लाख टके का सवाल: क्या गार्डों के लिए चॉकलेट, पॉपकॉर्न और गोलगप्पे लेकर पहुंचे थे बदमाश?

सारणी माइंस में हुई लूट-डकैती की घटना को लेकर चर्चाओं का दौर जारी, कई सवाल अभी भी अनुत्तरित

  • उत्तम मालवीय, बैतूल © 9425003881
    इस बार सारणी माइंस में हुई घटना का तरीका पूर्व में हुई घटनाओं की अपेक्षा कुछ हटकर था। बदमाशों की संख्या भले ही अब तक की सबसे ज्यादा थी और उनके पास घातक हथियार भी थे, लेकिन इस बार उन्होंने पूरे मानवीय और दोस्ताना तरीके से घटना को अंजाम दिया। दरअसल, हथियार तो वे केवल दिखाने के लिए ले गए थे, खदान में तैनात गार्डों को नियंत्रित करने के लिए उन्होंने इस बार एक नया तरीका अपनाया था। इस बार बदमाश जब खदान में चोरी करने पहुंचे तो वे अपने साथ चॉकलेट, पॉपकॉर्न, गोलगप्पे और इसी तरह के अन्य चटपटे आइटम लेकर पहुंचे थे। खदान पहुंचकर उन्होंने सबसे पहले गार्डों से हाय, हेलो की, गले मिले और फिर भेंट स्वरूप उन्हें यह थमा दिए। चॉकलेट, पॉपकॉर्न और गोलगप्पे मिलते ही गार्ड इन्हें खाने में मशगूल हो गए और इधर बदमाश अपने काम में जुट गए। इस अनूठे तरीके को अपनाने से ही इस बार न तो चोरों को गार्डों को बंधक बनाना पड़ा और ना ही गार्डों को किसी को रोकने की जहमत उठाना पड़ा। चोर इत्मीनान से अपना काम करते रहे और गार्ड इस बीच शांति से बैठ कर चॉकलेट, पॉपकॉर्न और गोलगप्पे खाते रहे। पूरी घटना को अंजाम देने के बाद आखिर में चोरों ने गार्डों को और गार्डों ने चोरों का शुक्रिया अदा कर बाय-बाय कहते हुए एक-दूसरे को बेहद सौहार्दपूर्ण और आत्मीय माहौल में बिदाई दी। यदि चोर चॉकलेट, पॉपकॉर्न और गोलगप्पे साथ नहीं लाते तो इस सौहार्दपूर्ण माहौल में यह घटना हरगिज नहीं घट पाती।
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    पिछले एक सप्ताह से पुलिस ‘गार्डों को बंधक नहीं बनाया’ की ‘कहानी’ को प्रचारित कर पूरे मामले पर जिस तरह से पर्दा डालने का प्रयास कर रही है, उससे कम से कम मेरे दिमाग में तो यही तस्वीर उस रात की घटना की बन रही है। अब मैं क्या कोई बच्चा भी इस बात को बड़ी आसानी से समझ सकता है कि यदि दूर जंगल में घनी-अंधेरी रात में महज 5-7 लोगों के सामने यदि 60-70 घातक हथियारों से लैस बदमाश खासकर उस संपत्ति की चोरी करने पहुंच जाए, जिसकी रक्षा के लिए वे तैनात हैं, तो उनके प्रति बदमाशों का कोई दोस्ताना रवैया तो रहने से रहा। बदमाश कोई यह कसम खाकर तो गए नहीं होंगे कि जो भी हो पर इस बार गार्डों को हमें बंधक नहीं बनाना है।
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    दूसरी ओर उन हालातों में तो गार्ड स्वयं ही बंधक की स्थिति में पहुंच जाते हैं। इतने लोगों को देख कर गार्ड खुला विरोध भले ही नहीं कर पाए हो पर बदमाश यह तो जानते थे कि यह पुलिस को फोन कर सकते हैं, ऐसे में उन पर कोई तो अंकुश बदमाशों ने लगाया होगा, कोई हरकत वे ना करें, इसके लिए कोई हिदायत देकर उन्हें खामोश बैठे रहने को मजबूर तो किया गया होगा। क्या यह बंधक बनाने की श्रेणी में नहीं आएगा? यदि पुलिस की कहानी को सच मान लिया जाए तो फिर तो यह सीधे-सीधे सिद्ध होता है कि गार्डों और बदमाशों की पूरी-पूरी मिलीभगत से यह पूरी घटना हुई है।
