लापरवाही से इलाज करने वाले झोलाछाप डॉक्टर को दो साल का कठोर कारावास

न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी मुलताई न्यायालय ने सुनाया महत्वपूर्ण फैसला

  • उत्तम मालवीय, बैतूल © 9425003881
    न्यायालय न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी मुलताई ने झोलाछाप डॉक्टर दीपांकर पिता मनोरंजन चक्रवर्ती निवासी ग्राम इटावा, तहसील मुलताई को भारतीय दंड संहिता की धारा 304-A में एक वर्ष का कठोर कारावास का कारावास और धारा 24 मध्यप्रदेश आयुर्विज्ञान परिषद 1987 के तहत दो साल के कठोर कारावास और 1000 रुपये के जुर्माने से दंडित किया। दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 357 (3) के तहत 25000 रुपये प्रतिकर के रूप में आरोपी से मृतक देवमन के घरवालों को दिए जाने का आदेश भी दिया है। प्रकरण में सहायक जिला लोक अभियोजन अधिकारी मुलताई धर्मेश शर्मा के द्वारा पैरवी की गई ।

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    एडीपीओ श्री शर्मा ने बताया कि 4 जुलाई 2015 को देवमन को बुखार आया था। अभियुक्त दीपांकर चक्रवर्ती उस दिन गांव में आया था तथा उसने देवमन को कमर पर इंजेक्शन भी लगाया, जिसके कारण देवमन को पैर में सूजन आ गई थी। उसे दर्द होने लगा था। दूसरे दिन फिर दीपांकर को दिखाया, लेकिन देवमन को कोई आराम नहीं मिला। चतरू कुमरे ने दीपांकर से बात की तो उसने कहा कि देवमन को वरुड़ लेकर चलते हैं। वहां के अस्पताल में दिखा देंगे। इस पर बलिराम, चतरू, हीरावंती और दीपांकर देवमन को लेकर वरुड़ के सरकारी अस्पताल में गए। वहां भी उसका इलाज नहीं हो सका और वहां के डॉक्टरों ने किसी और अस्पताल में ले जाने के लिए कहा। इसके बाद उसे गोधने अस्पताल में लेकर गए। कोई आराम नहीं मिलने पर फिर उसे नागपुर इलाज के लिए लेकर गए।

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    लता मंगेशकर अस्पताल में उसका इलाज हुआ और 10 जुलाई 2015 को उसकी मृत्यु हो गई। पुलिस थाना मुलताई ने मर्ग कायम कर जांच की और देवमन का पोस्टमार्टम कराया। मर्ग जांच में इंजेक्शन लगाने पर उसके दुष्प्रभाव होने से देवमन की मृत्यु होना पाया गया। इसके बाद पुलिस थाना मुलताई ने दीपांकर के विरुद्ध धारा 304-A, भारतीय दंड संहिता और धारा 24 मध्यप्रदेश आयुर्विज्ञान परिषद अधिनियम के तहत पंजीवद्ध कर विवेचना में लिया। विवेचना के दौरान गवाहों के कथन लिए गए। आरोपी का रजिस्ट्रेशन प्रमाण पत्र और दवाइयां जप्त कर उसे गिरफ्तार किया गया ।मुख्य चिकित्सा अधिकारी बैतूल से प्रमाण पत्रों की जानकारी ली जाने पर उन्होंने बताया कि पंजीयन सूची में दीपांकर का नाम नहीं है तथा उसे एलोपैथिक इलाज करने की पात्रता नहीं है। विवेचना पूर्ण कर अभियोग पत्र न्यायालय में प्रस्तुत किया गया।

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    न्यायालय ने फैसले के दौरान की यह टिप्पणी
    न्यायालय मुलताई के द्वारा आरोपी को दंडित किए जाने के साथ-साथ अपने निर्णय में यह टिप्पणी भी की कि भारतीय परिवेश एवं समाज में भगवान के बाद चिकित्सक को ही जीवनदाता या जीवन रक्षक माना जाता है जो लोगों के प्राणों की रक्षा करता है। एक बीमार व्यक्ति अपने स्वास्थ्य के संबंध में चिकित्सक पर अटूट विश्वास करता है। अभियुक्त ने चिकित्सकों पर लोगों के विश्वास को खंडित करने का कार्य किया है। ऐसी घटनाओं से योग्य चिकित्सकों की छवि धूमिल होती है तथा लोगों के मन में अविश्वास की भावना पैदा होती है। वर्तमान में जहां सम्पूर्ण विश्व के सामने कोरोना संक्रमण काल के दौरान जैसी परिस्थितियां निर्मित हुई है, उनमें चिकित्सकों के प्रति लोगों का विश्वास बनाए रखने की आवश्यकता है। ऐसे में अभियुक्त को उचित एवं शिक्षात्मक दंड से दंडित करना आवश्यक और न्यायोचित है ताकि न्याय के उद्देश्यों की पूर्ति हो सके।

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