaign) और कार्यक्रम (Program) चलने के बावजूद जिले में किसी को खुद को जिंदा होने का सबूत देने महीनों भटकना पड़ता है तो किसी को पात्र होने के बावजूद सालों तक योजनाओं का लाभ नहीं मिलता है। निष्ठुरता (ruthlessness) की हद यह है कि वास्तविक जरूरतमंदों की ओर खुद ध्यान देना तो दूर, बार-बार गुहार लगाने के बावजूद न तो कथित संजीदा प्रशासन (Administration) के कर्मचारी-अधिकारी उनकी ओर ध्यान देते हैं और न ही ‘अंत्योदय’ (Antyodaya) के उत्थान को अपना ध्येय बताने वाले जनप्रतिनिधियों (public representatives) और पार्टी पदाधिकारियों व कार्यकर्ताओं को ही इस ओर ध्यान देने की फुर्सत है।

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    जिले के भैंसदेही विकासखंड अंतर्गत झल्लार गांव के समीप स्थित ग्राम बोथिया के संतोष कासदेकर की 15 वर्ष की बेटी दीपिका का मामला शासन और प्रशासन की निष्ठुर कार्यशैली का जीता-जागता प्रमाण है। पूरी तरह से पात्र होने और दर्जनों चक्कर काटने के बावजूद आज तक इसे दिव्यांग पेंशन योजना का लाभ तक नहीं मिल पाया है। दीपिका जन्म से ही हाथ-पांव से दिव्यांग है। वह माता-पिता के भरोसे ही अपनी दैनिक क्रिया करती है। बेचारी इतनी असहाय है कि अपने हाथ से पानी भी पीने में सक्षम नहीं है। पिता संतोष मजदूरी करके परिवार का भरण पोषण करते हैं।

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    साथ लेकर जाना पड़ता है मजदूरी करने
    दीपिका के पिता हिवरखेड़ी गांव में ईटा बनाने जाते हैं। दीपिका को अकेले नहीं छोड़ा जा सकता, इसलिए उसे भी साथ ही ले जाते हैं। गोद में साथ लेकर जाना उनकी मजबूरी है। ऐसा ना करें तो दीपिका को खाने-पीने की दिक्कत हो जाती है। इतना सब होने के बावजूद बदकिस्मती ही है कि दीपिका की दिव्याग पेंशन अब तक शुरू नहीं हो पाई है।

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    पेंशन के लिए कई शिविरों के काट चुके हैं चक्कर
    पिता संतोष बेटी की पेंशन चालू करवाने उसे कई विकलांग शिविर घुमा लाए हैं। दर्जनों बार आवेदन कर चुके हैं, लेकिन आज तक दीपिका की पेंशन शुरू नहीं हो पाई है। ग्राम पंचायत ने भी पेंशन बनाने में कोई रूचि नहीं दिखलाई। ऐसे में दिव्यागजनों के हित में चलाई जा रही योजनाएं सफेद हाथी ही साबित हो रही है। आला अधिकारी भले ही गांवों में रात्रि विश्राम और लोगों को घर बैठे ही योजनाओं का लाभ दिलाने तमाम तरह की मशक्कत कर रहे हो पर मैदानी अमला आज भी पूरी तरह अपनी मनमानी ही कर रहा है। दीपिका के पिता संतोष ने अब आखरी गुहार कलेक्टर अमनबीर सिंह बैंस से लगाई है कि वे ही उसकी बेटी और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की इस भांजी को दिव्यांग पेंशन का लाभ दिलवाएं।

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