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    गार्डों को रखा ही इसलिए जाता है कि वे उस सम्पत्ति की सुरक्षा करें, यदि बदमाश आते हैं और उन्हें बंधक नहीं बनाया तो फिर गार्डों ने उन्हें रोका-टोका क्यों नहीं, बदमाशों और गार्डों के बीच कोई संघर्ष की स्थिति क्यों नहीं बनी…? खदानों में हथियारबंद चोर गिरोह का धावा कोई नई बात नहीं है। पाथाखेड़ा क्षेत्र में आए दिन खदानों में ऐसी घटनाएं होती रहती हैं, लेकिन घटना पर पर्दा डालने या अपनी नाकामी छिपाने के लिए उस घटना को एक अलग ही रूप देने का यह दुस्साहस जिले में पहली बार हुआ है। इससे पूर्व भी खदानों में दर्जनों ऐसी घटनाएं हुई हैं पर पहले ना तो उन्हें कमतर बताया गया और ना ही खदान अधिकारियों-कर्मचारियों के सामने कभी ऐसी स्थिति बनी कि चंद घण्टों बाद ही उन्हें नई कहानी बताना पड़ा कि ‘बंधक नहीं बनाया गया।’
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    पुलिस के अधिकारी यदि रोजनामचा के कुछ पन्ने पलट कर देख लेते तो खुद ही समझ जाते कि कोयलांचल पाथाखेड़ा क्षेत्र में यह कोई पहली घटना नहीं थी बल्कि ऐसी घटनाएं वहां आए दिन होती रहती हैं। इन घटनाओं का पहले कभी इतना हौवा नहीं बना बल्कि घटना होने पर होता यही था कि पुलिस बिना कोई कहानी बनाए सीधे मामला दर्ज कर अपना काम शुरू कर देती थी और कुछ दिनों में आरोपी भी मिल जाते थे। यदि नहीं भी मिलते तो भी मामले ने कभी इतना तूल नहीं पकड़ा। इस बार तो पुलिस अपना काम करने के बजाय अपना दामन साफ दिखाने और अपनी नाकामी पर पर्दा डालने नई कहानी गढ़ने और धाराओं का खेल खेलने में ही इतनी मशरूफ हो गई कि 3 दिन तो एफआईआर होने में ही लग गए। इससे बैतूल विधायक निलय डागा और फिर रेंज के आला अफसरों तक को मामले में हस्तक्षेप करना पड़ा और नतीजा सबके सामने हैं।
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    बताते हैं कि यह सब उस एक पुलिस अधिकारी द्वारा किया गया हो सकता है जो कि पदोन्नति के बाद भी उसी क्षेत्र में टिका है और भविष्य में भी वहीं टिका रहना चाहता है। अब चोरी, लूट या डकैती की उस घटना का खुलासा तो जब होना है तब हो, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में अब यह उच्च स्तरीय जांच बेहद जरूरी हो गई है कि घटना के अगले दिन जो गार्ड और खदान अधिकारी चीख-चीख कर बंधक बनाने की बात कह रहे थे, उनके स्वर कुछ ही घण्टों में अचानक क्यों बदल गए थे? आखिर उन पर ऐसा कौनसा दबाव आया जो वे केवल एक बात को जोर देकर प्रचारित कर रहे थे कि ‘बंधक नहीं बनाया’। दूसरी ओर यदि बंधक नहीं बनाया गया तो फिर उनके खिलाफ चोर गिरोह का सहयोग करने का सीधे-सीधे मामला दर्ज होना चाहिए, क्योंकि ऐसी किसी भी घटना को रोकने के लिए इनकी तैनाती की गई थी, घटना को रोकना इनकी जिम्मेदारी थी।
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    यदि बंधक नहीं बनाया तो वहां तैनात सभी गार्ड अपनी जिम्मेदारी निभाने में या तो पूरी तरह विफल हुए या फिर उनकी मिलीभगत चोरों से रही होगी। यदि ऐसा नहीं है तो उन्हें खुलकर बताना चाहिए कि किस दबाव के चलते वे बंधक नहीं बनाने का राग अलाप रहे थे। सुना है कि पहले तो पुलिस ने सामान्य चोरी की धाराएं लगाई थीं पर बाद में डकैती की धारा भी लगी है। ऐसे में पुलिस को भी स्पष्ट करना चाहिए कि जब खदान अधिकारी और गार्ड अगले दिन बोल चुके कि ‘बंधक नहीं बनाया’ तो फिर डकैती की धारा क्यों लगाई गई…?

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